आसियान देशों के साथ भारत के संबंधों पर लेखक की टिप्पणी
भारत को लुक ईस्ट नीति पर चलते हुए लंबा अरसा बीत चुका है, लेकिन इसके अपेक्षित परिणाम नहीं आए हैं। तेजी से बदलते वैश्विक शक्ति संतुलन में भारत के लिए यह जरूरी हो जाता है कि वह दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों के साथ संबंध प्रगाढ़ करके आर्थिक और सामरिक लाभ हासिल करे। नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ पब्लिक फाइनेंस एंड पॉलिसी के मानद प्रोफेसर सुदीप्तो मंडल के अनुसार, आसियान देशों के साथ अपने संबंधों पर फिर से गौर करना आज के नए विश्व शक्ति जोड़-तोड़ में बहुत जरूरी हो गया है और लुक ईस्ट नीति का केंद्र बिंदु भी यही है। दक्षिणपूर्व एशियाई देशों के साथ भारत के संबंध हजार से भी अधिक साल पुराने हैं। ये संबंध आज हमारे लिए कई सबक और कई अवसर प्रदान कर सकते हैं। मंडल ने एक चतुष्कोणीय रणनीति बनाई है, जिसे उत्तरपूर्व पहलू के साथ जोड़ा जा सकता है। भारत को आसियान क्षेत्र के साथ साझा धार्मिक और सांस्कृतिक संबंधों की अपनी ऐतिहासिक विरासत का पूरा-पूरा फायदा उठाना चाहिए। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण संगठन ने अंगकोर वाट में (कंबोडिया का राष्ट्रीय प्रतीक, लेकिन यह भगवान विष्णु का एक हिंदू मंदिर है) पुनरुद्धार किया है, लेकिन यह तो एक शुरुआत भर है। भारत को, इस पूरे क्षेत्र में विरासत स्थलों के पुनरुद्धार और विकास के और अधिक काम करने चाहिए, जिसके लिए भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण संगठन, यात्रा और आतिथ्य उद्योग की मदद ली जा सकती है। दूसरा, भारत आसियान दर्शकों पर बॉलीवुड और अन्य मनोरंजन के साधनों की अपनी कोमल-शक्ति के असर को भी नजरंदाज नहीं कर सकता। यदि सही तरह से निर्यात किया जाए तो सिनेमा और मनोरंजन के अति प्रभावशाली क्षेत्र का भारी फायदा हो सकता है। इस क्षेत्र में बिना किसी प्रचार के ही बॉलीवुड के कुछ चोटी के सितारे और गीत अत्यंत लोकप्रिय हो गए हैं। तीसरा क्षेत्र है आइटी। इसमें अपनी विशेषज्ञता को देखते हुए भारत को आइटी-आधारित सेवाओं में निवेश करना चाहिए। यह भारी संभावनाओं वाला क्षेत्र है और इसमें लगातार नवीकरण की गुंजाइश हैं। इससे भारत के साथ-साथ आसियान देशों को भी लाभ होगा। निवेश का चौथा और सबसे महत्वपूर्ण क्षेत्र है उच्च शिक्षा का निर्यात। इन क्षेत्रों में भारत में कई विश्व-स्तरीय उत्कृष्ट संस्थान हैं। इनमें आसियान देशों के छात्रों को वरीयता दी जा सकती है। खास बात यह है कि उनके कोर्स, अंग्रेजी में कराए जाते हैं और आसियान में सभी छात्र इस भाषा में प्रवीण होना चाहते हैं। जब तक लुक ईस्ट नीति के ढांचे में उत्तरपूर्व को एक महत्वपूर्ण पक्ष नहीं बनाया जाएगा तब तक यह नीति पूरी तरह फलीभूत नहीं हो सकती। इसका कारण यह है कि यह क्षेत्र आसियान के सबसे अधिक निकट है और उसके साथ उसकी नस्लीय निकटता भी है। इससे इस क्षेत्र के सामाजिक-आर्थिक चेहरे को बदलने में भारी मदद मिलेगी। उत्तरपूर्वी इलाके और दक्षिणपूर्व एशिया के लोगों में परस्पर संपर्क और इन दो क्षेत्रों के बीच व्यापार और कारोबार वक्त की जरूरतें हैं। इसके लिए उत्तरपूर्व को मौजूदा कार्यशैली को बदलना होगा। व्यापार-कारोबार, इकतरफा तो नहीं हो सकते। लुक ईस्ट नीति के लिए उत्तरपूर्वी क्षेत्र को उच्च उत्पादकता के रास्ते पर बढ़ना होगा, तब ही आसियान क्षेत्र को सही मायनों में लाभ पहंुच पाएगा। अब लुक ईस्ट नीति की क्षमताओं को हर कोण से परखने का काम तो उत्तरपूर्व की राज्य सरकारों और वहां के लोगों को करना है। हिंसा से त्रस्त पूर्वोत्तर और सामरिक महत्व की दृष्टि से पूरे भारत के लिए लुक ईस्ट नीति काफी उपयोगी सिद्ध हो सकती है। इस नीति से इस क्षेत्र के लोगों की जिंदगियां बदल सकती हैं। जरूरत राजनीतिक-नौकरशाही दूरदृष्टि और इच्छाशक्ति की है। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)
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