गद्दाफी को देर सवेर जाना ही होगा-आशा है यह जल्दी होगा। इससे तानाशाह और निरंकुश अरब सरकारों को, और खासतौर पर गद्दाफी को एक और संकेत मिलना चाहिए कि मिस्र, जहां मुबारक ने अपनी सेना को काबू में रखा और 2 फरवरी को तहरीर चौक पर भीड़ पर हमला करने वाले अपने गुंडों को वापस बुला लिया था, के विपरीत कार्रवाई करने, यानी बर्बर ताकत पर भरोसा करने से सरकार बचने वाली नहीं
जन विरोध के जिस चक्रवात ने टय़ूनीशिया के राष्ट्रपति जिने एल-अबेदीन बेन अली और मिस्र के लम्बे अरसे से चले आ रहे शासक होस्नी मुबारक को गद्दी से उतार फेंक दिया, वह कम होने का नाम नहीं ले रहा है। फारस की खाड़ी में यमन और बहरीन से मग़्ारेब में मोरक्को और अल्जीरिया तथा दक्षिण में सूडान और डिज्बोटी तक-पूरा अरब जगत बग़ावत की चपेट में है। अब तो सऊदी अरब और कुवैत की सत्ताएं भी खतरे में लग रही हैं। एक देश में हो रहे विरोध दूसरे देशों में विरोध को प्रेरणा दे रहे हैं-लोग खुद करके सीखने की प्रक्रिया से गुज़रते हैं। लीबिया में पानी सिर से गुज़र रहा है। कर्नल मुअम्मर गद्दाफी के सामने एक अभूतपूर्व और शक्तिशाली विद्रोह है: भूमध्य सागर से लगा 600 किलोमीटर का क्षेत्र हाथ से निकल चुका है, जिसके बेनग़ाज़ी और मिसराता जैसे प्रमुख शहरों पर विरोधियों का कब्जा हो गया है। सेना के कुछ हिस्से विरोधियों से मिल गए हैं और मंत्रियों (न्यायमंत्री सहित) तथा कूटनीतिज्ञ बड़ी संख्या में त्यागपत्र दे चुके हैं। 1969 से सत्ता पर काबिज़ गद्दाफी ने जनतांत्रिक शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शनों का जवाब बर्बर दमनचक्र शुरू करके दिया है जिसमें 1,000 से ज्यादा लोग मारे जा चुके हैं। शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों के विरुद्ध उसकी सेना और भाड़े के सैनिक भारी हथियारों का इस्तेमाल कर रहे हैं। गद्दाफी ने ऐलान कर दिया है कि वह गद्दी छोड़ने नहीं जा रहा और कि, वह खून की आखिरी बूंद तक लड़ेगा। त्रिपोली में एक उन्मादी बयान के जरिये गद्दाफी ने विरोधियों को नशेलची, लती, कट्टरपंथी मुसलमान और अमेरिकन एजेंट कह डाला और धमकी दी, ‘लीबिया सुलगने लगेगा।
उसका समर्थक आधार बेहद हलका है, और देश या विदेश में उसके ऐसे कोई दोस्त नहीं जो उसकी मदद में आगे आ सकें। इस बीच विरोधी सेना त्रिपोली के नज़दीक पहुंच रही है। गद्दाफी का सत्ता से बाहर होना अब बस कुछ समय की बात है। परंतु गद्दाफी के बाद नई सत्ता की स्थापना का काम आसान नहीं होगा। लीबिया में कोई राजनीतिक दल, ट्रेड यूनियन, नागरिक संगठन या गैर सरकारी संगठन नहीं है। लेकिन कुल 65 लाख की आबादी वाले इस नन्हें से लीबिया में तेल बहुत है। यह अफ्रीका का तीसरा सबसे बड़ा तेल उत्पादक देश है, और इसमें तेल के सुरक्षित भंडार- 44 अरब बैरल, यानी महाद्वीप में सबसे अधिक हैं। इसीलिए अमेरिका की अगुआई में पश्चिमी ताकतें लीबिया की मुक्ति के लिए राष्ट्रीय मोर्चा जैसे संगठनों को आगे बढ़ा रही हैं जो उस राजतंत्र को सत्ता सौंपना चाहेगा जिसे 1969 में राजा इदरीस को अपदस्थ करते हुए गद्दाफी ने खत्म कर दिया था। अमेरिका की नज़र लीबिया के तेल पर है। जो नवरूढ़िवादी पहले एक न्यू अमेरिकन सेंचुरी नामक प्रोजेक्ट के साए में जुड़े, उन्होंने अब एक नए, फॉरेन पॉलिसी इनीशिएटिव ़के नाम से यह मांग की है कि गद्दाफी को हटाने के लिए राष्ट्रपति ओबामा को सैनिक कार्रवाई करनी चाहिए। इस बात पर ध्यान दिया जाना चहिए इस प्रकार की जोरदार मानवतावादी अपीलें 2009 में नहीं की गईं थीं जब इस्रइल ने ग़ाज़ा पर हमला किया था जिसमें हज़ारों नागरिक मारे