लोकतंत्र पटरी से उतरा, तो पाकिस्तान के अस्तित्व को खतरा
ईशनिंदा कानून के विरोध में सलमान तासीर के बाद अब अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री शहबाज भट्टी की जान गई है। लेकिन तथ्य यह है कि पाकिस्तान में आतंकवादी घटनाओं और आत्मघाती हमलों में कमी आ रही है। इसलिए अब इसे दुनिया की सबसे खतरनाक जगह नहीं कह सकते। इसके बजाय यहां भ्रष्टाचार और कुशासन आतंकवाद से भी ज्यादा गंभीर मामला बन गया है। दरअसल सरकार न्यायालय के आदेशों को लागू करने के प्रति अनिच्छुक है और यह गैर जिम्मेदाराना रवैया पाकिस्तान के लोकतंत्र के लिए खतरा है। यदि लोकतंत्र फिर पटरी से उतरता है, तो उसके अस्तित्व के लिए खतरा हो सकता है।
सबसे पहले 30 मई, 2002 को न्यूयार्क टाइम्स ने पाकिस्तान को सबसे खतरनाक जगह घोषित किया था। उसके बाद अमेरिकी सैन्य सलाहकार डेविड किलकलन ने 23 मार्च, 2009 को कहा था कि अगले छह महीनों में पाकिस्तान खत्म हो सकता है। लेकिन पाकिस्तान ने उसी साल तालिबान को स्वात में परास्त कर दिया। आत्मघाती हमलों के खिलाफ जनमत निर्माण में पाकिस्तानी मीडिया ने बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। राजनीतिक दल और सेना, दोनों स्वात में तालिबान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई के पक्ष में थी। पिछले साल पाकिस्तान में 3,393 आतंकी घटनाएं हुईं, जो 2009 की तुलना में 11 फीसदी कम हैं। इस दौरान आत्मघाती हमलों में भी 22 प्रतिशत की कमी आई। विगत वर्ष 68 आत्मघाती हमले हुए, जबकि 2009 में ऐसे हमलों की संख्या 87 थी।
लिहाजा आतंकवाद के बजाय आज गरीबी, निरक्षरता, अन्याय, भ्रष्टाचार और कुशासन पर ज्यादा ध्यान देना चाहिए। छह करोड़ पाकिस्तानी आज गरीबी रेखा से नीचे गुजर-बसर करते हैं। देश में पांच से नौ वर्ष की उम्र के कुल दो करोड़ बच्चे हैं, जिनमें से आधे ही स्कूल जाते हैं। ज्यादातर सरकारी स्कूलों में भवन और शिक्षक नहीं हैं। गरीब बच्चे धार्मिक स्कूलों में शिक्षा पाते हैं, जबकि धनी लोगों के बच्चे अंगरेजी माध्यम के स्कूलों में पढ़ते हैं। यह विभाजन ही पाकिस्तान में आतंकवाद का मुख्य स्रोत है। ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल के आंकड़े बताते हैं कि पाकिस्तान में भ्रष्टाचार बढ़ा है और यदि इस पर अंकुश नहीं लगाया गया, तो यह आतंकवाद से ज्यादा बड़ा खतरा बन जाएगा। एक समान शिक्षा व्यवस्था, कानून का राज और राजनीतिक सुधार से ही आतंकवाद का सामना किया जा सकता है। तासीर, शहबाज भट्टी और दो पाकिस्तानी नागरिकों के हत्यारे रेमंड डेविस के खिलाफ पाकिस्तान कानून के तहत जरूर मुकदमा चलाना चाहिए।
