Tuesday, March 29, 2011

रेडियोंधर्मी जल का रिसाव तेज़


नाटो के हाथ कमान


नई सोच की जरूरत


भारत-पाक वार्ता पर लेखक की टिप्पणी
भारत और पाकिस्तान के गृह सचिवों की दो दिवसीय बातचीत 28 मार्च को शुरू हुई। यह लगभग एक साल बाद होने वाली पहली आधिकारिक मुलाकात है। महत्वपूर्ण बात यह है कि थिंपू वार्ता के बाद दोनों पक्ष सभी महत्वपूर्ण लंबित मामलों पर चर्चा करने को राजी हो गए हैं। पाकिस्तान के गृह सचिव चौधरी कमर जमां छह सदस्यीय प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व कर रहे हैं। भारत के गृह सचिव गोपाल कृष्ण पिल्ले और उनके पाकिस्तानी सहयोगी चौधरी कमर जमां के बीच होने वाली इस भेंट के दौरान कई मुद्दों पर चर्चा होने की संभावना है। भारत ने हमेशा माना है कि आपसी मसलों का समाधान बातचीत से ही संभव है। नई दिल्ली को उम्मीद है कि स्थायी संबंधों के लिए वह इस्लामाबाद के साथ मतभेदों को पाट सकेगा। इसमें कोई शक नहीं कि नकारात्मक सोच वाले पाकिस्तानी नेताओं से निपटना हमेशा ही दिक्क्त भरा रहा है। आर्मी और आइएसआइ के अपने अलग एजेंडे हैं। परवेज मुशर्रफ एक वृहद अफ-पाक प्रभाव क्षेत्र कायम करने का अपना सपना पाले हुए हैं और इस क्षेत्र में वह भारत को दरकिनार करना चाहते हैं। इसे किसी कीमत पर स्वीकार नहीं किया जाना चाहिए। बातचीत का आगे का रास्ता बड़ा ही ऊबड़-खाबड़ है। समस्या यह नहीं है कि गुलाबों के साथ कांटे भी हैं, बल्कि समस्या तो गुलाबों के रूप में केवल कांटों के पेश किए जाने की है। ऐसे में हमारे सामने सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या पाकिस्तान अपने पुराने कल के खेल को तो नहीं दोहराएगा? इस सवाल का सीधा और ईमानदारी भरा जवाब तो नहीं है, लेकिन इतना जरूर कहा जा सकता है कि इस बारे में पाकिस्तान का रिकार्ड बहुत ही खराब रहा है। हमने आगरा तथा दूसरे ऐतिहासिक मौकों पर ताकतवर आर्मी चीफ जनरल परवेज मुशर्रफ का व्यवहार देखा ही है। मौजूदा गतिरोध को दूर करने के शार्टकट तलाशने की उम्मीद तो बेकार है। इन सालों में हम यही तो करते आए हैं। हम घूमफिर कर वापस पहले की स्थिति पर आते रहे हैं। इसी वजह से पाकिस्तान की शह पर चल रहे आतंकवाद का सवाल तकनीकी या कानूनी बहानों में उलझ कर रह गया है। पाकिस्तान की शह पर मुंबई में 26 नवंबर, 2008 को हुए खूनी आतंकवादी खेल खेलने वाले उग्रवादियों के बारे में इस्लामाबाद के रुख पर ही गौर करें। इस मुद्दे पर पाकिस्तानी नेताओं के साथ की गई कोशिशें अत्यंत ही निराशाजनक साबित हुई हैं। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के सामने चुनौती यह है कि वह पाकिस्तान से निपटने के पेचीदा काम को कैसे अंजाम दें। प्रधानमंत्री कभी-कभी इसे जितना आसान समझ लेते हैं, उतना आसान यह काम है नहीं। मैं समझता हूं कि भारत को बहुआयामी अल्पावधि तथा दीर्घावधि रणनीतियां बनानी चाहिए ताकि पाकिस्तान के नागरिक तथा सैन्य नेताओं को शांति तथा विकास के सही मार्ग पर प्रेरित किया जा सके। सबसे पहले नई दिल्ली को पाकिस्तान की सैन्य सोच का अंदाजा लगाना होगा, क्योंकि पाकिस्तान की नीतियों और रणनीतियों की कुंजी, खास कर भारत, अफगानिस्तान और सुरक्षा तथा आतंकवाद के मुद्दों के बारे में जनरलों और आइएसआइ के हाथों में है। क्या नई दिल्ली इस दुष्चक्र को भेद सकती है? जब तक हम सीधे आइएसआइ और सैन्य प्रतिष्ठान से बातचीत नहीं करेंगे, यह काम मुश्किल ही रहेगा। अब जब वार्ता प्रक्रिया शुरू हो गई है, मैं समझता हूं कि भारतीय नीति निर्माताओं को पाकिस्तान की बौखलाहट से निपटने के लिए बिल्कुल नई सोच अपनानी होगी। आशा है कि इस्लामाबाद के नेता, नई दिल्ली के साथ वार्ता की अपनी नई पारी, खुले दिमाग से शुरू करेंगे और आर्मी तथा आईएसआई में मौजूद शरारती तत्वों को पाकिस्तान की भारत मैत्री ऐक्सप्रेस को पटरी नहीं उतारने देंगे। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)

