Tuesday, March 1, 2011

बंजर जमीन पर


उछलता शेयर बाजार अच्छे बजट का सुबूत नहीं हो सकता
जादूगर की टोपी से खरगोश निकल गया और सब पूछ रहे हैं कि किधर गया, किधर गया! प्रणब मुखर्जी के इस नए बजट की सबसे बड़ी विशेषता यही है कि इसकी कोई विशेषता नहीं है। देश और दुनिया जिस आर्थिक संकट से घिरी हुई सांसें गिन रही है, इसमें जिंदा रहने के दो रास्ते हैं-दम घोंटती इस आर्थिक सुरंग में से बाहर निकलने की जोरदार कोशिश की जाए या फिर इसी में थोड़ी सांस लेने की कवायद की जाए। वित्त मंत्री ने यह दूसरा रास्ता चुना है, क्योंकि पहला रास्ता हिम्मत भी मांगता है और हिकमत भी। ऐसे रास्ते की तरफ जाने की बात आज न कोई सोचता है, न करता है।
यह बजट गवाही दे रहा है कि अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री, योजना आयोग के अर्थशास्त्री उपाध्यक्ष, अर्थशास्त्री गृह मंत्री तथा देश के सर्वाधिक अनुभवी राजनेता वित्त मंत्री के साथ तमाम बैंकिंग तथा वित्तीय संस्थानों के नामी-गिरामी अर्थशास्त्रियों की पूरी फौज के पास आर्थिक सोच की बंजर जमीन भर है, कोई नया विकल्प नहीं।
कहने वाले कह रहे हैं कि यह बजट गरीबों को ध्यान में रखकर बनाया गया है। अगर गरीब का मतलब वोट नहीं होता, तो हमें इसकी जांच करनी चाहिए कि इसमें गरीबों के लिए क्या है। पहली बड़ी बात कि फसल ऋण को एक लाख करोड़ से बढ़ाकर 4.75 लाख करोड़ रुपये किया गया है। बहुत बड़ी रकम है, लेकिन यह कैसे और किनके पास पहुंचेगी, इस बारे में बजट क्या कहता है? पूरे देश की बात अभी छोड़ दें, तो यही देखें कि देश के सबसे नाजुक क्षेत्र विदर्भ के किसानों की आत्महत्या के संदर्भ में केंद्र व राज्य सरकारों ने पिछले पांच वर्षों में कुल मिलाकर कितनी रकम बांटी है? यह हिसाब बेहद अहम है, क्योंकि रुपये बांटकर आप आर्थिक संकट से बच सकते हैं या नहीं, इसका यह टेस्ट केस बनता है।
आत्महत्याएं अब भी जारी हैं और किसानी आज भी मौसम की कृपा पर ही निर्भर है। व्यवस्था अगर हम बना सकते हैं, तो यही कि जब मौसम साथ न दे, तो हम किसान का साथ दें। क्या ऐसी कोई योजना बजट में मिलती है? बजट में कहा गया कि किसानों को सात प्रतिशत की सस्ती दर पर कर्ज देने की पिछली नीति जारी रहेगी और समय पर कर्ज चुकाने वालों को तीन प्रतिशत की विशेष छूट भी मिलेगी। यह अच्छा है या कम अच्छा या फिर विपरीत परिणाम लाने वाला है, इसकी भी कोई जांच तो हो?
तो हम यह पूछें कि वित्त मंत्री जी पिछले साल कितने किसानों ने यह सस्ता कर्ज लिया और उनकी जोत कितनी थी? यह भी बताया जाए कि कितने फीसदी किसान हैं, जो समय पर कर्ज अदा कर पाते हैं और उनकी जोत कितनी है? सरकारी कर्ज का अधिकांश वे हैसियतदार किसान हड़प जाते हैं, जो खेती नहीं करते, खेती का व्यापार करते हैं और फिर वे ही समय पर कर्ज वापस कर तीन फीसदी की छूट भी ले जाएंगे। ऐसे में गरीब कौन है, इसका भी निर्णय करने की जरूरत होगी और यह भी देखने की जरूरत होगी कि जिसके लिए देश का धन दांव पर लगाया जा रहा है, उस तक धन पहुंचा है कि नहीं।
