Sunday, March 13, 2011

दलाई लामा के बाद तिब्बत की लड़ाई


 वर्तमान में वैश्विक मंच पर दलाई लामा तिब्बत की आजादी और अस्मिता के लिए लड़ी जा रही लड़ाई और अहिंसक आंदोलन का एकमात्र चेहरा हैं। उनके अथक प्रयासों की वजह से ही तिब्बतियों पर चीन द्वारा एक अरसे ढाए जा रहे जुल्म को लेकर अंतरराष्ट्रीय समुदाय में तिब्बतियों के प्रति सहानुभूति पैदा हुई और उनकी लड़ाई को पूरी दुनिया का समर्थन प्राप्त हुआ। दलाई लामा ने गांधीवादी नीतियों के तहत जिस तरह तिब्बती समुदाय को लगातार आंदोलनरत रखा है उससे चीन के प्रति शेष दुनिया के देशों की सरकारों और जनता के भीतर एक जबरदस्त आक्रोश पैदा हुआ। इससे समझा जा सकता है कि दलाई लामा का होना क्यों तिब्बतियों के लिए एक वरदान सरीखा है, खासकर ऐसे समय में जबकि अरब जगत के साथ-साथ चीन की जनता के मन में भरा आक्रोश अब सड़कों पर उतरने और खुलकर विरोध दिखाने को तैयार होता दिख रहा है। इससे चीन की ताकतवर कम्युनिस्ट पार्टी भी घबराई हुई है और वह नहीं चाहती कि चीन में भी क्रांति का कोई बिगुल शुरू हो। ठीक ऐसे मौके पर तिब्बतियों के सर्वमान्य धर्मगुरु दलाई लामा द्वारा पद से हटने के एक अहम सियासी फैसले ने तिब्बतियों के राजनीतिक संघर्ष को अनिश्चितता और अटकलों के चक्रवात में धकेल दिया है। वर्ष 1959 में तिब्बती विद्रोह की 52वीं वर्षगांठ के अवसर पर धर्मशाला में दिए गए एक भाषण में दलाई लामा ने अपनी राजनीतिक जिम्मेदारियां निर्वासित तिब्बती सरकार के निर्वाचित प्रधानमंत्री को सौंपते हुए कहा कि अब समय आ गया है जबकि उनका राजनीतिक उत्तराधिकारी तिब्बती जनता द्वारा चुना जाए। राजनीतिक प्रमुख का पद छोड़ने के दलाई लामा के इस निर्णय ने तिब्बती सियासत से जुड़ी मौजूदा उलझनों को सुलझाने के बजाय कई नए सवालों को जन्म दे दिया है, जिनका उत्तर खोज पाना फिलहाल आसान नहीं दिखता। पिछले पांच दशक से भी अधिक समय से तिब्बती बौद्धों के आध्यात्मिक एवं राजनीतिक सिरमौर रहे दलाई लामा ने तिब्बत राजनीति के आंतरिक और बाह्य आयामों को बहुत कामयाब ढंग से संचालित किया है। चूंकि दलाई लामा अपने लोगों के एकमात्र प्रवक्ता थे, इसलिए भारत और चीन सहित अनेक बड़े देशों के राजनयिकों को तिब्बती आंदोलन से उत्पन्न चुनौतियों से निपटने में कहीं ज्यादा आसानी होती थी, क्योंकि किसी भी ज्वलंत मुद्दे पर दलाई लामा का कथन पूरे तिब्बती समुदाय का कथन माना जाता था और तिब्बती समुदाय भी उनके द्वारा लिए गए निर्णय को तहेदिल स्वीकार करता आया है। हालांकि सब कुछ नकारात्मक ही हो ऐसा आवश्यक नहीं, क्योंकि दलाई लामा के बाद भविष्य अनिश्चितताओं और अवसरों दोनों से परिपूर्ण होने की उम्मीद है। यहां हम सबसे पहले बात करते हैं तिब्बती बौद्धों की, जिनके लिए दलाई लामा न केवल उनकी राजनीतिक लड़ाई, बल्कि उनके अस्मिता के संघर्ष के भी पर्याय रहे हैं। अगर अगले हफ्ते तिब्बती संसद दलाई लामा के इस दूरगामी प्रभाव वाले फैसले पर अपनी मुहर लगा देती है तो भी आध्यात्मिक रूप से दलाई लामा तिब्बती बौद्धों के सिरमौर बने रहेंगे, परंतु इसमें कोई संदेह नहीं है कि उनके जीवित रहते उनके स्थान पर किसी दूसरे को अपना राजनीतिक मुखिया चुनना तिब्बतियों के लिए भावनात्मक रूप से एक अत्यंत कठिन अनुभव होगा। यह भी किसी से छिपा नहीं है कि दलाई लामा अपने व्यक्तिगत करिश्मे की वजह से ही अंतरराष्ट्रीय समुदाय में तिब्बतियों को इतनी ज्यादा सहानुभूति दिला पाए हैं। फिलहाल इस समय दूसरे किसी भी तिब्बती राजनेता में उनके जैसा राजनीतिक कौशल और तिब्बती परंपरा की समझ रखने वाला व्यक्तिगत करिश्मा नहीं दिखाई पड़ता है। अगर दलाई लामा की इच्छा के अनुसार तिब्बती अपना नया राजनीतिक नेता चुनते हैं तो उसके लिए तिब्बतियों को एकजुट रखना भी किसी बड़ी चुनौती से कम नहीं होगा। आज तक