विद्रोहियों ने गद्दाफी के गृहनगर को कब्जे में लिया


नाटो ने संभाली लीबिया पर हमलों की कमान त्रिपोली, एजेंसियां : अमेरिका और यूरोप की गठबंधन सेना के लड़ाकू विमानों ने सोमवार को गद्दाफी के कबायली गृहनगर सेरते पर कहर बरपाया। पश्चिमी देशों की इस कार्रवाई से उत्साहित लीबियाईलोकतंत्र समर्थकों का हौसला बढ़ गया है और वे सेर्त पर कब्जा करने के करीब पहुंच गए हैं। सिर्ते का तानाशाह कर्नल मुअम्मर गद्दाफी के हाथ से निकलना लीबिया में चल रहे संघर्ष का रुख बदल सकता है। सेर्त से सीधा रास्ता त्रिपोली को जाता है। सोमवार की सुबह सिर्ते में एक के बाद एक नौ धमाके हुए। इन धमाकों ने गद्दाफी के गृहनगर की सुरक्षा व्यवस्था को तहस-नहस कर दिया। सिर्ते से लोगों के भागने की खबरें आ रही हैं। दर्जनों गाडि़यों में परिवारों को बैठ कर त्रिपोली की ओर जाते देखा गया। अपुष्ट खबरों के मुताबिक लोकतंत्र समर्थकों ने गद्दाफी समर्थकों को खदेड़ दिया है। विपक्ष के प्रवक्ता ने अल-जजीरा न्यूज चैनल से कहा, हमारी सेना ने गठबंधन सेनाओं की सहायता से बिन जावेद, रास लानुफ, यूकेला, ब्रेगा और अजदाबिया को अपने कब्जे में ले लिया है। लोकतंत्र समर्थक रविवार की रात सेर्त में भी घुस गए हैं। शहर में कोई शस्त्रधारी नहीं था। उन्हें वहां तक पहुंचने में कोई समस्या नहीं हुई। इस बीच लीबिया के प्रमुख पश्चिमी शहर मिसराता में गद्दाफी की सेनाओं और लोकतंत्र समर्थकों के बीच संघर्ष जारी है। गद्दाफी की सेना टैंकों और तोपों से इस शहर पर हमला कर रही रही है, जो करीब छह दिन से लोकतंत्र समर्थकों के कब्जे में है। नाटो ने कमर कसी : उत्तर अटलांटिक संधि संगठन (नाटो) ने रविवार को लीबिया के खिलाफ अभियान की कमान पूरी तरह संभाल ली है। अभी तक यह अभियान अमेरिकी नेतृत्व में चल रहा था। 28 देशों के इस संगठन के महासचिव आंद्रेस फॉग रासमुसैन ने कहा, हमारा लक्ष्य लीबियाई नागरिकों की गद्दाफी के हमलों से रक्षा करना है। उन्होंने कहा कि हम संयुक्त राष्ट्र के प्रवधानों को पूरी तरह लागू करने की कोशिश करेंगे। न कम, न ज्यादा। रासमुसैन के अनुसार, इस हस्तांतरण में 48 से 72 घंटे लगेंगे। ऐसे में अगले दो-तीन दिनों तक गठबंधन सेनाएं नाटो के साथ लीबिया पर हमलों में साथ रह सकती हैं। कतर ने भी मान्यता दी : कतर ने सोमवार को लीबिया का लोकतंत्र समर्थकों की नेशनल काउंसिल को मान्यता प्रदान कर दी। उन्हें मान्यता देने वाला कतर पहला देश बन गया है। कतर ने कहा कि गद्दाफी देश पर शासन करने का अधिकार खो चुके हैं। इसके पहले रविवार को कतर ने गद्दाफी प्रशासन से पूरी तरह मुक्त हो चुके पूर्वी क्षेत्र के कच्चे तेल उत्पाद को अंतरराष्ट्रीय बाजार में पहुंचाने के लिए सहमत हो चुका था। खाड़ी देशों की परिषद जीसीसी ने कतर के इस कदम को सही ठहराया है। नो फ्लाई जोन कब तक? : अमेरिकी रक्षा मंत्री रॉबर्ट गेट्स ने कहा कि उन्हें नहीं पता कि लीबिया में नो फ्लाई जोन कब तक लागू रहेगा। यह जानकारी सीबीएस न्यूज टीवी चैनल ने अपनी रिपोर्ट में दी है। समाचार एजेंसी आरआईए नोवोस्ती के अनुसार संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने लीबिया पर उड़ान निषिद्ध क्षेत्र घोषित करने को मंजूरी दी थी। उस मंजूरी में यह बात भी शामिल थी कि लीबियाई नागरिकों को मुअम्मर गद्दाफी के हमलों से बचाने के लिए सभी आवश्यक कदम उठाए जाएं। गेट्स ने कहा, मैं नहीं समझता कि इस बारे में किसी को कुछ पता है। गेट्स ने कहा, मैं समझता हूं कि सैन्य अभियान कारगर साबित हुआ है। मैं समझता हूं कि हम काफी सफल हुए हैं। आपको पता है कि मेरे दिमाग में इस बात को लेकर कभी कोई संदेह नहीं था कि हम उड़ान निषिद्ध क्षेत्र को तत्काल लागू कर सकते हैं, और (लीबियाई शासक मुअम्मार गद्दाफी के) हवाई कवच को तोड़ सकते हैं। ज्ञात हो कि लीबिया में ऑडेसी डॉन नामक सैन्य अभियान, अभी तक 13 देशों द्वारा संयुक्त रूप से चलाया जा रहा है। इन देशों में अमेरिका, ब्रिटेन व फ्रांस प्रमुख रूप से शामिल हैं|

