Friday, March 18, 2011

गिने-चुने दिन ही बचे हैं गद्दाफी के


लीबिया का सुलगना कई मामलों में मिस्र और ट्यूनीशिया जैसे देशों से अलग है। व्यापक जनविरोध के बावजूद कर्नल गद्दाफी झुकने का नाम नहीं ले रहे। यहां तक कि कई बाहरी मुल्कों और संयुक्त राष्ट्र के दबाव के आगे भी वे अपने ही रंग में दिख रहे हैं। लीबिया में कुछ इलाकों में विद्रोहियों ने सत्ता को अपने कब्जे में ले लिया था किंतु गद्दाफी की सेना उनके खिलाफ कामयाबी हासिल करती भी दिख रही है। हालांकि गद्दाफी की तानाशाही व्यवस्था से ऊबे लोग अब लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए कटिबद्ध हैं और गद्दाफी उनकी आवाज दबाने को। इससे उपजे विद्रोह और संघर्ष के माहौल में हजार से अधिक लोग अब तक अपनी जान दे चुके हैं और अभी कितनों की बलि और चढ़ेगी, इसका अंदाजा किसी को नहीं है। यह जरूर है कि भविष्य में कुछ दिनों तक जनविद्रोह और जारी रहा तो गद्दाफी के लिए सत्ता पर बने रहना आसान नहीं होगा। गद्दाफी की तानाशाही व्यवस्था मिस्र और ट्यूनीशिया में रही तानाशाही व्यवस्था से कहीं अधिक मजबूत है और सेना में उनकी पकड़ अभी इतनी ढीली नहीं हुई है कि सेना का ज्यादातर हिस्सा आम लोगों के साथ हो जाए। फिर उन्हें रूस, ईरान, वेनेजुएला, क्यूबा और चीन जैसे देशों का समर्थन हासिल है। उनकी सेना के पास आधुनिक रूसी टेक्नालॉजी भी हासिल है। यह भी काबिलेगौर है कि 1969 से जब कर्नल गद्दाफी के नेतृत्व मे सैन्य अधिकारियों के एक समूह ने किंग इदरिस की सत्ता को उखाड़ फेंका था, तब से वहां का धनी और जनजातीय समुदाय अपने हितों की खातिर गद्दाफी के सुर में सुर मिलाता रहा है। यह समुदाय आज भी उनके साथ है। उस दौरान वि के कई देशों ने अपने हित के लिए लीबियाई सरकार से संबंध बनाए और इस तरह उसे वैधानिकता हासिल हो गई। पूरे वैिक परिप्रेक्ष्य की गहराई से पड़ताल करने पर मैं पाता हूं कि इस्लामी कट्टरपंथी, साम्यवाद, फासिस्टवाद सबके दिन अब लद गए हैं और लोकतंत्र को व्यापक आधार मिल रहा है। लोकतंत्र को गति देने में तीव्र वैीकरण ने काफी मदद की है। इंडोनेशिया और फिलीपींस में सत्ता की सोच में आये बदलाव का कारण यही रहा। हाल तक यह सोच बनी हुई थी कि पश्चिम एशिया और उत्तरी अफ्रीकी देशों में सामाजिक- राजनीतिक बदलाव बहुत दूर की कौड़ी है लेकिन आज हम ऐसा कतई नहीं सोच रहे। दरअसल, ग्लोबलाइजेशन से आई तकनीकी क्रांति ने लोगों को अभूतपूर्व तरीके से सशक्त बना दिया है और वे एकजुट होकर अपनी मनपसंद सत्ता का खुलकर इजहार करने लगे हैं। मिस्र, ट्यूनीशिया, यमन, बहरीन जैसे देशों के लोंगों की तरह ही लीबियाई जनता ने भी दिखा दिया है कि वे जनतंत्र चाहते हैं और उसके लिए सीने पर गोली खाने को भी तैयार हैं। जाहिर है, लीबिया में भी मिस्र की तरह सेना का रोल अहम होगा। सकारात्मक बात यह है कि लीबियाई सेना के काफी सैनिक तथा सत्ता प्रतिष्ठान के कई अंग भी बगावती जनता के साथ खड़े हैं। गद्दाफी ऐसी स्थिति से निबटने के लिए बड़ी संख्या में दूसरे देशों के भाड़े के सैनिकों का इस्तेमाल कर रहे हैं। उनका सबसे लज्जाजनक काम यह है कि वे अपने ही लोगों पर हवाई हमला कर बगावत पर अंकुश लगाने में जुटे हैं। भारत के साथ दिक्कत यह है कि वह लीबिया में भी लेबनान की तरह जटिल राजनीतिक-कूटनीतिक परिस्थिति का सामना कर रहा है। उसके आगे दोराहा है लेकिन हमें हर हाल में लोकतांत्रिक शक्तियों का साथ देना चाहिए। यह जरूर है कि लीबिया की बिगड़ी घरेलू हालत की आड़ में जो देश वहां की तेल संपदा पर कब्जा करना चाहते हैं उनके साथ जाने से भी हम बचें। मुझे यही लगता है कि गद्दाफी के दिन अब गिने-चुने हैं क्योंकि उनकी अपनी जनता ही उनके खिलाफ है। देखना यह होगा कि गद्दाफी के बाद क्या वहां सचमुच लोकतंत्र का स्थापना हो पाती है या कोई कट्टर शक्ति ही हावी हो जाती है।


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