अरब-अफ्रीकी देशों में तानाशाही सत्ता के खिलाफ उठे तूफान का असर चीन में भी देखा जा रहा है जहां राजनीतिक और लोकतांत्रिक सुधारों को लेकर लम्बे समय से जनाक्रोश सक्रियता के साथ उपस्थित रहा है। हालांकि वहां जनाक्रोश की सक्रियता के प्रबंधन का तरीका बहुत ही लोमहषर्क और बर्बर है। परिणामत: ऐसे हजारों लोग चीन की जेलों में दमन और उत्पीड़न का अंतहीन दंश झेलने को मजबूर हैं। चीन में ऐसा राष्ट्रीय सुरक्षा कानून है, जिसके अंतगर्त किसी भी नागरिक को बिना मुकदमा चलाये जेल में रखने का अधिकार सत्ता को प्राप्त है और इसके लिए नियत तीन साल की अवधि कभी समाप्त नहीं होती है। हाल में एक लोकतांत्रिक सेनानी को शांति का नोबेल पुरस्कार दिया गया था। उस पर चीन की त्योरियां चढ़ी और उसने नोबेल समिति को धमकाया भी पर जब समिति ने इसकी परवाह नहीं की तो चीन ने अपने समर्थक दर्जनों देशों को नोबेल पुरस्कार समारोह का बहिष्कार करने के लिए उकसाया और सफलता भी पायी। चीन एक अराजक कूटनीतिक ही नहीं बल्कि बर्बर सामरिक शक्ति संम्पन्न देश भी है। सस्ते मानवश्रम और उदार श्रम कानूनों के साथ चीन की सरकारी नीतियों की बिसात पर दुनिया की बड़ी-बड़ी कंपनियों की नजर है। यही कारण है कि दुनिया उसके मानवाधिकार कानूनों के घोर उल्लंघन पर भी उदासीनता बरतती है। ट्यूनीशिया के बाद तानाशाही और भ्रष्ट सत्ता के खिलाफ लोकतंत्र का आंदोलन जब मिस्र में फैला तो चीनी कम्युनिस्ट तानाशाही को आशंका हुई कि कहीं लोकतंत्र का आंदोलन उनके देश में भी न शुरू हो जाए। कारण आज लोकतांत्रिक आंदोलन को सूचना क्रांति और सोशल साइटों ने आसान और शक्तिशाली माध्यम उपलब्ध कराया है। चीन में सोशल ब्लॉगिंग का नेटवर्क बहुत मजबूत है। क्योंकि वहां प्रिंट और इलेक्ट्रॅानिक मीडिया सरकारी नियंतण्रमें है और कम्युनिस्ट तानाशाही के समर्थन में ही खबर देता है। वेब सोशल नेटवर्किग के माध्यम से ही दुनिया को खबर मिलती है कि चीन में आखिर क्या हो रहा है और किस प्रकार लोकतंत्र समर्थकों की आवाज दबाने की सैनिक-पुलिस कार्रवाई चलती है। किस प्रकार से उनके मानवाधिकारों का हनन होता है। दमन की वीभत्स प्रक्रियाएं अधिकतर तानाशाही और शरीयत शाही जैसी सत्ता संस्कृति में देखी जाती हैं। ऐसी सत्ता संस्कृति को अपनी आबादी पर गोलियां बरसाने, बम बरसाने या फिर रासायनिक हमले से भी परहेज नहीं होता है। मिस्र और ट्यूनेशिया में तो गांधी की शांति का यर्थाथ जरूर प्रस्थापित हुआ पर लीबिया में जिस प्रकार से गद्दाफी अपने विरोधियों पर बमों और युद्धक विमानो से हमले करा रहे हैं, उसके परिणामस्वरूप वहां हजारों नागरिक मारे गये हैं। इराक के पूर्व तानाशाह सद्दाम हुसैन ने भी कुर्द आबादी की आजादी की इच्छा का दमन करने के लिए रासायनिक हमले कराये थे। जिसमें हजारों कुर्द मारे गये। रासायनिक हमला करने वाले सद्दाम हुसैन के गुग्रे का नाम ही कैमिकल अली पड़ गया था। उसे अपने कारनामों पर बड़ा गर्व था। बाद में इराक की नागरिक सत्ता ने सद्दाम हुसैन के साथ कैमिकल अली को भी फांसी पर लटका दिया था। चीन की कम्युनिस्ट तानाशाही का नागरिक आंदोलनों को कुचलने का इतिहास भी लोकतांत्रिक नहीं रहा है। थ्येन मान चौक की वीभत्स घटना याद कीजिये। छात्रों की लोकतांत्रिक मांग दबाने के लिए रेल पटरियों पर बैठे छात्रों पर रेलगांडिया दौड़ा दी गयी थी। धरने पर बैठे छात्रों पर टैंकों से हमले कराये गये थे। परिणाम: एक लाख से अधिक छात्रों को मौत की नींद सुलाया गया था। दुनिया के मानवाधिकारवादी उसके