भारत ने की पाक के खिलाफ पेशबंदी


गृहसचिव स्तर की बातचीत में भारत ने नकली भारतीय नोटों के मामले में पाकिस्तान के खिलाफ जबरदस्त पेशबंदी की। इसके तहत नकली भारतीय नोटों के कारोबार में पाकिस्तानी अधिकारियों के शामिल होने से सबूतों के साथ 65 पन्नों की एक विस्तृत रिपोर्ट भी दी गई है। रिपोर्ट में डेविड हेडली का हवाला देते हुए बताया गया है कि किस तरह नकली भारतीय नोटों का इस्तेमाल भारत विरोधी आतंकी गतिविधियों के लिए किया जा रहा है। भारत ने पाकिस्तान को साफ कर दिया है कि दोनों पड़ोसियों के बीच संबंधों को सामान्य बनाने के लिए नकली भारतीय नोटों के इस कारोबार पर तत्काल रोक लगाना जरूरी है। केंद्र सरकार के उच्च पदस्थ सूत्रों के अनुसार नकली भारतीय नोटों के कारोबार में पाकिस्तान के शामिल होने का कच्चा-चिट्ठा बयां करने वाली यह रिपोर्ट खुफिया विभाग की मदद से तैयार की गई है। रिपोर्ट में विदेशी फारेंसिक लेबोरेटरी की जांच रिपोर्ट के साथ बताया गया है कि किस तरह से नकली भारतीय नोटों में उसी स्याही और कागज का इस्तेमाल किया जा रहा है, जो खुद पाकिस्तान अपने नोटों को छापने में इस्तेमाल करता है। यह पूरा कारोबार आइएसआइ के वरिष्ठ अधिकारी ब्रिगेडियर शौकत मोहम्मद सूफी की देखरेख में चल रहा है। इस सिलसिले में 2007 के बाद सूफी बैंकाक व ढाका का 12-12 बार और कोलंबो का 14 बार दौरा कर चुका है। रिपोर्ट में सूफी के इन दौरों की तारीख के साथ उससे मिलने वालों के बारे में विस्तार से बताया गया है। पाकिस्तान को सौंपी गई रिपोर्ट में ं ढाका स्थित पाक उच्चायोग के अधिकारियों रत्तान गिलानी साहब, गुलाम अली मिरानी, गुलाम शब्बीर और वीजा काउंसलर आफताब अफजल की नकली भारतीय नोटों के कारोबार में भूमिका का विस्तृत ब्योरा दिया गया है। इसके अनुसार रत्तान ढाका के पल्टन बाजार के इमरान मुल्ला के साथ लगातार संपर्क में है और उसके माध्यम से नकली भारतीय नोटों को भारत भेजने में सक्रिय भूमिका निभा रहा है। भारत ने यह भी बताया है कि किस तरह नकली भारतीय नोटों के कारोबार में लगे ढाका, नेपाल, कोलंबो और बैंकाक स्थित पाकिस्तान उच्चायोग के आयोग के अधिकारियों को पिछले साल अक्टूबर तक कमीशन दिया जाता रहा है। अक्टूबर 2010 के बाद से इन अधिकारियों को इसके लिए हर महीने निश्चित भत्ता दिया जाने लगा है। भारत ने पाकिस्तान से इस कारोबार को तत्काल बंद करने को कहा है|

Monday, March 28, 2011

लीबिया : जारी है जीत की जंग


परवेज ने माना पाक खतरनाक देश


डेविस की रिहाई के खिलाफ याचिका लाहौर : पाकिस्तान में दो लोगों की हत्या के मामले में अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआइए के अनुबंधकर्ता रेमंड डेविस को छोड़े जाने पर पाकिस्तान की अदालत में याचिका दायर गई है। वकील जावेद इकबाल जाफरी ने लाहौर उच्च न्यायालय में याचिका दायर की और कानून मंत्री बाबर अवान, पंजाब प्रांत के मुख्यमंत्री शहबाज शरीफ, न्यायाधीश युसफ औजला और अन्य