महंगाई की जिस लहर के सामने सरकार ने हथियार डाल दिए हैं, वह बताता है कि हमारा वित्तीय प्रबंधन तथा प्रशासकीय ढांचा कितना खोखला है। जब प्याज हीरा बन गया था, तब भी किसान की जेब में कुछ नहीं आया था और उपभोक्ता की जेब कट गई थी, आज भी प्याज के रास्ते किसान की जेब में कुछ नहीं पहुंच रहा है। कोई है, जो बीच में पानी रोक लेता है। इसे पहचाने और रास्ते से हटाए बगैर किसान व गरीब की बात करना उनका उपहास करना भर है।
शेयर बाजार उछला है, उद्योगों में खुशी दौड़ी है और औद्योगिक घराने बजट से संतुष्ट हैं। सभी इसे विकास को बढ़ावा देनेवाला बजट मान रहे हैं। लेकिन सरकार यह न भूले कि हमारे देश में विकास के दो पैमाने हैं-एक वह विकास, जो पैसे से पैसे बनाने की युक्ति में लगा रहता है, दूसरा वह, जो जीवनावश्यक उत्पादन में से पूंजी पैदा करता है। पूंजी दोनों को चाहिए और दोनों ही पूंजी पैदा करते हैं, लेकिन दोनों के चरित्र में बुनियादी फर्क है। हम देखें कि बड़े पूंजी वाले शिक्षा और स्वास्थ्य में तेजी से पांव फैला रहे हैं। बुरा नहीं है यह, लेकिन सरकार की नजर इस पर होनी ही चाहिए कि बड़े पूंजी वाले पांचतारा अस्पताल न खोलें। सरकार अगर उन्हें जैसा चाहे, वैसा करने की छूट देती है और उन पर सर्विस टैक्स लगाकर कमाई करने की नीति बनाती है, तो यह आत्मघाती है।
हमारे राष्ट्रीय संसाधन कहां और किस तरह खर्च होंगे, इस बारे में हमें साफ नीति बनानी होगी, जिसकी दिशा यही हो सकती है कि अच्छी, सुलभ और सस्ती चिकित्सा व्यवस्था हो। यही बात शिक्षा संस्थानों के बारे में भी लागू होती है। सर्विस इंडस्ट्री के नाम से एक बड़ा छद्म रचा जा रहा है। जो सेवा केवल पूंजी कमाने के लिए की जाती है, उसे सेवा कैसे मानें हम?
जिस बजट से शेयर उछलता है वह स्वस्थ बजट ही होगा, ऐसा मानना ठीक नहीं है। शेयर बाजार को अपनी आर्थिक स्थिति का मानक बनाना नादानी ही नहीं, गहरी चालाकी है। शेयर बाजार में किसका कौन-सा पैसा लगाया जा रहा है? एक का दस बनाने के लोभ से जो विदेशी निवेश शेयर बाजार में आता है, वह जहां ग्यारह की संभावना होती है, वहीं अपना पैसा निकाल कर फुर्र हो जाता है और हमारी अर्थव्यवस्था को डावांडोल कर जाता है। भ्रष्टाचार को थामने, काले धन की ताकत काटने, विदेशों में धन जमा करने का चलन रोकने, सरकारी योजनाओं-परियोजनाओं में से सरकारी स्तर पर ही लूट आदि रोकने में क्या इस बजट के प्रावधान थोड़ी भी मदद करते हैं?
हमारे राष्ट्रीय संसाधन कहां और किस तरह खर्च होंगे, इस बारे में हमें कोई साफ नीति जरूर बनानी होगी।

No comments:

Post a Comment