Friday, March 25, 2011

दलाई लामा के बगैर तिब्बती आंदोलन का भविष्य


चीन और दूसरे देशों के रिश्तों में ऐसे मौके अकसर आते हैं, जब मौके की नजाकत आंख से दिखने वाली घटना से नहीं, बल्कि उस पर चीनी नेताओं की प्रतिक्रिया से समझ आती है। इस बात को पिछले दिनों तिब्बत के निर्वासित शासक दलाई लामा के उस बयान पर चीनी प्रतिक्रिया से अच्छी तरह समझा जा सकता है, जिसमें उन्होंने अपने सारे शासकीय और राजनीतिक अधिकार लोकतांत्रिक चुनाव के रास्ते चुने गए तिब्बती जनप्रतिनिधियों को सौंपने की घोषणा की है। उन्होंने यह भी कहा है कि वह नए दलाई लामा के चुनाव की परंपरा को आधुनिक परिस्थितियों के हिसाब से बदलना चाहते हैं ताकि उनके बाद वाले दलाई लामा पुनर्जन्म के बजाए योग्यता के आधार पर नियुक्त किए जाएं। लेकिन दलाई लामा की इस घोषणा पर चीन से जैसी प्रतिक्रिया आई है, उसने स्पष्ट कर दिया है कि तिब्बत और दलाई लामा को लेकर चीनी नेता कुछ खास मंसूबे पाले बैठे हैं। बीजिंग ने दलाई लामा की इस घोषणा का जवाब देने के लिए अपने एक वरिष्ठ तिब्बती कारिंदे पेमा छोलिंग को चुना, जो चीनी शासकों का विशेष कृपापात्र है और इन दिनों तिब्बत का गवर्नर है। बीजिंग में विदेशी पत्रकारों को दिए अपने बयान में पेमा ने दलाई लामा की घोषणा को तिब्बती संस्कृति का अपमान बताते हुए कहा कि हमें तिब्बत की ऐतिहासिक परंपराओं और तिब्बती बौद्धधर्म के धार्मिक अनुष्ठानों का सम्मान करना चाहिए। तिब्बती बौद्धधर्म का इतिहास हजार साल से भी पुराना है और दलाई लामा तथा पंचेन लामा के पुनरावतार की परंपरा कई सौ साल से चलती आ रही है। ..मेरे हिसाब से किसी व्यक्ति को यह तय करने का अधिकार नहीं है कि पुनर्जन्म के आधार पर (धार्मिक नेताओं के) नए अवतार ढूंढ़ने की परंपरा बंद की जाए या नहीं। वर्तमान दलाई लामा (तेनजिन ग्यात्सो) 500 साल पुरानी परंपरा के 14वें दलाई लामा हैं। तिब्बती शासन व्यवस्था के अनुसार दलाई लामा वहां का सर्वोच्च शासक और धर्मगुरु होता है। पंचेन लामा को धार्मिक क्षेत्र का दूसरा वरिष्ठ लामा माना जाता है। पेमा के माध्यम से चीन सरकार के इस बयान ने पिछले कई साल से चली आ रही इस आशंका को सच साबित कर दिया है कि बीजिंग के शासक वर्तमान दलाई लामा के मरने का इंतजार कर रहे हैं ताकि अपनी मर्जी के किसी बच्चे को उनकी जगह नए अवतार के रूप में बिठाकर तिब्बत की समस्या से छुट्टी पा लें। तिब्बत-चीन रिश्तों पर नजर रखने वाले विशेषज्ञ यह देखकर हैरान हैं कि तिब्बत पर कब्जे के बाद दशकों तक तिब्बती मठों, मंदिरों, तिब्बती भाषा और तिब्बती सामाजिक परंपराओं को घोषित नीति के तहत तहस-नहस करने वाली चीन सरकार को अब अचानक ही तिब्बत की ऐतिहासिक परंपराओं और तिब्बती बौद्धधर्म के धार्मिक अनुष्ठानों के सम्मान की चिंता सताने लगी है। ऐसा नहीं कि दलाई लामा चीनी चालों से बेखबर हैं। निर्वासन में आने के बाद से ही वह तिब्बती शासन व्यवस्था को पुरानी धार्मिक बंदिशों से मुक्त करके एक ऐसी लोकतांत्रिक व्यवस्था बनाने में लगे हुए हैं, जो दलाई लामा के बजाए खुद अपने बल पर तिब्बती संघर्ष को चला सके और जिसका जीवनकाल उनके अपने व्यक्तिगत जीवन से ज्यादा लंबा हो। इस दिशा में एक नामित संसद से शुरू करके पिछले 50 साल में उन्होंने तिब्बत के लिए संविधान और गुप्त मतदान पर आधारित ऐसी लोकतांत्रिक व्यवस्था खड़ी कर दी है, जिसमें निर्वाचित संसद को दलाई लामा तक को हटाने का अधिकार हासिल है। पंद्रह बार निर्वाचित संसद के अलावा पिछले सप्ताह तीसरी बार प्रधानमंत्री का चुनाव सीधे वोट से किया गया। दलाई लामा ने अपने राजनीतिक अधिकार इसी संसद और प्रधानमंत्री को सौंपने की घोषणा की है। चीन सरकार के मौजूदा धार्मिक प्रेम को समझने के लिए तिब्बत में पिछले दो तीन दशक के घटनाक्रम को समझना होगा। तिब्बत में अपने कारिंदा प्रशासकों से तिब्बत में सब कुछ ठीक-ठाक है सुनते रहने के आदी बीजिंग