अधिकारियों से स्पष्टीकरण मांगा कि उन्होंने डेविस की दोषमुक्ति और उसकी रिहाई को क्यों सुगम बनाया। जाफरी ने न्यायालय से यह भी कहा कि वह इन अधिकारियों से एक शपथपत्र मांगे कि क्या उन्हें डेविस की दोषमुक्ति और एक विशेष विमान में सवार होकर पाकिस्तान से उसकी रवानगी के बारे में पहले से पता था। उन्होंने कहा कि उच्च न्यायालय ने गृहमंत्री को निर्देश दिया था कि डेविस का नाम उन लोगों की सूची में डाला जाए जिनके पाकिस्तान से बाहर जाने पर प्रतिबंध है। उन्होंने यह भी कहा कि एक न्याय अधिकारी और मंत्रालय ने न्यायालय को आश्वासन भी दिया था कि इस आदेश का पालन किया जाएगा। जाफरी ने कहा कि जब डेविस को रिहा किया तब भी न्यायालय का आदेश अपनी जगह पर था क्योंकि न्यायालय ने अपने आदेश को निरस्त नहीं किया था। न्यूयॉर्क, एजेंसी : पाकिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ ने अपने देश को बहुत खतरनाक करार दिया है। मशहूर पत्रिका टाइम को दिए साक्षात्कार के दौरान मुशर्रफ से पूछा गया था कि क्या वह पाकिस्तान को दुनिया का सबसे खतरनाक देश मानते हैं, तो उन्होंने इस बात की हामी भरते हुए कहा, यह बहुत खतरनाक है। मुझे यह कबूल करना होगा। मुशर्रफ ने अफगानिस्तान को सबसे खतरनाक देश बताया। वह वर्ष 2008 में सत्ता छोड़ने के बाद से लंदन में निर्वासित जीवन बिता रहे हैं। मुशर्रफ पाकिस्तान की पूर्व प्रधानमंत्री बेनजीर भुट्टो की हत्या के मामले में वांछित भी हैं। यह पूछे जाने पर कि पाकिस्तान के लिए बड़ा खतरा कौन है चरमपंथ या भारत। मुशर्रफ ने कहा, इस वक्त आतंकवाद पाकिस्तान के सामने सबसे बड़ा खतरा है, लेकिन आप तुलना नहीं कर सकते। ऐसा नहीं सोच सकते कि पाकिस्तान में हमेशा ऐसे हालात रहेंगे। उन्होंने कहा, भारत की 90 फीसदी सेना का रुख पाकिस्तान की तरफ है। हम कभी भारत की उपेक्षा नहीं कर सकते, जो हमारे देश के लिए वाकई खतरा है। यह पूछे जाने पर कि ट्यूनीशिया और मिस्र के शासकों की तरह उन्होंने भी जनभावना को समझते हुए पद छोड़ा था तो मुशर्रफ ने कहा, मुझे इस तुलना पर आपत्ति है। मैंने शांतिपूर्ण ढंग से सत्ता छोड़ी थी। ऐसे में दोनों शासकों के साथ मेरी तुलना नहीं की जा सकती। लीबिया के संदर्भ में उन्होंने कहा, जनभावना सर्वोपरि होनी चाहिए। लीबिया में फिलहाल गृहयुद्ध जैसे हालात हैं। इसका राजनीतिक समाधान होना चाहिए। पाकिस्तान लौटने और राष्ट्रपति पद का चुनाव लड़ने की अपनी योजना के बारे में पूछे जाने पर मुशर्रफ ने कहा, मैं बहुत सहज हूं। मैं दुनियाभर में जा रहा हूं और व्याख्यान दे रहा हूं। इसके लिए लोग मुझे अच्छा भुगतान कर रहे हैं। उन्होंने कहा, मैंने नौ वर्षों तक शासन किया। मुझे पता है कि आज पाकिस्तान मुश्किल का सामना कर रहा है। वहां नेतृत्व का अभाव है। मैं अपने मुल्क को इस मुश्किल से बाहर निकालने के लिए जाना चाहता हूं। मुशर्रफ ने कहा कि भारत की वजह से पाक ने परमाणु हथियार बनाए और इस पर सभी पाकिस्तानियों को नाज है।