लिए चीन कभी माफ नहीं कर सकते। चीनी मीडिया में अरब-अफ्रीकी देशों में चल रही लोकतंत्र की लड़ाई की खबरों पर पहरा बैठा दिया गया है। वहां ऐसा इंटरनेट सिस्टम है जिससे कम्युनिस्ट तानाशाही या फिर क्रांति की सूचनाएं खुद प्रतिबंधित हो जाती है। गूगल और याहू जैसी इंटरनेट कंपनियों ने चीनी सेंसरशिप को स्वीकार कर लिया है। वहां विदेशी पत्रकारों पर प्रतिबंध लगा दिया गया है। प्रतिबंध का उल्लंघन करने वाले दर्जनों विदेशी पत्रकार चीनी जेलों में बंद है। माओं का विचार, माओं की क्रांति से चीन ने पिछली सदी के अस्सी के दशक में ही मुंह मोड़ लिया था। वहां सत्ता मूलत: पूंजीवादी है। आर्थिक उदारीकरण की धारा में वह बहुत तेजी से बहा है। चीन में जहां श्रम कानूनों का अस्तित्व लगभग समाप्त है वहीं बहुराष्ट्रीय कंपनियां सस्ते मानवश्रम और उदार कानूनों का बेजा लाभ अर्जित कर रही है। हाल में मजदूरों ने कई हिंसक प्रदर्शन कर प्रदाता कंपनियों की उत्पादन प्रक्रिया बाधित की है। मजदूर आंदोलन की यह राह चीन में जहां बहुराष्ट्रीय कंपनियों की मजदूर विरोधी नीतियों को उजागर करती है वहीं चीनी कम्युनिस्ट तानाशाही के पूंजीवादी प्रेम को दर्शाती है। वहां भुखमरी-बेकारी जैसी प्रकिया खतरनाक हुई है। चीन को स्वीकार करना चाहिए कि राजनीतिक स्थिरता से ही विकास और अर्थव्यवस्था का गुलाबी रंग बरकरार रखा जा सकता है। इसलिए उसे राजनीतिक सुधारों पर ध्यान देना चाहिए। राजनीतिक बंदियों की रिहाई और उनके साथ लोकतांत्रिक प्रक्रिया ही उसके हित में है। पर चीनी कम्युनिस्ट तानाशाही को यह सुध आए तो कहां से? वह तो अत्याचार और उत्पीड़न को ही एक मात्र विकल्प के रूप में देखता है।
Friday, March 11, 2011
चीन में जनाक्रोश का दमन
अरब-अफ्रीकी देशों में तानाशाही सत्ता के खिलाफ उठे तूफान का असर चीन में भी देखा जा रहा है जहां राजनीतिक और लोकतांत्रिक सुधारों को लेकर लम्बे समय से जनाक्रोश सक्रियता के साथ उपस्थित रहा है। हालांकि वहां जनाक्रोश की सक्रियता के प्रबंधन का तरीका बहुत ही लोमहषर्क और बर्बर है। परिणामत: ऐसे हजारों लोग चीन की जेलों में दमन और उत्पीड़न का अंतहीन दंश झेलने को मजबूर हैं। चीन में ऐसा राष्ट्रीय सुरक्षा कानून है, जिसके अंतगर्त किसी भी नागरिक को बिना मुकदमा चलाये जेल में रखने का अधिकार सत्ता को प्राप्त है और इसके लिए नियत तीन साल की अवधि कभी समाप्त नहीं होती है। हाल में एक लोकतांत्रिक सेनानी को शांति का नोबेल पुरस्कार दिया गया था। उस पर चीन की त्योरियां चढ़ी और उसने नोबेल समिति को धमकाया भी पर जब समिति ने इसकी परवाह नहीं की तो चीन ने अपने समर्थक दर्जनों देशों को नोबेल पुरस्कार समारोह का बहिष्कार करने के लिए उकसाया और सफलता भी पायी। चीन एक अराजक कूटनीतिक ही नहीं बल्कि बर्बर सामरिक शक्ति संम्पन्न देश भी है। सस्ते मानवश्रम और उदार श्रम कानूनों के साथ चीन की सरकारी नीतियों की बिसात पर दुनिया की बड़ी-बड़ी कंपनियों की नजर है। यही कारण है कि दुनिया उसके मानवाधिकार कानूनों के घोर उल्लंघन पर भी उदासीनता बरतती है। ट्यूनीशिया के बाद तानाशाही और भ्रष्ट सत्ता के खिलाफ लोकतंत्र का आंदोलन जब मिस्र में फैला तो चीनी कम्युनिस्ट तानाशाही को आशंका हुई कि कहीं लोकतंत्र का आंदोलन उनके देश में भी न शुरू हो जाए। कारण आज लोकतांत्रिक आंदोलन को सूचना क्रांति और सोशल साइटों ने आसान और शक्तिशाली माध्यम उपलब्ध कराया है। चीन में सोशल ब्लॉगिंग का नेटवर्क बहुत मजबूत है। क्योंकि वहां प्रिंट और