तेजी से बदलते वैश्विक शक्ति संतुलन के बीच भारत को एक ऐसे विदेश मंत्री की जरूरत है जो इन जटिल स्थितियों में बड़ी कुशलता से भारतीय हितों की रक्षा कर सके। नित नए घटनाक्रम उनकी कठिन परीक्षा ले रहे हैं। ताजा मामला लीबिया का संकट है। इससे पहले संयुक्त राष्ट्र में एसएम कृष्णा पांच मिनट तक अपने भाषण के बजाय पुर्तगाली विदेश मंत्री का भाषण पढ़कर अपनी नाकाबिलियत साबित कर चुके हैं। निश्चित तौर पर मानवीय भूलें किसी से भी हो सकती हैं। शायद इसी बात को ध्यान में रखकर विदेश मंत्री ने इस घटना को दुर्भाग्यपूर्ण बताते हुए अपने बचाव में यह दलील दे डाली कि उनके सामने बहुत से कागज बिखरे पड़े थे और उन्होंने गलती से पुर्तगाली विदेश मंत्री का भाषण उठा लिया। गलती से गलत भाषण उठाकर पढ़ना शुरू करना तो समझ में आता है, किंतु यह समझ से परे है कि भाषण देने के दौरान यह गलती पकड़ में न आए। यह कहना गलत नहीं होगा कि यदि संयुक्त राष्ट्र में भारत के प्रतिनिधि हरदीप पुरी ने उनका ध्यान इस गलती की ओर नहीं खींचा होता, तो वह मशीनी तरीके से पूरा भाषण पढ़ते ही चले जाते। देखा जाए तो यह एक छोटी-सी घटना है, क्योंकि रोजनेताओं की योग्यता के बारे में कम से कम अब तो लोगों के मन में किसी भी तरह का कोई संदेह नहीं रह गया है। लेकिन इससे हमारे प्रशासन और राजनीति के अंतर्संबंधों के बारे में जो संकेत मिलते हैं, उनकी आसानी से अनदेखी नहीं की जानी चाहिए। सभी देशों में राजनेताओं के भाषण इस आधार पर तैयार किए जाते हैं कि देश की नीतियां क्या हैं? मंत्री इन भाषणों को देखते हैं, उन पर चर्चा करते हैं और आवश्यकतानुसार संशोधन करते हैं। सचिव स्तर के अधिकारी मंत्रियों को उस कार्यक्रम के बारे में संक्षेप में बता देते हैं, ताकि उस पर मंत्री का दृष्टिकोण स्पष्ट रहे। यह एक सामान्य प्रक्रिया है। अब यह मंत्री पर निर्भर करता है कि वह ब्रीफिंग को लेता किस तरीके से है। एक लोकतांत्रिक सरकार मूलत: स्थायी प्रशासन को राजनीतिक नेतृत्व प्रदान करने के सिद्धांत पर आधारित होती है। ऐसी स्थिति में यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि यदि राजनेता स्थायी कार्यकारी को, जिसे हम नौकरशाहों द्वारा चलाया जाने वाला प्रशासन कहते हैं, नेतृत्व प्रदान नहीं कर पा रहा है तो फिर उसका मतलब ही क्या है। स्थायी कार्यकारी में अनुत्तरदायित्व की आश्ंाका अधिक होती है क्योंकि वे एक निश्चित प्रक्रिया द्वारा चयनित होकर प्रशासन में आते हैं और उन्हें हटाया जाना इतना आसान नहीं होता। राजनीतिक कार्यकारी स्थायी नहीं होती। वह जनता के प्रति उत्तरदायी होती है। इसीलिए उसे स्थायी कार्यकारी के ऊपर रखा गया है ताकि प्रशासन का कार्य नौकरशाही की इच्छाओं के अनुरूप न चलाकर लोगों की इच्छाओं के अनुरूप चलाया जा सके। लेकिन एक स्थायी कार्यकारी को नियंत्रित कर उसे जनता की इच्छा के अनुसार दिशा तभी दी जा सकेगी, जब राजनीतिक कार्यकारी के सदस्य, जिन्हें हम मंत्री के नाम से जानते हैं, पर्याप्त दक्ष हों। यदि ऐसा नहीं है, तो स्वाभाविक है कि स्थायी कार्यकारी का प्रमुख, जिसे हम सचिव कहते हैं, अपने अनुसार मंत्रियों को चलाने की कोशिश करेगा। यह तो हुआ एक पक्ष। इसका दूसरा पक्ष भी है, जो हम 2 जी स्पेक्ट्रम मामले में देख सकते हैं। संचार मंत्री के तत्कालीन सचिव डीएस माथुर ने यदि उस समय संचार मंत्री ए. राजा की आज्ञा का पालन करते हुए फाइल पर दस्तखत कर दिए होते, तो 2 जी स्पेक्ट्रम घोटाना एक साल पहले ही हो गया होता। जो दृढ़ता डीएस माथुर ने दिखाई, वह बाद के सचिव नहीं दिखा सके। जाहिर है कि सारा दारोमदार न तो उस राष्ट्र में प्रचलित राजनीतिक प्रणाली पर है और न ही प्रशासनिक नियम और कानूनों पर, बल्कि उन दोनों महत्वपूर्ण नेतृत्वकर्ताओं के व्यक्तित्व पर है, जिनमें से एक को हम मंत्री कहते हैं और दूसरे को सचिव। यदि इसकी प्रशासनिक व्यवस्था को देखना चाहें, तो नेहरू के समय में 1957 में हुए मूंदड़ा कांड को ले सकते हैं। तब जीवन बीमा निगम की सवा करोड़ की राशि निजी क्षेत्र के शेयर खरीदने में लगा दी गई थी। मामले के तूल पकड़ने पर तत्कालीन वित्त मंत्री टीटी कृष्णामचारी और वित्त सचिव एचएम पटेल ने इसका दोष एकदूसरे पर मढ़ा। फलस्वरूप सरकार ने एमसी छागला की अध्यक्षता में एक आयोग का गठन कर दिया। छागला आयोग ने अपनी रिपोर्ट में उल्लेख किया किया कि संवैधानिक तौर पर मंत्री उस कार्य के लिए जिम्मेदार है, जिसे उसके सचिव ने किया है। मंत्री न तो सचिव के कुकृत्य का सहारा ले सकता है और न ही अपने काम को नकार सकता है। फलस्वरूप वित्त मंत्री को त्यागपत्र देना पड़ा। कोई भी मंत्री किसी भी बात को आधार बनाकर अपनी गलतियों को दूसरों के मत्थे नहीं मढ़ सकता। हमारे विदेश मंत्री एसएम कृष्णा से इसमें चूक हो गई। क्या सचमुच बेहतर यह नहीं होता कि अपना बचाव करने की बजाय वह अपनी गलती को स्वीकार करते, ताकि अन्य मंत्रीगण भी इससे सीख लेकर भविष्य में होने वाली ऐसी गलतियों से बचते। (लेखक पूर्व प्रशासनिक अधिकारी हैं)
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