Sunday, March 27, 2011

जापान संकट : समुद्र में भी पहुंचा परमाणु विकिरण


जापान के क्षतिग्रस्त फुकुशिमा परमाणु संयंत्र के करीब समुद्र के पानी में रेडियोधर्मी आयोडीन की मात्रा वैध स्तर से 1250 गुना ज्यादा पाई गई है। ऐसी भी आशंका जताई जा रही है कि संयंत्र में मौजूद रेडियोधर्मी पदार्थो से युक्त पानी भूजल में मिल रहा है। वहीं जापान से चीन पहुंचे दो यात्रियों में रेडियोधर्मिता की मात्रा सुरक्षित स्तर से काफी ज्यादा पाई गई है। इस बीच 11 मार्च के विनाशकारी भूकंप और सुनामी से 10151 लोगों की मौत की पुष्टि हो चुकी है और 17,053 लोग अब भी लापता हैं। भूकंप और सुनामी से तबाह इलाके में शनिवार को बर्फवारी होने से सफाई और पुनर्निर्माण का काम प्रभावित हुआ है। संयंत्र संचालक कंपनी टोक्यो इलेक्टि्रक पावर कंपनी (टेप्को) ने संयंत्र के करीब समुद्र के पानी की जांच में रेडियोधर्मी आयोडीन की मात्रा वैध स्तर से 1,250.8 गुना ज्यादा पाई। समुद्र में पानी की यह जांच सुमद्र में तट से 300 मीटर अंदर की गई थी। शुक्रवार को जापान के परमाणु सुरक्षा आयोग के प्रवक्ता हिदेहिको निशियामा ने कहा था कि इस बात की काफी संभावना है कि रिएक्टर तीन का भीतरी कवच क्षतिग्रस्त हो गया है। प्रधानमंत्री नाओतो कान ने शुक्रवार को मौजूदा स्थिति को बेहद अप्रत्याशित बताया था। चीन में भी विकिरण जापान से चीन पहुंचे दो लोगों में रेडियोधर्मिता की मात्रा सुरक्षित स्तर से काफी ज्यादा पाई गई है। चीन के गुणवत्ता निगरानी और निरीक्षण विभाग ने कहा, टोक्यो से झियांगसू प्रांत के वुक्शी शहर पहुंचे यात्रियों में रेडियोधर्मिता की मात्रा गंभीर रूप से काफी ज्यादा पाई गई है। एजेंसी ने कहा कि यह यात्री जापान के नागानो और साइतामा प्रशासकीय क्षेत्रों से आए हैं। वुक्शी में एक अधिकारी ने कहा, विकिरण उनके कपड़ों पर था, उनके शरीर पर नुकसान नहीं पहुंचा है। स्थानीय समाचार पत्र शंघाई डेली ने कहा कि रेडिएशन पाए जाने की इस घटना से जापान के परमाणु संयंत्र से हो रहा रेडियोधर्मी विकिरण पहली बार चीन की मुख्यभूमि पहुंचा है। एजेंसी ने कहा कि जापानी नागरिकों का उपचार कराया गया है और अब उन्हें कोई खतरा नहीं है। वहीं जापान के प्रशासन का कहना है कि केवल परमाणु संयंत्र के कर्मचारियों को छोड़कर अन्य कोई व्यक्ति गंभीर रेडिएशन की जद में नहीं आया है। जापान के विदेश मंत्रालय के उप प्रवक्ता ताकेशी मात्सुनागा ने इससे पहले कहा था कि अंतर्राष्ट्रीय नागरिक उड्डयन संगठन ने जापान से जाने वाले यात्रियों की जांच की जरूरत नहीं बताई है। बर्फबारी से हाल बेहाल जापान के पूर्वोत्तर हिस्से में बर्फवारी होने से भूकंप और सुनामी से तबाह इलाकों में सफाई और पुनर्निर्माण का काम प्रभावित हुआ है। जापानी समाचार एजेंसी एनएचके के मुताबिक त्रासदी में जीवित बचे एक व्यक्ति ने कहा, यहां बेहद सर्दी है इसलिए हम अभी कुछ नहीं कर सकते। स्थानीय प्रशासन द्वारा उपलब्ध कराए गए राहत शिविरों में रह रहे करीब 3,80,000 लोगों में से कुछ लोग अब अपने घरों को लौट गए हैं। 2,40,000 से ज्यादा लोग अब भी 1,900 आपात केंद्रों में रह रहे हैं। यह केंद्र स्कूलों और सामुदायिक इमारतों में बनाए गए हैं। जापान की सत्ताधारी डेमोक्रेटिक पार्टी के महासचिव कात्सुया ओकाडा के अलावा शनिवार को कई बड़े नेता इस इलाके का दौरा कर रहे हैं। विपक्षी दल लिबरल डेमोक्रेटिक पार्टी के महासचिव नोबुतेरू इशिहारा ने भी मियागी प्रशासकीय क्षेत्र के केसनुमा कस्बे का दौरा किया। पता नहीं कब रुकेगा विकिरण विएना, एजेंसी : अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (आइएईए) ने कहा है कि इस बात की कोई समयसीमा तय नहीं की जा सकती कि जापान के इंजीनियर फुकुशिमा में क्षतिग्रस्त परमाणु संयंत्र से रेडियोधर्मी विकिरण का प्रसार कब तक रोक पाएंगे। उन संभावित स्थानों का पता लगा लिया गया है जहां से संयंत्र में विकिरण फैल रहा है। आइएईए के तकनीकी सलाहकार ग्राहम एंड्रयू ने शुक्रवार को कहा, हम नहीं जानते कि विकिरण कब तक होता रहेगा। रिएक्टर संख्या एक और दो के भीतरी कवच से संदिग्ध रिसाव के अलावा रिएक्टर तीन से भी रिसाव होने के संकेत हैं। आइएईए के मुख्य सुरक्षा अधिकारी ने कहा कि रिसाव वाले स्थानों को ठीक करने से पहले इंजीनियरों को इन स्थानों की पूरी तरह पहचान करने के लिए कई जरूरी कदम उठाने होंगे।


