पिछले कुछ दिनों से अमेरिका, ब्रिटेन और फ्रांस की ओर से दिए जाने वाले बयानों का सीधा संदेश यही था कि वे लीबिया पर हमले की तैयारी कर रहे हैं और केवल सुरक्षा परिषद से हरी झंडी हासिल करने का इंतजार है। फ्रांस ने हमले की शुरुआत की। अमेरिका ने पहले दिन 125 से अधिक क्रूज मिसाइलें दागीं। बी-2 स्टील्थ बमवर्षकों से बम बरसाए गए। हालांकि अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा कह रहे हैं कि हमले का अंत कुछ सप्ताह नहीं, कुछ ही दिनों में हो जाएगा, लेकिन किसी को ऐसी उम्मीद नहीं है और इसके पर्याप्त कारण भी हैं। वास्तव में इन हमलों के साथ कई प्रश्न जुड़े हैं, जिनका उत्तर ढूंढ़ना जरूरी है। पहला प्रश्न तो यही है कि क्या लीबिया पर हवाई हमले वाकई अपरिहार्य थे? दूसरा, क्या हमले अपने घोषित लक्ष्य तक सीमित रहेंगे? तीसरा, क्या वाकई हमले कुछ दिनों में रुक जाएंगे? इस तरह के और भी कई प्रश्न हैं। इन और ऐसे सभी प्रश्नों का उत्तर हमें वहां की तस्वीरों और संबंधित नेताओं, अधिकारियों के बयानों में मिल जाएगा। प्रक्षेपास्त्र हमले में गद्दाफी के त्रिपोली स्थित आवास की प्रशासनिक इमारत नष्ट हो चुकी है। अमेरिका की ओर से कहा गया था कि गद्दाफी का आवास या कार्यालय निशाना नहीं है, लेकिन ऐसा हुआ। गद्दाफी के बैब अजीजिया स्थित कम्पाउंड के निकट एक सैनिक अड्डे पर शक्तिशाली हमला हुआ। सुरक्षा परिषद का प्रस्ताव 1973 लीबिया के नागरिकों की रक्षा के लिए सभी आवश्यक उपायों की अनुमति देता है और इसमें उड़ान वर्जित क्षेत्र लागू करने की बात भी शामिल है, लेकिन इसमें गद्दाफी के शासन के अंत की बात तो नही ही है, लीबिया की धरती पर सेना भेजने का निषेध भी है। साथ ही वैसे हवाई उड़ान संसाधनों को नष्ट नहीं करना है, जिनका मानवीय उपयोग हो। जाहिर है, अमेरिका, फ्रांस या ब्रिटेन को बार-बार यह स्पष्टीकरण देना पड़ रहा है कि वे केवल गद्दाफी की हवाई हमले की शक्ति नष्ट कर रहे हैं ताकि वे नागरिकों पर हमला न कर सकें। अमेरिका के रक्षामंत्री रॉबर्ट गेट्स के अनुसार, नागरिकों की रक्षा के लक्ष्य को कर्नल गद्दाफी की हत्या तक विस्तारित करने का आरोप गलत है। उन्होंने कहा, अगर हम अतिरिक्त लक्ष्य जोड़ते हैं तो हम इस मामले में समस्या पैदा कर देंगे। ओबामा भी कह रहे हैं कि अमेरिका की भूमिका वहां नागरिकों की रक्षा करने तक सीमित है। इसके समानांतर अमेरिका की विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन का बयान कुछ और कहता है। हमले के पूर्व जब उनसे पूछा गया कि इसका लक्ष्य क्या होगा तो उन्होंने कहा कि इसके दो लक्ष्य हैं। एक, हिंसा को रोकना और दूसरे लक्ष्य के बारे में उन्होंने जो कहा उस पर ध्यान दीजिए, किसी भी बातचीत का अंतिम परिणाम कर्नल गद्दाफी का पद