Friday, April 1, 2011

पुश्तैनी दुश्मनी


पुश्तैनी दुश्मनियों के किस्से आपने बड़े सुने होंगे। एक जमाने में तो उनको लेकर फिल्में भी खूब बनती थी। हो सकता है उस जमाने में पुश्तैनी दुश्मनियां निभाना शान की बात समझी जाती हो। हालांकि समझदार लोग इसे तब भी बुरी बात ही मानते थे। मगर एक बात तो माननी पड़ेगी साहब कि अगर पुश्तैनी दुश्मनियां नहीं होती तो लैला-मजनूं और हीर- रांझा जैसी अमर प्रेम कहानियां भी नहीं होतीं। इसीलिए कहते होंगे कि हर चीज का एक अच्छा पहलू भी होता है। पर इधर तो पुश्तैनी दुश्मनी को एकदम ही पिछड़ी किस्म की चीज मानकर जैसे लोगों ने भुला ही दिया है। पर पुश्तैनी दुश्मनियां खत्म नहीं हुई हैं। वे अब भी चल रही हैं और सिर्फ अनपढ़ गंवार ही पुश्तैनी दुश्मनियां नहीं निभाते बल्कि अब तो लोगों को पक्का यकीन हो गया है कि अमेरिका भी पुश्तैनी दुश्मनी निभाता है। पहले इराक में निभाई और अब लीबिया में निभा रहा है। बेशक वह पूंजीवादी-लोकतांत्रिक देश है लेकिन इस मामले में उसकी शान एकदम सामंती है। जो लोग इस बात पर खुश थे कि अरब जगत में क्रांति हो रही है और जनता तानाशाहों को भगा रही है, वे शायद अमेरिका को भूल गए थे। उन्हें क्या पता था कि तानाशाह भाग रहे हैं तो अमेरिका आ रहा है। उन्हें लगा था कि अमेरिका का हाथ बेशक पूरी दुनिया की नब्ज पर रहता है पर वह अरब जगत की धड़कन को नहीं समझ पाया। सीआईए देखती ही रह गई और मिस्र में क्रांति हो गई। हालांकि वह वक्त पर सम्भल गया और अपना फच्चर फंसा ही दिया। लोग पता नहीं यह क्यों भूल गए कि अरब में तेल है और जहां तेल है वहां तो खेल करने अमेरिका पंहुचेगा ही। सो वह पहुंच गया है, अपने फौज- फांटे के साथ, अपने तोप-तमंचों के साथ। बेशक ओबामा साहब आए तो थे अमेरिका को इराक युद्ध से बाहर निकालने के लिए लेकिन अब लगता है जाएंगे उसे लीबिया युद्ध में फंसाकर। फिर वहां कोई और ओबामा आएगा अमेरिका को लीबिया युद्ध से निकालने के लिए। हो सकता है,वह उसे ईरान युद्ध में फंसाकर चला जाए। वहां अब यह निरंतर चलनेवाली कार्रवाई होगी। हालांकि अनुमान तो अब भी यही था कि अमेरिका पहले ईरान से निपटेगा पर अरब जगत की क्रांतियों ने सब गड़बड़ कर दिया। ले जाकर उसे लीबिया में फंसा दिया। चलो कोई बात नहीं, अमेरिका को फंसे तो वहीं रहना है, अरब जगत में ही। और फंसे क्या रहना है जी, असल में तो वह वहां से निकलना ही नहीं चाहता। वहां तेल जो है। इस माने में वे देश अपने को बड़ा सौभाग्यशाली मान सकते हैं, जिनके यहां तेल नहीं है। वहां अमेरिका कभी नहीं जाएगा और वे कारपोरेट बांबिंग से बच रहेंगे। फिर वहां गृहयुद्ध भी नहीं होगा और इथनिक झगड़े भी नहीं होंगे। बस शर्त यही है कि यह धरती बची रहे, जिसकी सम्भावना अमेरिका के रहते तो कम ही है। अरब जगत की समस्या बस यही है कि वहां तेल है। या तो उन्हें अमेरिका दोस्त बनना पड़ेगा या दुश्मन। चाहे सद्दाम की तरह पहले दोस्त बन लो और बाद में दुश्मन या फिर गद्दाफी की तरह पहले दुश्मन बन लो, बाद में दोस्त। अमेरिकी जनता के दुख से पिघलकर ओबामा यह वादा तो बेशक कर सकते हैं कि मैं तुम्हें इराक युद्ध से बाहर निकालूंगा पर आखिर अमेरिकी जनता को उन्हें यह दिखाना ही पड़ेगा कि अमेरिका ने मर्दानगी छोड़ी नहीं है। देखो मैं लीबिया को कैसे बर्बाद रहा हूं। इसीलिए तो लगता है जैसे अरब जगत से अमेरिका की पुश्तैनी दुश्मनी सी है। सद्दाम से उसकी दुश्मनी बुश सीनियर के जमाने में शुरू हुयी, जिसे अंजाम तक पंहुचाया बुश जूनियर ने। गद्दाफी से तो अमेरिका की दुश्मनी और पुरानी है,रीगन-वीगन के टाइम से,जब एक समाजवादी शिविर हुआ करता था। समाजवादी शिविर खत्म हुआ तो गद्दाफी ने अमेरिका से दोस्ती कर ली थी। पर अमरीका दुश्मनी भूला नहीं और दखिए मौका आते ही उस पुश्तैनी दुश्मनी को कैसी शान से निभा रहा है। पर इस भूल में न रहना कि इसके बाद यह दुश्मनी खत्म हो जाएगी। अभी तो ईरान बचा है न!


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