Tuesday, March 15, 2011

उदारता के लिए सिमटता स्थान


पाकिस्तान इन दिनों मजहबी जुनून में झुलस रहा है। विवादास्पद ईशनिंदा कानून के प्रखर आलोचक व अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री शहबाज भट्टी की हत्या कट्टरपंथियों के बेकाबू आतंक की ही पुष्टि करती है। इससे पूर्व चार जनवरी को पाकिस्तानी पंजाब सूबे के गवर्नर सलमान तसीर की हत्या भी इसलिए कर दी गई थी कि उन्होंने इस कानून के तहत जेल में बंद आसिया बीबी से मिलने के बाद एक प्रेस कांफ्रेंस कर ईशनिंदा कानून में सुधार करने की मांग की थी। कटटरपंथियों के दबदबे और भय के कारण ही इस कानून में सुधार के लिए संसद में निजी विधेयक पेश करने वाली पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी की शेरी रहमान को अपने कदम पीछे खींचने पड़े हैं। क्या पाकिस्तान में उदारवाद के लिए सचमुच कोई जगह बाकी नहीं रह गई है? यक्ष प्रश्न यह भी कि इस मजहबी कट्टरता के लिए जिम्मेदार कौन है? भारत के रक्तरंजित बंटवारे के बाद पाकिस्तान में हिंदुओं का प्रतिशत 19.69 से घटकर 1.6 हो गया। बांग्लादेश (पहले पूर्वी पाकिस्तान) में 1941 में हिंदुओं का प्रतिशत 29.61 था, जो 1951 में आबादी के हस्तांतरित हुए बगैर घटकर 22.89 प्रतिशत रह गया। 1991 तक इसमें भारी गिरावट आई और हिंदुओं का प्रतिशत 11.37 ही रह गया। अब उनका प्रतिशत 8 और 9 के बीच है। इन दोनों ही देशों में मजहबी जुनून उफान पर है और सत्ता अधिष्ठान अल्पसंख्यकों के दमन और प्रताड़ना पर खामोश रहता है। अल्पसंख्यकों की बदहाली का आलम यह है कि सियासत में भागीदार होते हुए भी एक हिंदू को पलायन के लिए मजबूर होना पड़ा है। पाकिस्तान मुस्लिम लीग के सिंध के विधायक राम सिंह सोधा ने पिछले दिनों कट्टरपंथियों के उत्पीड़न से जान बचाकर भारत में शरण ली है। सोधा वहां मंत्री भी रह चुके हैं। पाकिस्तान में हिंदू गुलामों की तरह जीने को अभिशप्त हैं। कठमुल्लों को जजिया देकर उन्हें अपनी अपनी जान सलामत रखनी पड़ती है। पाकिस्तान में ईसाई और हिंदुओं को व्यवस्था के खिलाफ आवाज उठाने की अनुमति नहीं है। उनके पवरें पर हमले आम बात हैं। ईशनिंदा के आरोप में हिंदुओं को सरेआम पीट-पीट कर मार डाला जाता है। कटु सत्य यह है कि पाकिस्तानी अवाम को साठ वषरें से भी अधिक समय से भारत विरोध और हिंदुओं से वैमनस्यता की घुट्टी पिलाई गई है। पाकिस्तान के सृजन के लिए जिम्मेदार मानसिकता की यह स्वाभाविक परिणति है। पाकिस्तान बनने के पीछे दो तरह की सोच कसूरवार है। कट्टरपंथी मुसलमानों को यह अंदेशा था कि अंग्रेजों के चले जाने के बाद राजपाट का काम हिंदुओं के हाथ में आ जाएगा। जिस समुदाय पर उन्होंने कई सौ साल राज किया और उनसे गुलामों से भी बदतर सलूक किया हो, उन शासितों के साथ वे बराबरी से कैसे रह सकते थे? 16 मार्च, 1888 को सर सैयद अहमद खान ने मेरठ की एक सभा में कहा था, क्या यह मुमकिन है कि दो कौमें-हिंदू और मुसलमान एक ही गद्दी पर बैठें और ताकत में बराबर हों? बेशक नहीं। यह जरूरी है कि उनमें से एक, दूसरे को शिकस्त दे। जब तक एक कौम दूसरे को जीत न ले, मुल्क में अमन कभी भी कायम नहीं हो सकता। इस देश के अधिकांश मुसलमानों ने सर सैयद अहमद खान के इसी दर्शन को ही आत्मसात किया। दूसरी सोच मुसलमानों को हिजरत के लिए प्रेरित कर रही थी। पाकिस्तान मतलब पवित्र स्थान, इसलिए दर-उल-हरब से दर-उल-इस्लाम की ओर कूच करना मजहबी दायित्व बनता है। ब्रिटिश काल में भारत को दारुल हरब मानते हुए हजारों भारतीय मुसलमान हिजरत कर दारुल इस्लाम अफगानिस्तान चले गए थे, जहां केवल बीस हजार लोगों को ही बसने की इजाजत दी गई। लखनऊ से भी बड़ी संख्या में शिया मुसलमान, जिनमें अवध के नवाब के वंशज भी थे, हिजरत कर कर्बला चले गए। पाकिस्तान के सृजन के बाद से ही इस्लाम के नाम पर पाकिस्तान को अरब संस्कृति का भाग बनाने के सतत प्रयास होते रहे हैं। बहुलतावादी सनातनी संस्कृति के तिरस्कार से पैदा हुए विरोधाभासों के कारण ही पाकिस्तान आज जड़विहीन हो गया है। पाकिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति जिया उल हक की सैन्य तानाशाही के दौर में शिक्षा और कानून व्यवस्था को सऊदी अरब की तर्ज पर इस्लामी मूल्यों के आधार पर चलाने की नींव पड़ी थी। उन्हीं के कार्यकाल में कानून-ए-इहानते-रसूल बना, ताकि इस्लाम पर प्रश्न खड़ा करने का कोई अवसर ही न हो और मुल्क में उदारवाद व आधुनिक सोच के लिए कोई जगह नहीं हो। उसके बाद शासक तो बदलते रहे, किंतु पाकिस्तान की यात्रा कट्टरवाद के एक पड़ाव से दूसरे पड़ाव तक बिना रुके चलती रही। इस कट्टरवाद ने घृणा को जन्म दिया। दूसरों के प्रति पाकिस्तानी जनमानस में घृणा ही इस देश की समस्याओं के मूल में है। (लेखक भाजपा के राज्यसभा सांसद हैं)
   

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