अजदाबिया पर फिर विद्रोहियों का कब्ज़ा


लीबिया में विद्रोहियों ने पूर्वी शहर अजदाबिया को फिर से कब्जे में ले लिया। इस पर मुअम्मर गद्दाफी के सुरक्षाबलों का कब्जा हो गया था। कई दिनों की लड़ाई के बाद इस शहर पर फिर से कब्जा करने के बाद शहरवासियों ने जमकर जश्न मनाया। इसमें पश्चिमी देशों की सेनाओं ने उनकी मदद की। उन्होंने गद्दाफी के टैंकों और तोपों पर हवाई हमले किए। अजदाबिया इस लिहाज से महत्वपूर्ण है कि यहां से राजधानी त्रिपोली को देश के पूर्वी शहरों से जोड़ने वाले हाईवे खुलते हैं। एक लोकतंत्र समर्थक सरहग अगोरी ने कहा, शुक्रवार रात हमारी सेना ने दोबारा शहर पर कब्जा कर लिया। अजदाबिया अब भूतों का शहर बन गया है। वहां पर सिर्फ शव और कुछ परिवार बचे हैं। उन्होंने बताया कि लोकतंत्र समर्थकों ने गद्दाफी सेना पर शहर के पूर्वी हिस्से से हमला किया। संघर्ष रात भर चला। प्रत्यक्षदर्शियों के मुताबिक हमले में गद्दाफी के चार टैंक तबाह हो गए। घटनास्थल पर गोले-बारूद के बक्से और हथियारों के खोल बिखरे पड़े थे। अमेरिका की योजना : बीते सात दिनों से नाटो गठबंधन सेना लीबिया पर हवाई बमबारी कर रही है। इसके बावजूद प्रमुख शहरों पर गद्दाफी का कब्जा बना हुआ है। द वॉशिंगटन पोस्ट के मुताबिक अमेरिका और सहयोगी देश लोकतंत्र समर्थकों को अब हथियार देने पर विचार कर रहे हैं। फ्रांस उन्हें प्रशिक्षण और हथियार देने का समर्थन कर रहा है। अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा के प्रवक्ता जे कार्नी ने कहा, ओबामा प्रशासन का मानना है कि सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव के मुताबिक गद्दाफी से युद्ध करने वाले नागरिकों को इस तरह की मदद दी जा सकती है। फिलहाल इस बारे में कोई फैसला नहीं लिया गया है। लीबिया मेंभविष्य में राजनीतिक रणनीति के निर्धारण के लिए गठबंधन देशों की लंदन में आगामी मंगलवार को होने वाली बैठक में लीबिया के विपक्ष के वरिष्ठ नेता को आमंत्रित किया गया है। धमाकों से दहला त्रिपोली : लीबिया की राजधानी त्रिपोली शनिवार तड़के कई विस्फोटों से दहल उठी। ये विस्फोट उसके पूर्वी उपनगर ताजौरा में हुए हैं। इस उपनगर को पहले भी निशाना बनाया गया था। बीबीसी के अनुसार ताजौरा में सेना का एक राडार स्थल धू धू कर जल रहा है। इस जिले में कई सैन्य ठिकाने हैं। यह इलाका एक-एक करके तीन विस्फोटों से दहल उठा। ये विस्फोट पूर्वी अजदाबिया शहर के आसपास गद्दाफी के टैंकों व तोपों पर किए गए हमलों के बाद हुए हैं। दूसरी ओर व्हाइट हाउस ने घोषणा की है कि राष्ट्रपति बराक ओबामा सोमवार शाम अमेरिकी नागरिकों को संबोधित करेंगे और लीबिया के बारे में अपनी नीति और निर्णय की व्याख्या करेंगे। अमेरिकी सेना के प्रवक्ता वाइस एडमिरल विलियम गॉर्टनी ने कहा है कि कर्नल गद्दाफी के पास हवाई प्रतिरोध की कोई व्यवस्था नहीं है और जमीन पर भी अपने बलों को टिकाए रखने और उनका नेतृत्व करने की उनके पास न के बराबर क्षमता है। गॉर्टनी ने कहा, गद्दाफी की वायु सेना उड़ान नहीं भर सकती। उनके युद्धपोत बंदरगाह में लंगर डाले खड़े हैं। उनके आयुध भंडार नष्ट किए जा रहे हैं, संचार टॉवर ढहाए जा रहे हैं, उनके बंकर बेकार साबित हो रहे हैं। जमीनी कार्रवाई अप्रैल में मॉस्को, एजेंसी : अंतरराष्ट्रीय गठबंधन सेना की योजना अप्रैल के अंत तक लीबिया के खिलाफ जमीनी कार्रवाई शुरू करने की है। रूस के खुफिया विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी ने यह दावा किया है। समाचार एजेंसी आरआइए नोवोस्ती ने अधिकारी के हवाले से कहा, हमारे स्रोतों के मुताबिक अगर गठबंधन सेना हवाई और मिसाइल हमलों से गद्दाफी को हटाने में सफल नहीं होगी तो जमीनी कार्रवाई शुरू की जाएगी। नाटो देश और अमेरिका, ब्रिटेन की सक्रिय भागीदारी से जमीनी कार्रवाई की तैयारी कर रहे हैं। इस बीच रूस ने लीबिया के हालात देखते हुए अपने राजनयिकों और नागरिकों को वहां से निकालने के लिए विशेष विमान भेजने की योजना रद कर दी है। सफल हो रही मुहिम : ओबामा वॉशिंगटन, एजेंसी : अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने शनिवार को कहा कि लीबिया में गठबंधन सेना की मुहिम सफल हो रही है और लीबियाई शासक मुअम्मर गद्दाफी को उनकी करतूतों के लिए हर हाल में जिम्मेदार ठहराया जाना चाहिए। ओबामा ने अपने साप्ताहिक रेडियो संबोधन में गद्दाफी से एक बार फिर आग्रह किया कि उन्हें नागरिकों के खिलाफ हमले बंद कर देने चाहिए। ओबामा ने कहा, हम अपनी मुहिम में सफल हो रहे हैं। हमने लीबिया के हवाई प्रतिरोध को ध्वस्त कर दिया है। गद्दाफी की सेना अब लीबिया में आगे नहीं बढ़ पा रही है। बिना किसी गलती के हमने इसीलिए तत्काल कार्रवाई की है। इसके जरिए एक मानवीय आपदा को टाला गया है और अनगिनत नागरिकों, बेगुनाह पुरुषों, महिलाओं और बच्चों को बचाया गया है। सीरियाई बलों ने धावा बोला दमिश्क, एजेंसी : सीरिया की राजधानी दमिश्क में विरोध कर रहे प्रदर्शनकारियों के धरना स्थल पर सुरक्षा बलों ने मध्यरात्रि में धावा बोलकर 200 लोगों को गिरफ्तार कर लिया। कुछ कार्यकर्ताओं ने बताया कि दमिश्क शहर के बाहरी भाग दोमा में तकरीबन चार हजार लोग प्रदर्शन कर रहे थे। शुक्रवार मध्यरात्रि में यहां बिजली आपूर्ति बंद कर दी गई और प्रदर्शनकारियों पर हमला किया गया। इस हमले में कई लोग घायल हो गए।