इलेक्ट्रॅानिक मीडिया सरकारी नियंतण्रमें है और कम्युनिस्ट तानाशाही के समर्थन में ही खबर देता है। वेब सोशल नेटवर्किग के माध्यम से ही दुनिया को खबर मिलती है कि चीन में आखिर क्या हो रहा है और किस प्रकार लोकतंत्र समर्थकों की आवाज दबाने की सैनिक-पुलिस कार्रवाई चलती है। किस प्रकार से उनके मानवाधिकारों का हनन होता है। दमन की वीभत्स प्रक्रियाएं अधिकतर तानाशाही और शरीयत शाही जैसी सत्ता संस्कृति में देखी जाती हैं। ऐसी सत्ता संस्कृति को अपनी आबादी पर गोलियां बरसाने, बम बरसाने या फिर रासायनिक हमले से भी परहेज नहीं होता है। मिस्र और ट्यूनेशिया में तो गांधी की शांति का यर्थाथ जरूर प्रस्थापित हुआ पर लीबिया में जिस प्रकार से गद्दाफी अपने विरोधियों पर बमों और युद्धक विमानो से हमले करा रहे हैं, उसके परिणामस्वरूप वहां हजारों नागरिक मारे गये हैं। इराक के पूर्व तानाशाह सद्दाम हुसैन ने भी कुर्द आबादी की आजादी की इच्छा का दमन करने के लिए रासायनिक हमले कराये थे। जिसमें हजारों कुर्द मारे गये। रासायनिक हमला करने वाले सद्दाम हुसैन के गुग्रे का नाम ही कैमिकल अली पड़ गया था। उसे अपने कारनामों पर बड़ा गर्व था। बाद में इराक की नागरिक सत्ता ने सद्दाम हुसैन के साथ कैमिकल अली को भी फांसी पर लटका दिया था। चीन की कम्युनिस्ट तानाशाही का नागरिक आंदोलनों को कुचलने का इतिहास भी लोकतांत्रिक नहीं रहा है। थ्येन मान चौक की वीभत्स घटना याद कीजिये। छात्रों की लोकतांत्रिक मांग दबाने के लिए रेल पटरियों पर बैठे छात्रों पर रेलगांडिया दौड़ा दी गयी थी। धरने पर बैठे छात्रों पर टैंकों से हमले कराये गये थे। परिणाम: एक लाख से अधिक छात्रों को मौत की नींद सुलाया गया था। दुनिया के मानवाधिकारवादी उसके लिए चीन कभी माफ नहीं कर सकते। चीनी मीडिया में अरब-अफ्रीकी देशों में चल रही लोकतंत्र की लड़ाई की खबरों पर पहरा बैठा दिया गया है। वहां ऐसा इंटरनेट सिस्टम है जिससे कम्युनिस्ट तानाशाही या फिर क्रांति की सूचनाएं खुद प्रतिबंधित हो जाती है। गूगल और याहू जैसी इंटरनेट कंपनियों ने चीनी सेंसरशिप को स्वीकार कर लिया है। वहां विदेशी पत्रकारों पर प्रतिबंध लगा दिया गया है। प्रतिबंध का उल्लंघन करने वाले दर्जनों विदेशी पत्रकार चीनी जेलों में बंद है। माओं का विचार, माओं की क्रांति से चीन ने पिछली सदी के अस्सी के दशक में ही मुंह मोड़ लिया था। वहां सत्ता मूलत: पूंजीवादी है। आर्थिक उदारीकरण की धारा में वह बहुत तेजी से बहा है। चीन में जहां श्रम कानूनों का अस्तित्व लगभग समाप्त है वहीं बहुराष्ट्रीय कंपनियां सस्ते मानवश्रम और उदार कानूनों का बेजा लाभ अर्जित कर रही है। हाल में मजदूरों ने कई हिंसक प्रदर्शन कर प्रदाता कंपनियों की उत्पादन प्रक्रिया बाधित की है। मजदूर आंदोलन की यह राह चीन में जहां बहुराष्ट्रीय कंपनियों की मजदूर विरोधी नीतियों को उजागर करती है वहीं चीनी कम्युनिस्ट तानाशाही के पूंजीवादी प्रेम को दर्शाती है। वहां भुखमरी-बेकारी जैसी प्रकिया खतरनाक हुई है। चीन को स्वीकार करना चाहिए कि राजनीतिक स्थिरता से ही विकास और अर्थव्यवस्था का गुलाबी रंग बरकरार रखा जा सकता है। इसलिए उसे राजनीतिक सुधारों पर ध्यान देना चाहिए। राजनीतिक बंदियों की रिहाई और उनके साथ लोकतांत्रिक प्रक्रिया ही उसके हित में है। पर चीनी कम्युनिस्ट तानाशाही को यह सुध आए तो कहां से? वह तो अत्याचार और उत्पीड़न को ही एक मात्र विकल्प के रूप में देखता है।
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