गए थे। ये अपीलें सऊदी अरब, कुवैत और बहरीन की गुलाम की तरह घोर अमेरिका -परस्त तानाशाहियों के मामले में भी नहीं की जा रहीं हैं। खैर है कि लीबिया के विरोध पक्ष ने बाहरी सैनिक हस्तक्षेप के विचार को पूरी तरह से रद्द कर दिया है, हालांकि यह संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद द्वारा उठाए गए मानवतावादी और उड़ान रहित क्षेत्र जैसे कदमों का स्वागत करता है, जिसके चलते गद्दाफी नागरिकों पर हमला करने के लिए युद्धक विमानों का इस्तेमाल नहीं कर सकेगा-जो कि यह क्रूर तानाशाह कर सकता है। लीबिया की एक और खासियत है इसकी प्रभावशाली और स्पष्ट कबीलाई पहचानें (जो किसी एक राष्ट्रीय संस्था में एक होकर जुड़ नहीं पाई) हैं। गद्दाफी का अपना कबीला अल-गद्दाफा लीबिया के 15 प्रमुख कबीलों में एक है। इसकी वफादारी गद्दाफी के लिए निर्णायक साबित होगी। अंत में वह अपने घोर वफादार, पूरी तरह से हथियारों से लैस 3,000 रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स पर भरोसा कर सकता है, जिसमें मुख्यतया उसके अपने कबीले के लोग हैं लेकिन अगर हालिया रुझानों पर ध्यान दिया जाए तो अल-गद्दाफा की वफादारी बेकार साबित हो सकती है। लीबिया के अनेक भागों में विरोधियों को दबाने के लिए भेजे गए सैनिक दस्ते विरोधियों के साथ हो गए हैं। अल-गद्दाफा कबीलाई एका में दरारें पड़ने की खबरें मिल रही हैं। गद्दाफी का लीबिया कु-प्रशासन और निर्मम रूप से दमनकारी शासन की घिनौनी मिसाल है। वहां के राजा इदरीस को अपदस्थ करने, लीबिया के तेल के राष्ट्रीयकरण और अखिल-अरब एकता को बढ़ावा देने से शुरुआत में इस तानाशाह की कुछ साख पैदा हुई थी लेकिन इसने उसे लुटा दिया। तेल की सम्पदा के वाबजूद एक तिहाई लीबियाई बेरोजगार हैं। देश लगातार पूंजीवादी वैश्वीकरण की नवउदारवादी नीति को लागू करता गया है जिससे लोगों की गरीबी में बढ़ोतरी हुई और उनकी जीवन परिस्थितियां बिगड़ी हैं। गद्दाफी के पास लोगों की समस्याओं का कोई समाधान नहीं। फिर भी वह अमेरिका का प्रिय बन गया, जिसमें उसको आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में एक मज़बूत हिस्सेदार दिखाई दिया था। विकीलीक्स केबल्स के अनुसार त्रिपोली में अमेरिकी राजदूत ने उसे कट्टरतावादी इस्लाम की वैचारिक अपील को भोथरा करने वाली एक प्रमुख ताकत माना था। गद्दाफी को देर सवेर जाना ही होगा-आशा है यह जल्दी होगा। इससे तानाशाह और निरंकुश अरब सरकारों को, और खासतौर पर गद्दाफी को एक और संकेत मिलना चाहिए कि मिस्र, जहां मुबारक ने अपनी सेना को काबू में रखा और 2 फरवरी को तहरीर चौक पर भीड़ पर हमला करने वाले अपने गुंडों को वापस बुला लिया था, के विपरीत कार्रवाई करने, यानी बर्बर ताकत पर भरोसा करने से सरकार बचने वाली नहीं। एक जनतांत्रिक प्रकार की और व्यापक आधार की सरकार के गठन के लिए समझौता करना ही अच्छा होगा, और यह अब भी मुमकिन है। समस्या यह है कि पश्चिम एशिया और उत्तरी अफ्रीका के ज्यादातर मुल्कों में ऐसा कर पाना अगर नामुमकिन नहीं तो, दिनों दिन मुश्किल तो होता ही जा रहा है। इनमें जनता के विरोध प्रदर्शनों के पीछे जनतंत्र और उत्तरदाई शासन, खाद्य सुरक्षा, रोजगारों तथा समाज और राजनीति के आधुनिकीकरण के लिए जन आकांक्षाएं हैं। अरब शासकों ने दसियों साल से अपने समाजों को रूढ़िवाद और पिछड़ेपन के जिस सांचे में ढाल कर रखा था, वह अब टूट रहा है। वहां भी अब स्वाधीनता और निरंकुश शासन से मुक्ति की तथा एक खुले समाज की ज़बरदस्त ललक है। (लेखक प्रख्यात स्तम्भकार हैं)
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