Wednesday, March 23, 2011

लीबिया की गुत्थी


लोकतंत्र के नाम पर पश्चिम एक बार फिर अपने स्वार्थ साध रहा है
आज से करीब महीना-डेढ़ महीना पहले जब अरब जगत और उत्तरी अफ्रीका में राजनीतिक उथल-पुथल का दौर शुरू हुआ था और बरसों से सताई जनता ने अपने आक्रोश को मुखर करना शुरू किया था, तब बहुत लोगों को लगने लगा था कि यह ज्वार जनतंत्र और सामाजिक न्याय की स्थापना के लिए उठ रहा है। जबकि ऐसा है नहीं। आज जो कुछ लीबिया में घट रहा है, उससे यह बात स्पष्ट हो चुकी है कि गुत्थी कितनी उलझी हुई है और इस संकट का समाधान निकट भविष्य में होनेवाला नहीं। इसीलिए अपने राष्ट्रहित में इस सामरिक और राजनयिक चुनौती का ठंडे दिमाग से विश्लेषण आवश्यक है।
यह तथ्य है कि मिस्र में हुस्नी मुबारक को सत्ता छोड़ने के लिए विवश होने के बावजूद वहां कोई क्रांतिकारी बदलाव नहीं हुआ है। सूडान हो या ट्यूनीशिया या फिर यमन, सभी जगह आंदोलनकारी आज लीबिया की ओर देख रहे हैं। अफगानिस्तान और इराक में सत्ता परिवर्तन की अमेरिकी दावेदारी पहले ही खोखली साबित हो चुकी है। किसी भी निष्पक्ष व्यक्ति को लगता है कि अमेरिका का किसी दूसरे बैरी देश की राजनीति में हस्तक्षेप का यह एक बहाना है।
लीबिया में भले मानवीय आधार पर निहत्थे नागरिकों के वंशनाशक नरसंहार को रोकने के लिए संयुक्त राष्ट्र के प्रस्ताव के अनुसार ही सैन्य कार्रवाई की जा रही है, पर इस बात को नजर अंदाज करना कठिन है कि एक बार संयुक्त राष्ट्र का अनुमोदन प्राप्त हो जाने के बाद अमेरिका के खुद सामने आने की जरूरत नहीं बची है। फ्रांस और ब्रिटेन यह बीड़ा सहर्ष उठा चुके हैं। यह बात भी आज छिपी नहीं है कि मित्र राष्ट्र लीबिया में जो कुछ कर रहे हैं, वह संयुक्त राष्ट्र या अरब लीग के प्रस्तावों से कहीं आगे बढ़ चुका है। लीबिया का गृहयुद्ध उस पर एक आक्रामक हमले में बदल चुका है। इसकी आलोचना चीन, रूस, ब्राजील और भारत ने की है। जर्मनी भी पश्चिमी मित्रों से सहमत नहीं।
दरअसल लीबिया की चुनौती सिर्फ उसकी चौहद्दी तक सीमित नहीं, इसके तार पूरे अरब जगत और मध्ययुगीन दकियानूसी से ग्रस्त इसलामी कट्टरपंथ से बुरी तरह उलझे हुए हैं। इस समय चारों तरफ से घिरे और तमाम धमकियों के बावजूद गद्दाफी पश्चिमी ईसाई क्रूसेड के विरुद्ध जेहाद का नारा बुलंद कर चुके हैं। ऐसे में सबसे बड़ा धर्मसंकट भारत के लिए पैदा हो गया है। हमारे नेताओं से न तो उगलते बनता है और न ही निगलते। जब तक अमेरिका लीबिया को दुष्ट देशों का नेता, आतंकवाद का निर्यातक और उसे प्रोत्साहित करने वाला समझता था, तब तक चुप रहकर हम बचे रह सकते थे। फिर जब अमेरिका ने गद्दाफी से सुलह कर ली, तब हमें लगने लगा कि अब तो काम और भी आसान हो गया है। अमेरिकी नीति के साथ समायोजन कर हम अपना काम पूरा कर लेंगे।
