पिछले दिनों जब वाशिंगटन और क्रेमलिन ने ‘मीजर्स फॉर द फर्दर रिडक्शन ऐंड लिमिटेशंस ऑफ स्ट्रैटजिक ऑफेंसिव आर्म्स’ नाम की संधि को दस वर्षों के लिए प्रभावी बनाया, तो दुनिया में स्थायी शांति आने की संभावनाएं नया आकार लेती दिखीं। लेकिन जिस तरह से अमेरिका और रूस हथियारों का आधुनिकीकरण करने या कुछ रणनीतिक हथियारों में वृद्धि करने के साथ-साथ सेना का आधुनिकीकरण करने की रणनीति पर कार्य कर रहे हैं, उससे भ्रम की स्थिति बनती नजर आ रही है। ये स्थितियां तब और जटिल लगने लगती हैं, जब सुपर पावर बनने के लिए चीन अपने रणनीतिक हथियारों को लगातार धार दे रहा हो और पाकिस्तान परमाणु हथियारों के जखीरे में तेजी से वृद्धि करता जा रहा है।
अमेरिकी प्रशासन की अगले 10 वर्षों में 84.5 अरब डॉलर की धनराशि नाभिकीय हथियारों के भंडार को आधुनिकीकृत करने के लिए खर्च करने की योजना है। इसका मतलब तो यही हुआ कि स्टार्ट के दायरे में लाकर रख-रखाव पर भारी खर्च वाले पुराने नाभिकीय हथियारों को समाप्त किया जाएगा, जो कि मानवीय हितों के लिहाज से भी खतरनाक हैं। यानी अमेरिका एक तीर से दो निशाने लगा रहा है। इससे उसे शांति का प्रहरी होने का खिताब मिल जाएगा और वास्तविक शक्ति में कोई कमी भी नहीं आएगी। लेकिन इसके दूसरे पक्ष की अनदेखी की जा रही है, क्योंकि ये दोनों ही देश हथियारों को तकनीकी रूप से समृद्ध करने और इनकी क्षमता बढ़ाने की दिशा में सक्रिय हैं। क्रेमलिन से भी सूचना है कि रूस अपने सैन्य क्षेत्र में भारी खर्च करने जा रहा है, जो शीतुयद्ध काल से कहीं अधिक होगा। इससे उसके पड़ोसी खासे भयभीत दिख रहे हैं।
रूसी न्यूज एजेंसी के अनुसार, वहां की वायुसेना को 2020 से पहले 600 से अधिक लड़ाकू विमान और 1,000 हेलीकॉप्टर प्राप्त हो जाएंगे। इन विमानों में से अधिकतम सुखोई-34 और सुखोई-35 लड़ाकू विमान होंगे, जबकि हेलीकॉप्टरों में एमआई-8 गनशिप और एमआई-26 हैवी लिफ्ट कार्गो क्राफ्ट शामिल होंगे। इन हेलीकॉप्टरों में 100 से ज्यादा हेलीकॉप्टर दुनिया के बेहतरीन हेलीकॉप्टरों में से होंगे। रूस एस-400 और एस-500 रक्षा मिसाइल तंत्र भी तैयार कर रहा है। वह कुछ नए अंतरमहाद्वीपीय बैलेस्टिक मिसाइल भी तैयार कर रहा है, जो नाभिकीय मुखास्त्र ले जाने में सक्षम होंगे। रूसी नौसेना को भी 35 नए कोर्वेट्स, 15 फ्रिगेट्स और 20 सबमैरिन (जिनमें से आठ नाभिकीय शक्ति और हथियारों से संपन्न होंगे) दिए जाएंगे। दरअसल रूसी नौसेना अमेरिकी नौसेना के मुकाबले कमजोर और कम आधुनिकीकृत है, इसलिए रूस चाहता है कि 2020 तक वह इस मामले में अमेरिका की बराबरी हासिल कर ले। यद्यपि रूस का दावा है कि वह विदेशी सैनिक हार्डवेयर नहीं खरीदेगा, लेकिन ऐसी सूचनाएं हैं कि वह मिस्ट्रल श्रेणी के हेलीकॉप्टर फ्रांस से लेने की तैयारी में है। रूस और फ्रांस के बीच इस प्रकार की खरीद-बिक्री को देखते हुए रूस के पड़ोसी देशों, खासकर बाल्टिक राज्यों और जॉर्जिया में संदेह का वातावरण बन रहा है। अब सवाल यह उठता है कि रूस इस प्रकार की तैयारी किस उद्देश्य से कर रहा है। क्या रूस पुन: सोवियत युग में लौटना चाहता है या फिर पूर्वी यूरोप में अमेरिकी मिसाइल रक्षा तंत्र की तैनाती को देखते हुए ऐसी तैयारी कर रहा है, ताकि भावी चुनौतियों से ठीक से निपटा जा सके? सोवियत यूनियन के पतन के बाद रूस एक दशक से भी अधिक समय तक वैश्विक राजनीति में निष्क्रिय-सा रहा, लेकिन पिछले कुछ वर्षों से राजनीतिक क्षेत्र में एक बड़ी भूमिका अदा कर रहा है, खासकर मध्य-पूर्व और यूरोप में। इस समय मॉस्को के लिए सबसे बड़ी चुनौती है, उसके गलियारे में अमेरिकी मौजूदगी। इसे काउंटर बैलेंस करने के लिए वह अपनी रक्षा प्रणाली को समृद्ध बनाना चाहता है। हालांकि अमेरिका ने पूर्वी यूरोप में तैयार किए जा रहे अपने मिसाइल रक्षा कवच पर रूस को भविष्य में होने वाले ईरानी मिसाइल हमलों का हवाला देकर संतुष्ट करने की कोशिश की, लेकिन बात नहीं बनी।
जो भी हो, रक्षा विशेषज्ञ मानते हैं कि रूस इस क्षेत्र में अब अपनी शक्ति का प्रदर्शन करना चाहता है, ताकि अंतरराष्ट्रीय क्षेत्र में उसकी उपस्थिति को महसूस किया जा सके। रूस का ईरानी न्यूक्लियर कार्यक्रम में जुड़ाव और फलस्तीनियों को सहयोग इसका प्रमाण है। ऐसे में शांति की उम्मीद बेमानी होगी।
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