शासकों को 1989 में तब बहुत सदमा लगा था, जब तिब्बती जनता ने चीन के खिलाफ विद्रोह का झंडा बुलंद कर दिया। इस विद्रोह की कमान ऐसे तिब्बती युवा संभाले हुए थे, जो चीनी शासन में पैदा हुए थे और चीनी शिक्षा और राजनीतिक घुट्टी पीकर बड़े हुए थे। उनके नारों और उनकी मांगों पर दलाई लामा, तिब्बती आजादी और धार्मिक आजादी की गहरी छाप थी, जिन्हें उनकी पीढ़ी ने अपने जीवन में एक बार भी नहीं देखा था। इस आंदोलन का गहन विश्लेषण करने के बाद चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के तीसरे वर्क फोरम ने 1991 में तय किया कि चीन विरोध को कुचलने के लिए तिब्बती धर्म का विनाश करने के बजाए उसके इस्तेमाल के तरीके भी खोजे जाने चाहिए। उसके बाद लोगों को मंदिर जाने की छूट दी गई तथा टूरिस्ट उपयोग वाले मठों-मंदिरों को फिर से सजाने संवारने का अभियान शुरू किया गया। मठों में सीमित संख्या में लामाओं को सीमित छूट देने के साथ उनके लिए कम्युनिस्ट पार्टी की देशभक्ति कक्षाएं भी अनिवार्य कर दी गई। कई मठों को अपने अवतारी लामा ढूंढ़ने की भी छूट दी गई। चीन के प्रयासों से जून 1992 में खोजे गए कर्मापा को निर्वासन से दलाई लामा की मान्यता दिलाने के बाद खुद बीजिंग सरकार ने भी नए अवतार को मान्यता दी। इस सफलता से उत्साहित चीनी शासकों ने पंचेन लामा के अवतार की खोज के लिए भी 1995 में पार्टी की देखरेख में लामाओं की कमेटी बनाई, लेकिन कुछ लामाओं ने बीजिंग से पहले दलाई लामा को खबर भेजकर 6 वर्षीय नए अवतार गेधुन छयोकि न्यीमा को उनकी मान्यता दिला दी। गुस्से में बिफरे चीनी प्रशासन ने गेधुन और उसके माता-पिता को हिरासत में लेकर अपनी मर्जी के एक अन्य बालक गियांसेन नोरबू को असली पंचेन लामा घोषित कर दिया। एमनेस्टी इंटरनेशनल और सैकड़ों मानवाधिकार संगठनों की मांग के बावजूद न तो पंचेन लामा को आज तक रिहा किया गया है और न उनकी सुरक्षा का कोई प्रमाण पेश किया गया। यह अलग बात है कि सारे सरकारी प्रचार के बावजूद नोरबू को तिब्बती जनता ने आज तक स्वीकार नहीं किया। अपनी कई हजार किलोमीटर की तिब्बत यात्राओं में मुझे आज तक कोई ऐसा घर, दुकान, रेस्टोरेंट या रिक्शा नहीं दिखा, जिसमें उनकी तस्वीर लगाई गई हो। उधर, 2000 की नववर्ष रात्रि में कर्मापा भी चीनी पहरेदारों को चकमा देकर भारत भाग आए, लेकिन चीन सरकार ने छोटे-मोटे नए लामा अवतारों को खोजने और उन्हें खुश रखने का अपना अभियान जारी रखा हुआ है। पिछले कई साल से चीन सरकार अपने दर्जनों बौद्ध विद्वानों को अंतरराष्ट्रीय बौद्ध सेमिनारों में भेजती है। वह खुद दो अंतरराष्ट्रीय बौद्ध सम्मेलन करवा चुकी है, जिनमें अपने सरकारी पंचेन लामा को पूरे तामझाम के साथ पेश किया जाता है, पर दलाई लामा और अन्य तिब्बती विद्वानों को उनमें प्रवेश नहीं करने दिया जाता। इस पूरे धार्मिक अभियान का एक लक्ष्य दुनिया को यह दिखाना है कि चीन सरकार बौद्ध धर्म से बहुत प्यार करती है, लेकिन शायद असली इरादा उस दिन के लिए तैयारी करना है, जब वर्तमान दलाई लामा स्वर्ग सिधारें और चीन की धरती पर बीजिंग सरकार के चुने हुए किसी बच्चे को असली दलाई लामा के रूप में पेश करके अपना नया पिट्ठू खड़ा कर दिया जाए। उस चीनी पिट्ठू को तिब्बत की जनता से कितनी मान्यता मिलेगी, यह तो पंचेन लामा के उदाहरण ने पहले ही सिद्ध कर दिया है। लेकिन दलाई लामा ने अपने राजनीतिक अधिकार चुने प्रतिनिधियों को सौंपकर और नए दलाई लामा के चुनाव की व्यवस्था बदलने की बात कहकर तिब्बत के औपनिवेशिक आकाओं के इरादों पर पानी फेर दिया है। इसलिए अगर चीन के शासक दलाई लामा को धर्म विरोधी बताकर खुद को तिब्बत की ऐतिहासिक परंपराओं और तिब्बती धार्मिक अनुष्ठानों का सही वारिस बताने के लिए गुस्सा दिखा रहे हैं तो खंभा नोचने की उनकी खिसियाहट को समझा जा सकता है। (लेखक तिब्बती मामलों के जानकार हैं)


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