लेकिन अचानक हुए बदलाव ने हमें फिर चकरा दिया है। देश में अल्पसंख्यकों की बहुतायत को देखते हुए हम न तो अमेरिका या पश्चिम का पूरा समर्थन कर सकते हैं और न ही महाशक्ति बनने का सपना देखते और अमेरिकी समर्थन के मोहताज रहते हुए उसकी निंदा का खतरा उठा सकते हैं। गनीमत है कि इस वक्त रूस, चीन और ब्राजील की टोली में शामिल हम अपने सैद्धांतिक आचरण की दलील देते रह सकते हैं।
कड़वा सच यह है कि हमने अरब दुनिया या पश्चिम एशिया क्षेत्र से जुड़े अपने राष्ट्रहित के बारे में ठंडे दिमाग से कभी सोचा ही नहीं है, लीबिया तो दूर की बात है। हमारा राजनय हमेशा उधार के चश्मों से ही चीजों को देखता-परखता रहा है। आंतरिक राजनीति में अल्पसंख्यक वोट बैंक को भुनाने के चक्कर में तुष्टिकरण की प्रवृत्ति ने हमें वर्तमान जोखिम में फंसा दिया है। हम अब तक इसी में खुश थे कि कितनी बड़ी संख्या में हिंदुस्तानियों को खाड़ी देशों, इराक या लीबिया में रोजगार मिल रहा है या हमारे कारोबारी-उद्यमी वहां कैसी कमाई कर रहे हैं। हमने कभी यह सोचा ही नहीं कि अगर कभी इन देशों में उत्पीड़क तानाशाही का तख्ता पलटा, तब हमारी क्या हालत होगी।
कभी-कभार सिर्फ रस्म अदायगी के तौर पर यह बात दोहराई जाती है कि हमारी ऊर्जा सुरक्षा के लिए अरब जगत कितना संवेदनशील है और इसीलिए वहां हमारी नीति आदर्शों या सिद्धांतों की नहीं, बल्कि राष्ट्रहित की कसौटी पर कसी जानी चाहिए। अलबत्ता इस विषय में भी विधिवत पड़ताल की जरूरत है। क्या ये आंकड़े सुलभ हैं कि तेल-गैस की हमारी सालाना जरूरतों के कितने हिस्से की आपूर्ति लीबिया करता है? इस वक्त अपने भले-बुरे का विश्लेषण करने के लिए इस बात को ध्यान में रखना बेहद जरूरी है कि रूस, कजाकिस्तान, म्यांमार और नाइजीरिया तथा ईरान की भूमिका हमारी ऊर्जा सुरक्षा के लिए कितनी महत्वपूर्ण है।
गद्दाफी कह चुके हैं कि यह लड़ाई लंबी चलने वाली है। लेकिन विगत सोमवार को मित्र देशों की कार्रवाई के बाद स्पष्ट है कि गद्दाफी के दिन अब गिने-चुने हैं। अपनी तेल संपदा के मद में बौराई और अमेरिकी आकाओं पर बुरी तरह निर्भर अरब दुनिया भी जानती है कि महाशक्ति देश के समर्थन के अभाव में उनकी हस्ती को पस्ती में बदलते देर नहीं लगेगी। 1970 के दशक में तेल को एक हथियार के रूप में इस्तेमाल करने की उनकी कोशिश का भी यही हश्र हुआ था।
पर इसका अर्थ यह नहीं कि हमारे लिए आगे का मार्ग सहज होगा। दुनिया भर में भले कट्टरपंथी इसलामी तानाशाहियां कमजोर होंगी, लेकिन इस हारकी प्रतिक्रिया में व्यक्तिगत या छोटे-छोटे उन्मादग्रस्त जेहादी आतंकवादियों के जोखिम के प्रति सतर्क रहने की जरूरत बढ़ती जाएगी। हमारी सरकार यह कहकर पल्ला नहीं झाड़ सकती कि हम घटनाक्रम की सतर्क निगरानी कर रहे हैं।

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