तेजी से बढ़ती दुनिया की पांच महत्वपूर्ण अर्थव्यवस्थाओं ने अमेरिकी डॉलर को चुनौती देने की तैयारी कर ली है। इन देशों ने अब डॉलर की बजाय अपनी ही मुद्रा में एक दूसरे को कर्ज और अनुदान देने पर सहमति जताई है। यानी चीन भारत को अपनी मुद्रा युआन में कर्ज देगा तो भारत रूस को रुपये में सहायता। वहीं अगर ब्राजील ने रूस से कर्ज लिया तो वह उसे रूबल में मिलेगा। ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका (ब्रिक्स) ने गुरुवार को इस समझौते पर हस्ताक्षर किए। ब्रिक्स देशों में आर्थिक सहयोग बढ़ाने की दिशा में इसे महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। हालांकि इसका इस्तेमाल फिलहाल इन देशों की कंपनियां अपने कारोबार में नहीं करेंगी मगर वैश्विक अर्थव्यवस्था में ब्रिक्स देशों का दबदबा बढ़ने पर यह भी संभव हो सकता है। अभी इन देशों की हिस्सेदारी वैश्विक अर्थव्यवस्था में 25 फीसदी है। वर्ष 2020 तक इनकी हिस्सेदारी बढ़कर 48 फीसदी हो जाने की उम्मीद है। समझौते के तहत ये देश एक दूसरे को स्थानीय मुद्रा में कर्ज और अनुदान देने के साथ-साथ पूंजी बाजार एवं अन्य वित्तीय सेवाओं के मामले में भी सहयोग कर सकेंगे। ब्रिक्स देशों के पास दुनिया की कुल मुद्रा भंडार का करीब 40 फीसदी हिस्सा है लेकिन इसमें ज्यादातर अमेरिकी डॉलर के रूप में है। गुरुवार से शुरू हुए ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में पांचों देशों के केंद्रीय बैंकों ने इस समझौते पर हस्ताक्षर किए। इस समझौते के पीछे ब्रिक्स देशों का मकसद सतत आर्थिक वृद्धि के साथ-साथ दीर्घकालिक, मजबूत और संतुलित विश्व अर्थव्यवस्था में योगदान करने इच्छा भी है। समझौते के बाद भारत के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, चीन के राष्ट्रपति हू जिंताओ, रूस के राष्ट्रपति दिमित्री मेदवेदेव, ब्राजील की राष्ट्रपति दिलमा रोसेफ और दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति जैकब जुमा ने संवाददाताओं को संयुक्त रूप से संबोधित किया। इससे पहले शिखर सम्मेलन को संबोधित करते हुए मनमोहन सिंह ने कहा कि प्राकृतिक एवं मानवीय संसाधनों के मामले में धनी ब्रिक्स देशों के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपने मौजूदा व्यापक संसाधनों का बेहतर इस्तेमाल करने की है। हमारे पास सतत और संतुलित विकास को ठोस एवं सार्थक और विकास का नया मॉडल देने का अच्छा अवसर है। भारत इन लक्ष्यों को हासिल करने के लिए ब्रिक्स देशों के साथ काम करने को तैयार है। उन्होंने कहा कि हमारी अर्थव्यवस्था पहले के मुकाबले ज्यादा खुली और विश्व से जुड़ी है। हमारे वित्तीय और पूंजी बाजार मजबूत हैं और प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के लिए बेकरार हैं। अंतरराष्ट्रीय आर्थिक स्थिति का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि 2008 के वित्तीय संकट के बाद पुनरुद्धार प्रक्रिया ब्रिक्स देशों की अर्थव्यवस्था के प्रदर्शन पर निर्भर करती है। ब्रिक्स देश अपनी अर्थव्यवस्था के प्रबंधन को लेकर संतुष्ट हो सकते हैं लेकिन उनके सामने फिलहाल शांत होकर बैठने की कोई वजह नहीं है। मनमोहन ने कहा कि जी-20 का सदस्य होने के नाते ब्रिक्स देश दुनिया के अन्य देशों के साथ सहयोग कर सकते हैं। शिखर सम्मेलन में एक घोषणा-पत्र भी जारी किया गया। इसमें कहा गया है कि ब्रिक्स देशों ने दुनिया की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं व्यापक आर्थिक नीतियों के मामले में तालमेल बढ़ाने, मजबूत, सतत और संतुलित वृद्धि के लिए साथ मिलकर काम करने का आह्वान किया। फ्रांस में होने वाले अगले जी-20 शिखर सम्मेलन का जिक्र करते हुए घोषणा-पत्र में कहा गया है कि ब्रिक्स देश आगामी बैठक में अर्थव्यवस्था, वित्त, व्यापार और विकास के मामले में सकारात्मक नतीजे की उम्मीद करते हैं|
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