अरब-अफ्रीका की अशांति


पश्चिम एशिया में सीरिया, यमन और बहरीन तथा उत्तरी अफ्रीका में लीबिया का मौजूदा घटनाक्रम इस क्षेत्र में चल रही सामाजिक-राजनीतिक सुनामी का एक हिस्सा है। इस सुनामी की शुरुआत गत दिसंबर में ट्यूनीशिया में जैसमिन क्रांति के साथ हुई थी और धीरे-धीरे इसका असर अन्य देशों तक पहुंच गया। अरब दुनिया को दशकों तक सार्थक लोकतंत्र से वंचित रखा गया। इसके पीछे पश्चिमी देशों के दोहरे आचरण और क्षेत्र (विशेषकर तेल संपन्न देशों) के तानाशाहों, राजाओं और अमीरों के संकीर्ण राजनीतिक स्वार्थो की मुख्य भूमिका रही, जिन्होंने कथित स्थिरता के नाम पर अपने-अपने हितों की पूर्ति की। अब वही अरब दुनिया उबल रही है। मिF और ट्यूनीशिया में पहले ही पुराना राजनीतिक ढांचा बदल चुका है और अन्य देशों में अशांति, असंतोष अलग-अलग तरीके से बाहर आ रहा है। सीरिया में खून-खराबा बढ़ गया है। वहां के शहरों में सत्ता विरोधी प्रदर्शनों की संख्या बढ़ती जा रही है। राष्ट्रपति असद और उनके पिता ने चार दशकों तक सीरिया पर शासन किया, लेकिन अब वे अरब की सड़कों पर उतरी क्रांति के निशाने पर हैं। यह स्पष्ट है कि जो परिदृश्य उभर रहा है उसमें शासन प्रणाली का सुगम और कष्टरहित स्थानांतरण नहीं होने वाला, जैसा कि मिF और ट्यूनीशिया में हुआ। लीबिया में कर्नल गद्दाफी को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रतिबंधों का सामना करना पड़ रहा है। इसके अतिरिक्त उनके समक्ष अमेरिका, फ्रांस और ब्रिटेन तथा अन्य सहयोगी देशों की संयुक्त सेनाओं की चुनौती भी है। यह महत्वपूर्ण है कि एक अरब देश कतर उड़ान रहित क्षेत्र संबंधी अभियान में शामिल हुआ है और संयुक्त अरब अमीरात राजनीतिक गठबंधन का हिस्सा है। यहां यह तर्क आगे बढ़ाया जा रहा है कि गद्दाफी शासन लीबिया के निर्दोष नागरिकों की जान ले रहा है। प्रदर्शनकारी और बागी गुट बेनगाजी में एकत्रित हैं और अंतरराष्ट्रीय समुदाय की यह जिम्मेदारी है कि वह उनकी रक्षा करे। नि:संदेह यह एक प्रशंसनीय पहल है, लेकिन तथ्य यह है कि एक छोटी अरब राजशाही बहरीन में इसी तरह की लोकतांत्रिक क्रांति को सऊदी सेनाओं की मदद से कुचला जा रहा है और अंतरराष्ट्रीय समुदाय मौन है। बहरीन में पर्ल स्क्वायर ढहाए जाने की घटना के शुरुआती मीडिया कवरेज के बाद बीबीसी तक ने वहां की घटनाओं पर चुप रहना ही बेहतर समझा। इस दुखद सच्चाई का एक कारण यह है कि बहरीन की क्रांति ने बहुमत वाले शिया समुदाय को अल्पमत सुन्नी शासन के खिलाफ खड़ा कर दिया है। बहरीन अमेरिका और उसके सहयोगी देशों के अरब जगत में लोकतांत्रिक क्रांति के संदर्भ में दोहरे दृष्टिकोण का आदर्श उदाहरण है। बहरीन सऊदी अरब के नजदीक है, भौगोलिक रूप से भी और वैचारिक रूप से भी और यही कारण है कि वहां लोकतंत्र के पक्ष में उठी आवाज को लेकर पश्चिमी देश दोहरे मानदंड अपना रहे हैं। सऊदी अरब में भी शियाओं की अच्छी-खासी आबादी है, जो तेल की संपदा से संपन्न इस देश में उपेक्षित पड़ी हुई है। यहां के सुन्नी शासक इस्लाम की कट्टर सुन्नी-वहाबी विचारधारा का समर्थन करते हैं। बहरीन और सऊदी अरब, दोनों ही देशों में शिया नागरिक दूसरे दर्जे के नागरिक हैं। यही कारण है कि बहरीन में लोकतंत्र के समर्थन में चल रहे आंदोलन को शिया आंदोलन के रूप में देखा जा रहा है, जो ईरान और इराक (दोनों शिया बहुल देश) को क्षेत्रीय-राजनीतिक इस्लाम रणनीतिक गणित में ले आता है। जाहिर है, इस आधार पर इस आंदोलन को दबाया ही जाना है ताकि यह अमेरिका के एक महत्वपूर्ण सहयोगी सऊदी अरब में अपना असर न दिखा सके। आश्चर्य नहीं कि जब सऊदी अरब की सेनाएं संयुक्त राष्ट्र की किसी रजामंदी के बिना बहरीन पहुंचीं तो वैश्विक समुदाय ने लीबिया के एकदम विपरीत अपनी आंखें बंद रखना ही बेहतर समझा। लीबिया में फ्रांस ने 19 मार्च को पहला हवाई हमला किया और इस सैन्य कार्रवाई का उद्देश्य निर्दोष नागरिकों तथा लोकतंत्र समर्थक समूहों की रक्षा करना बताया गया है, हालांकि अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने बार-बार कहा है कि लीबिया में अमेरिकी सेना नहीं भेजी जाएगी। ब्रिटेन अथवा फ्रांस के पास उस तरह की सैन्य क्षमता नहीं जैसी अमेरिका के पास है। हवाई युद्ध एक सीमित असर ही डाल सकता है। यह प्रतीत होता है कि लीबिया को रक्तरंजित गतिरोध की ओर आगे बढ़ाया जा रहा है, जिसमें यह देश दो भागों में विभाजित होगा। एक, गद्दाफी के शासन वाला त्रिपोली और पूर्वी भाग तथा दूसरा, बागियों के कब्जे वाला बेनगाजी। जाहिर है, लीबिया में गृहयुद्ध की आशंका गहराती जा रही है। इस भूलभुलैया में ऐसी अटकलें भी लगाई जा रही हैं कि कर्नल गद्दाफी आतंक का सहारा ले सकते हैं। इस संदर्भ में यह विस्मृत नहीं किया जा सकता कि लीबिया 1989 के पैन एम धमाकों के लिए जिम्मेदार था। गद्दाफी या तो सीधे-सीधे या फिर अल कायदा के जरिए आतंकवाद का रास्ता अख्तियार कर सकते हैं। (लेखक सामरिक मामलों के विशेषज्ञ हैं)