छोड़ना ही होगा। हिलेरी के वक्तव्य एवं रॉबर्ट गेट्स तथा यहां तक कि ओबामा के वक्तव्यों में अंतर है। फ्रांस के विदेश मंत्री एलेन जुप्पे ने भी इस आरोप को खारिज किया कि उनका लक्ष्य गद्दाफी को सत्ता से हटाना है। थोड़े शब्दों में कहा जाए तो विमानों और क्रूज मिसाइलों के हमले का घोषित लक्ष्य लीबिया के रडार, सतह से हवा में मार करने वाले प्रक्षेपास्त्रों के प्रक्षेपक एवं संचार संसाधनों को नष्ट करना है ताकि गैर उड़ान का विस्तृत क्षेत्र साकार हो सके। त्रिपोली के वायुसेना अड्डे पर हमले के बाद लीबिया के तीसरे बड़े शहर मिस्त्राता के निकट गार्दाबिया के हवाई अड्डे पर हमला हुआ। हमले की जानकारी देने वाले एडमिरल का कहना है कि हवाई अड्डे का जो भाग सेना से संबंधित है, उसी पर हमला किया जा रहा है। बेंगाजी के दक्षिण स्थित थल सेना पर भी हमला हुआ। इसके बारे में कहा गया कि उनका लक्ष्य शस्त्रागार, रॉकेट प्रक्षेपक एवं मशीनीकृत थलसेना है। इन स्पष्टीकरणों से कोई आश्वस्त नहीं हो सकता है। कोई भी हमला इतना परिष्कृत नहीं हो सकता कि वह केवल घोषित लक्ष्य को ही साधे और आसपास को बिल्कुल छोड़ दे। यह भी माना जा सकता है कि स्वयं अमेरिका, ब्रिटेन एवं फ्रांस की आर्थिक स्थिति उनको लंबा युद्ध में फंसने की इजाजत नहीं देती, पर वे गद्दाफी के शासन का बने रहना स्वीकार कर लें, यह भी संभव नहीं। नागरिकों की रक्षा शब्द का आयाम अत्यंत व्यापक है। रॉबर्ट गेट्स कहते हैं कि वे लीबिया को विद्रोहियों एवं सरकार के बीच विभाजन को स्थायी तौर पर बने नहीं रहने देना चाहते हैं। ओबामा ने गद्दाफी को तुरत युद्धविराम लागू करने का अल्टीमेटम भी दे दिया है। सारकोजी कह रहे हैं कि वे लीबिया के लोगों को गद्दाफी की सनक के हवाले नहीं छोड़ सकते। इन सब कथनों का निहितार्थ समझना बिल्कुल आसान है। इतने पर तो कतई असहमति नहीं है कि हवाई हमले एवं उड़ान वर्जित क्षेत्र को साकार करके ये विद्रोहियों को इतना शक्तिशाली बना देना चाहते हैं ताकि वे गद्दाफी को पराजित कर सकें। जाहिर है, इसके लिए और भी कुछ करना होगा। ओबामा के आतंकवाद पर मुख्य सलाहकार जॉन ब्रेन्नेन का कथन ध्यान देने योग्य है, गद्दाफी कई चिंताजनक कदम उठा सकते हैं, जिसमें रासायनिक गैस का प्रयोग भी संभव है। अगर ऐसा होता है और हम सहमत हैं कि वे ऐसा करते हैं तो यह अनिवार्य हो जाएगा कि युद्ध का अंत त्रिपोली में नई सरकार के साथ हो। इसका अर्थ है कि आने वाले दिनों में विद्रोहियों को हवाई कवर देने के साथ खुफिया सूचनाएं एवं शस्त्र तक दिया जाएगा ताकि वे गद्दाफी की सेनाओं को पराजित कर पाएं। यह दूसरे प्रकार का सैन्य हस्तक्षेप होगा। अमेरिका के कई विश्लेषक टिप्पणी कर रहे हैं कि सुरक्षा परिषद की प्रस्ताव संख्या 1973 अमेरिका को विद्रोहियों