तिब्बत आंदोलन का सियासी एजेंडा दलाई लामा स्वयं तय करते आए हैं। अब यदि तिब्बत स्वातं˜य के लिए जनता द्वारा छेड़े गए आजादी के आंदोलन की लोकतांत्रिक जड़ें और अधिक मजबूत होती है जैसा कि खुद दलाई लामा ने भरोसा जताया है तो सभी महत्वपूर्ण निर्णय लोकतांत्रिक प्रक्रिया द्वारा लिए जाएंगे। यह सब इतना आसान भी नहीं होगा, क्योंकि इस प्रक्रिया में अंतर्निहित तनाव और जटिलताओं से भी तिब्बतियों को खुद ही जूझना होगा। किसी भी स्थिति में उनके बीच आपसी मनमुटाव की दशा में बाह्य शक्तियां खासकर चीन अनुचित और अपने हित में फायदा उठाने की कोशिश अवश्य करेंगी। हालांकि दलाई लामा के जीवित रहते चिंता करने की जरूरत नहीं है, क्योंकि उनका मार्गदर्शन तिब्बतियों को पहले की तरह ही बाद में भी अनवरत रूप से मिलता रहेगा। चीन की आशंकाओं को दूर करने के लिए दलाई लामा यह बार-बार दुहराते आए हैं कि वह तिब्बत को चीन से अलग नहीं करना चाहते हैं और फिलहाल उनका इरादा तिब्बत को अधिकतम राजनीतिक-सांस्कृतिक स्वायत्तता दिलाना मात्र है। यह चीन की अदूरदर्शिता और अहंकार ही था कि उसने दलाई लामा के शांति प्रस्तावों को न केवल सिरे से खारिज कर दिया, बल्कि वह लगातार उनके खिलाफ आग उगलता रहा। चीन के नेता दंभी स्वर में हुंकार भरते रहे कि दलाई लामा की मौत के बाद तिब्बती आंदोलन की हवा स्वत: ही निकल जाएगी। चीन की कोशिश सदैव यही रही कि दलाई लामा को किसी भी तरह से दुनिया के देशों से काटकर अथवा अलगाकर रखा जाए ताकि उसकी मंशा देर सबेर पूरी हो सके। दलाई लामा चीन के इस इरादे को अच्छी तरह समझते थे। यही कारण था कि उन्होंने कभी भी आक्रामक रुख नहीं अपनाया और दुनिया के विभिन्न देशों का दौरा करके अपने लिए समर्थन जुटाते रहे और तिब्बतियों की जायज मांगों को मनवाने के लिए उनसे चीन पर दबाव डालने की बात कहते रहते। चीन कभी भी दलाई लामा के रहते अपनी चाल में कामयाब नहीं हो पाया, लेकिन देखना होगा कि उनके द्वारा राजनीतिक पद छोड़ने के बाद बनने वाले नए उत्तराधिकारी कितना कुछ कर पाते हैं और चीन के इरादों पर पानी फेर पाते हैं। दलाई लामा के इस अहम निर्णय से मात्र दो दिन पहले भी चीन के अधिकारियों ने उन्हें भिक्षु के वेश में छिपा भेडि़या करार देकर अपनी दूषित मानसिकता का परिचय दिया। अब जबकि दलाई लामा ने अपनी सियासी जिम्मेदारियों से किनारा करने का फैसला ले लिया है तो आने वाले वक्त में चीन के लिए भी मुश्किलें बढ़ गई हैं। लोकतांत्रिक माध्यम से चुने गए तिब्बत के नए राजनीतिक नेतृत्व का चीन के प्रति रवैया समझौतावादी भी हो सकता है और टकरावपूर्ण भी। इसलिए चीन को एक नया राजनीतिक मोर्चा नए सिरे से खोलने के लिए तैयार रहना होगा। अपना राजनीतिक ओहदा समाप्त करने का निर्णय करके दलाई लामा ने एक तरह से राजनीतिक चतुराई का ही परिचय दिया है। पिछले कुछ समय से तिब्बत की राजनीति की दिशा नियंत्रित-निर्देशित करने के चीनी प्रयास तेज हो गए हैं। दलाई लामा, पंचेन लामा और करमापा लामा जैसे तिब्बती आध्यात्मिक गुरुओं के उत्तराधिकार के मुद्दों पर भी चीन का हस्तक्षेपवादी रवैया दिनोंदिन बढ़ता जा रहा है। इन परिस्थितियों को ध्यान रखते हुए उनके इस निर्णय में यह मंशा जरूर छिपी है कि कम से कम तिब्बती राजनीतिक नेतृत्व चुनने की प्रणाली में स्थिरता आनी चाहिए। दलाई लामा ने खुद को राजनीतिक नेतृत्व से दूर करने का फैसला काफी सोच-समझकर लिया है। इससे एक तरफ चीन का हस्तक्षेप कम हो सकता है तो दूसरी तरफ आम तिब्बतियों में भी किसी तरह की भ्रम की स्थिति को दूर की जा सकती है। चीन द्वारा जबरन कब्जा करने के बाद से ही तिब्बत भारतीय विदेश नीति के लिए एक अत्यंत संवेदनशील मुद्दा रहा है। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)

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