जहां तक आतंकवाद के खिलाफ पश्चिमी देशों के समर्थन का सवाल है, तो अमेरिका द्वारा किए जाने वाले ड्रोन हमले तो कानून की मूल भावना के ही खिलाफ हैं। इन हमलों में आतंकवादी कम और निर्दोष ज्यादा मारे जाते हैं। ड्रोन हमलों ने पढ़े-लिखे युवाओं को उग्रवाद की तरफ धकेला है और इसने आतंकवाद को ज्यादा फैलाया है। आतंक के खिलाफ जंग में पाकिस्तानी सेना ने 3,000 से ज्यादा सैनिक गंवाए हैं और कभी-कभी अमेरिकी ड्रोन हमारे सुरक्षा बलों को भी अपना निशाना बनाते हैं। ज्यादातर पाकिस्तानी आतंकवादी कबायली इलाके से आते हैं और पाकिस्तान के कुल क्षेत्रफल का मात्र तीन प्रतिशत इलाका ही कबायली है। कबायली इलाकों की पचास लाख की आबादी पाकिस्तान की कुल आबादी 17 करोड़ के दो प्रतिशत के बराबर है। इससे साफ पता चलता है कि पूरा पाकिस्तान आतंकवाद का सामना नहीं कर रहा। कबायली इलाकों को राज्य व्यवस्था, कानून का राज, शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाएं चाहिए।
एक बड़ा सवाल यह है कि पाकिस्तान में आतंकियों की घुसपैठ कैसे होती है। दरअसल पाकिस्तान-अफगानिस्तान के 2,000 किलोमीटर से ज्यादा लंबी सीमा पर 350 से ज्यादा अवैध प्रवेश के रास्ते हैं। नाटो और अमेरिकी सैनिक सीमा की सुरक्षा में विफल रहे हैं और सीमा को सुरक्षित किए बगैर हम पाकिस्तान और अफगानिस्तान में आतंकवाद को रोक नहीं सकते।
पाकिस्तान को विफल लोकतंत्र नहीं बनना, तो सरकार को अदालत का सम्मान करना पड़ेगा। एक उदाहरण काफी है। सुप्रीम कोर्ट गायब हुए लोगों का रहस्य सुलझाने में विफल रही, क्योंकि सेना और सरकार ने इस मामले में सहयोग नहीं किया। इस तरह का रवैया अलोकतांत्रिक तत्वों को ही बढ़ावा देगा। ध्यान रखना चाहिए कि खराब लोकतंत्र भी अच्छी तानाशाही से बेहतर होता है। लिहाजा पाकिस्तानी नेताओं को तानाशाह की तरह व्यवहार करने से बचना होगा। यदि कानून मजाक बन जाएगा, तो लोकतंत्र के भी मजाक बनते देर न लगेगी।
पाकिस्तान में मीडिया स्वतंत्र है, लेकिन अभी उसे सत्ता के एवं दूसरी तरह के भी भारी दबाव का सामना करना पड़ रहा है। पिछले वर्ष देश में 18 पत्रकार मारे गए। बलूचिस्तान और फाटा के कई इलाकों में मीडिया का प्रवेश निषेध है। अलबत्ता मीडिया को भी अपनी स्वतंत्रता का उपयोग करते हुए स्वच्छ व पारदर्शी लोकतंत्र के लिए पाकिस्तान को आतंक मुक्त बनाने की दिशा में काम करना होगा। कुछ टीवी एंकर तासीर के हत्यारे का समर्थन करते दिखे थे, लेकिन यहां के ज्यादातर पत्रकार कानून के राज का समर्थन और हत्या का विरोध करते हैं।
जिस ईशनिंदा कानून ने तासीर और भट्टी की बलि ली, वह कानून 1991 में दिए गए सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हिस्सा है और इसे पाकिस्तान की संसद ने 1992 में पारित किया था। देश के सभी दलों में इस पर सहमति है। इस कानून में बदलाव की जरूरत है, लेकिन कोई भी इसके लिए तैयार नहीं है।
ईशनिंदा कानून के विरोध ने भले एक और बलि ले ली, फिर भी भ्रष्टाचार आज पाकिस्तान की सबसे बड़ी समस्या है|
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