की वैसी सहायता करने से नहीं रोकता है, जैसा अफगानिस्तान के विद्रोहियों को तालिबान शासन के अंत के लिए किया गया। अमेरिका में इस बात पर सघन बहस शुरू हो चुकी है कि हमले का अंतिम परिणाम क्या होगा? गद्दाफी के शासन का अंत हो, इस पर लगभग सहमति है, पर यह केवल हवाई हमले से संभव नहीं। अमेरिका की तीनों सेनाओं के संयुक्त अध्यक्ष एडमिरल माइक मुल्लेन से एक कार्यक्रम में पूछा गया कि क्या युद्ध का अंत वैसे गतिरोध की स्थिति में हो सकता है, जहां गद्दाफी शासन में रहें। उन्होंने कहा कि मैं मानता हूं कि यह संभावना है। यह जानना कठिन है कि यह क्या मोड़ लेता है। कहा जा रहा है कि एक बार हमला करके गद्दाफी को यों ही छोड़ देना अमेरिका के राष्ट्रीय हितों के प्रतिकूल हो जाएगा। इससे साफ है कि न तो यह हमला अपने घोषित लक्ष्य तक सीमित रहेगा और न इसका जल्दी अंत होगा। ओबामा की समस्या यह है कि वे इराक की तरह किसी देश के अंदर लंबे युद्ध या सैन्य बल द्वारा राजनीतिक स्थिरता एवं पुनर्निर्माण की कार्रवाई में नहीं उलझना चाहते। गद्दाफी ने कह दिया है कि वे धरातल पर एक लंबे युद्ध की तैयारी कर रहे हैं, जिसका अनुभव इन देशों को नहीं है। उन्होंने आम जनता को हथियारों से लैस करने की धमकी भी दी है। गद्दाफी की सैनिक क्षमता उतनी ज्यादा नहीं कि वे युद्ध में इनका सामना कर सकें, लेकिन अमेरिका, फ्रांस और ब्रिटेन तीनों के सामने इराक तथा अफगानिस्तान का उदाहरण है। इसलिए वे गद्दाफी को हटाकर विद्रोहियों की सरकार स्थापित करना चाहते हैं ताकि उनका प्रभाव बना रहे, लेकिन वे इराक और अफगानिस्तान दोहराना नहीं चाहते। वस्तुत: अमेरिका, ब्रिटेन एवं फ्रांस तीनों इस हमले से बच सकते थे। सुरक्षा परिषद के अंदर भी केवल दस देशों का समर्थन मिला था और जर्मनी, रूस, चीन, ब्राजील और भारत मतदान से अनुपस्थित रहे। ये देश आज भी युद्ध के पक्ष में नहीं हैं। गद्दाफी ने इसे धर्मयुद्ध की संज्ञा देकर इस्लाम बनाम ईसाइयत का स्वरूप देने की कोशिश की है। ईसाइयों और मुसलमानों के बीच मध्यकाल में धर्मयुद्ध हो चुका है। यद्यपि किसी मुस्लिम देश ने उनके सुर में सुर नहीं मिलाया है, पर आने वाले दिनों में इसके मनोवैज्ञानिक असर से इनकार नहीं किया जा सकता। अमेरिका, फ्रांस एवं ब्रिटेन की कोशिश अरब देशों में से कुछ को साथ लाना है ताकि यह पश्चिम एवं अरब व इस्लाम के बीच का युद्ध न लगे। दुनिया में ज्यादातर देशों की राय हमले के पक्ष में नहीं हो सकती। अमेरिका, ब्रिटेन एवं फ्रांस इसे समझकर हमला तत्काल रोक दें और लीबिया आंतरिक समस्या के समाधान का दूसरा रास्ता तलाशे, इसी में पूरे विश्व समुदाय की भलाई है, लेकिन ऐसा नहीं होगा। (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)
No comments:
Post a Comment