Saturday, March 26, 2011

अमेरिकी घुसपैठ


महाशक्ति देश ने हमारे यहां प्रभावशाली हैसियत हासिल कर ली है
भारत से भेजे गए अमेरिका के गोपनीय कूटनीतिक तार संदेशों ने एक ही झटके में उजागर कर दिया कि संप्रग और उससे पहले राजग सरकार के कार्यकाल में अमेरिका और भारत के बीच जो रिश्ता कायम हुआ, उसकी प्रकृति क्या है। अब तक सामने आए संदेशों से साफ जाहिर होता है कि अमेरिका ने हमारे देश में बहुत ही प्रभावशाली हैसियत हासिल कर ली है और इसमें रणनीतिक मामले, विदेश नीति और आर्थिक नीति, सभी कुछ शामिल हैं।
याद करना चाहिए कि अपने पहले कार्यकाल में मनमोहन सिंह की सरकार न्यूनतम साझा कार्यक्रम के अपने इस वायदे से मुकर गई थी कि वह एक स्वतंत्र विदेश नीति पर चलेगी। विदेश नीति में बदलाव को किस तरह अंजाम दिया गया, इसे विकिलीक्स द्वारा उजागर किए गए अनेक संदेश स्पष्ट करते हैं। सितंबर, 2005 में अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी में ईरान के खिलाफ मतदान करने की मनमोहन सरकार की पलटी ऐसा ही एक उदाहरण थी। इस मामले में अमेरिका ने भारत पर अधिकतम दबाव बनाया था। यह धमकी तक दी गई थी कि अगर भारत ने ईरान के खिलाफ रुख नहीं अपनाया, तो अमेरिकी संसद परमाणु सौदे के अनुमोदन के लिए विधेयक कभी भी पारित नहीं करेगी।
जिस दूसरे क्षेत्र में अमेरिका का प्रभाव उल्लेखनीय तरीके से बढ़ा है, वह सैन्य और रक्षा सहयोग का क्षेत्र है। यूपीए सरकार ने जून, 2005 में अमेरिका के साथ रक्षा सहयोग समझौते पर दस्तखत किए थे। भारत द्वारा किसी देश के साथ किया गया इस तरह का यह पहला समझौता था। विकिलीक्स के जरिये सामने आए संदेशों से स्पष्ट हो जाता है कि अमेरिकी सरकार तथा पेंटागन द्वारा इस तरह के समझौते की तैयारियां तथा इसके लिए बातचीत राजग सरकार के समय से ही चल रही थीं।
ये गोपनीय संदेश यह भी दिखाते हैं कि किस तरह दोनों देशों के सुरक्षा प्रतिष्ठानों के बीच तालमेल बढ़ता गया है और यह प्रक्रिया मुंबई पर आतंकवादी हमले के बाद उच्च स्तर पर सहयोग के स्तर तक पहुंच गई है। दिवंगत राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार एम के नारायणन के संबंध में अमेरिकियों की राय थी कि वह बहुत दूर तक सुरक्षा सहयोग स्थापित करने के लिए तैयार थे, जिसमें एफबीआई तथा सीआईए जैसी एजेंसियों के साथ सहयोग भी शामिल था।
ये कूटनीतिक संदेश यह भी दिखाते हैं कि किस तरह अमेरिकी हमारे देश के खुफिया और सुरक्षा तंत्रों में घुसपैठ करने में कामयाब हुए। दोनों देशों की खुफिया और सुरक्षा एजेंसियों के बीच सहयोग के कारण अमेरिका की घुसपैठ पहले ही हो चुकी है। जासूसी के दो मामले तो अब तक सामने भी आ चुके हैं। राजग के कार्यकाल में रॉ के अधिकारी रबिंदर सिंह को सीआईए ने अपना एजेंट बना लिया था। संप्रग सरकार के दौर में भी राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद के दफ्तर में एक सिस्टम एनलिस्ट के सीआईए में शामिल हो जाने का राज खुला था।
अमेरिका को भारत में किस तरह भारी राजनीतिक प्रभाव हासिल है, यह 2006 में मंत्रिमंडल विस्तार से संबंधित एक और गोपनीय कूटनीतिक संदेश से स्पष्ट हो जाता है। अमेरिकी राजदूत ने मंत्रिमंडल में फेरबदल का जो आकलन अमेरिका भेजा था, उसमें कहा गया था : बहरहाल, इस उलटफेर का कुल नतीजा एक ऐसी कैबिनेट है, जो भारत में (और ईरान में) अमेरिकी लक्ष्यों के लिए बेहतरीन होगी।उक्त गोपनीय रिपोर्ट में दर्ज किया गया कि पुख्ता अमेरिका परस्त पांच लोगों को मंत्रिमंडल में शामिल किया गया।
मनमोहन सिंह के निजाम में अमेरिकियों को सरकार के हरेक क्षेत्र में घुसपैठ करने की खुली छूट दे दी गई है। लिहाजा इन मौकों का फायदा उठाने के लिए अमेरिकियों को दोष देने का कोई फायदा नहीं है। आखिरकार, संप्रग सरकार ने ही तो 2007 में यह फैसला लिया था कि आईएएस अधिकारियों के लिए अपने करियर के बीच में अमेरिकी विश्वविद्यालयों में प्रशिक्षण हासिल करना अनिवार्य कर दिया जाए। चाहे वे प्रशासनिक अधिकारी हों या सेनाधिकारी, तरक्की का एक ही रास्ता है : अमेरिका में प्रशिक्षण हासिल करें।
ये गोपनीय कूटनीतिक संदेश यह दिखाते हैं कि भारत की राजनीतिक व्यवस्था में उच्च स्तर पर जो भ्रष्टाचार चल रहा है, अमेरिकी उस पर पैनी नजर रखते हैं। यह स्वाभाविक ही है कि उस गोपनीय संदेश से हंगामा खड़ा हो गया है, जिसमें भारत में अमेरिकी दूतावास से यह खबर दी गई थी कि जुलाई, 2008 में हुए विश्वास मत के लिए विपक्षी सांसदों की खरीद-फरोख्त के लिए भारी मात्रा में पैसा जमा कर रखा गया था। इसी प्रकार चेन्नई स्थित अमेरिकी वाणिज्य दूतावास के एक संदेश में इसका विस्तृत ब्योरा दिया गया है कि द्रमुक किस तरह मतदाताओं में पैसे बांटता है। इस तरह की जानकारियों के बूते अमेरिकी भ्रष्ट राजनेताओं को सही-सही तोल सकते हैं और यह भी समझ सकते हैं कि अपने काम के लिए उन्हें कैसे खरीदा जा सकता है।
परमाणु सौदे से पहले तक के तथा इस पर छिड़े राजनीतिक संघर्ष से संबंधित गोपनीय दस्तावेज दिखाते हैं कि इस सौदे को अंजाम तक पहुंचाने में अमेरिका की ही सर्वाधिक दिलचस्पी थी और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह तथा उनके इर्द-गिर्द जमा अधिकारीगण वास्तव में अमेरिकी हितों को ही आगे बढ़ा रहे थे। जाहिर है कि अमेरिका सिर्फ परमाणु रिएक्टरों की बिक्री से मिलने वाले चंद अरब डॉलर के व्यापारिक फायदे के पीछे ही नहीं लगा था, बल्कि उसकी मंशा भारत को एक रणनीतिक सहयोगी के रूप में अपने बगल में खड़ा करने की भी थी। विकिलीक्स के इन संदेशों से पता चलता है कि मनमोहन सिंह की सरकार और कांग्रेस ने इस देश को कैसे रसातल में पहुंचा दिया है।