Thursday, April 14, 2011

ब्रिक्स का बढ़ता कद


ब्रिक्स समूह को अंतरराष्ट्रीय आर्थिक संबंधों के विकास की प्रेरक शक्ति बता रहे हैं झांग यान
वित्तीय संकट के विश्व अर्थव्यवस्था पर पड़ रहे नकारात्मक प्रभाव और मध्य-पूर्व एशिया व उत्तरी अफ्रीका में जारी उथल-पुथल के आलोक में वर्तमान अंतरराष्ट्रीय हालात जटिल बदलावों के दौर से गुजर रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय समुदाय दोनों चुनौतियों का सामना करने के साथ-साथ अनेक अवसरों की बाट भी जोह रहा है। इस पृष्ठभूमि में चीन, भारत, रूस, ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका के नेता चीन के हनान प्रांत के सान्या शहर में ब्रिक्स देशों की तीसरी बैठक में भाग ले रहे हैं। व्यापक दृष्टि और साझा संपन्नता के लक्ष्य के साथ जारी यह बैठक पूरे विश्व का ध्यान अपनी तरफ खींच रही है। इस बैठक का नतीजा केवल इन पांच देशों के ही नहीं, बल्कि पूरे विश्व के विकास में योगदान देगा। ब्रिक्स 21वीं सदी का अनोखा सहयोगी तंत्र है। इसका उदय विकासशील देशों के एक समूह के रूप में हुआ है। पिछले दशक में ब्रिक्स ने बहुस्तरीय सहयोगी ढांचा विकसित किया है। दक्षिण अफ्रीका के आगमन और पहली बार नेताओं की बैठक में शामिल होने से ब्रिक्स की ताकत बढ़ी है। अब इसमें एशिया, अफ्रीका, यूरोप और अमेरिका का प्रतिनिधित्व हो गया है। इससे ब्रिक्स के प्रतिनिधित्व व प्रभाव के विस्तार में वृद्धि हुई है। वर्तमान में पांच ब्रिक्स देशों में विश्व का 30 प्रतिशत भूभाग तथा 43 प्रतिशत आबादी सम्मलित है। विश्व का 18 प्रतिशत सकल घरेलू उत्पाद और कुल व्यापार का 15 फीसदी हिस्सा इन्हीं देशों में होता है। 2001 से 2011 के बीच इन पांच देशों के बीच व्यापार 28 प्रतिशत की तीव्र गति से बढ़ा है। इन देशों के बीच अब 230 अरब डॉलर का व्यापार होता है। जब ब्रिक्स की अवधारणा लोगों के बीच आई थी, तो किसी ने भी यह अनुमान नहीं लगाया था कि यह इतना जल्दी इतने ऊर्जावान सहयोगी तंत्र के रूप में विकसित हो जाएगा। ब्रिक्स देश विश्व की सर्वाधिक तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाएं हैं। ब्रिक्स देशों के बीच सहयोग की भावना उभरती हुई अर्थव्यवस्थाओं की इच्छाओं और पसंद को प्रतिबिंबित करती है। ब्रिक्स के सदस्यों की अनेक अर्थो में समान स्थितियां हैं। वे विकास की समान अवस्था में हैं। उनके सामने अर्थव्यवस्था के विकास के साथ-साथ जनता के कल्याण की भी महती जिम्मेदारी है। फिलहाल, पांचों देश अपनी अर्थव्यवस्था के पुनर्गठन, स्वस्थ व टिकाऊ संवृद्धि और समावेशी, न्यायसंगत व स्वच्छ विकास के संदर्भ में समान चुनौतियों और समस्याओं का सामना कर रहे हैं। ब्रिक्स ने पांचों देशों को विकास संबंधी अनुभवों को साझा करने का महत्वपूर्ण मंच प्रदान किया है। इसके माध्यम से ये देश साथ-साथ काम करके विकास के रास्ते में आने वाली बाधाओं को दूर कर सकते हैं। ब्रिक्स देश समान स्तर पर पारस्परिक लाभ के बल पर विस्तारित सहयोग की मजबूत आधारशिला रख सकते हैं। ब्रिक्स देशों को वैश्विक आर्थिक शासन और संबद्ध संस्थानों में सुधार की भी चिंता है। वे अपने खुद के हितों के साथ-साथ समूचे अंतरराष्ट्रीय समुदाय के हित साधने के सम्मलित उपाय तलाश रहे हैं। ब्रिक्स देश एक साथ मिलकर संयुक्त राष्ट्र, जी-20 जैसे मंचों पर काम कर रहे हैं और खाद्य, ऊर्जा सुरक्षा, दोहा राउंड वार्ता, जलवायु परिवर्तन, सहश्चाब्दि विकास लक्ष्य, अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों के सुधार जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर एकजुट हैं। इसके अलावा, उभरती हुई अर्थव्यवस्थाओं की आवाज उठाने और इन्हें अधिक प्रतिनिधित्व देने के लिए प्रयासरत हैं। ब्रिक्स देश मुख्यत: अर्थव्यवस्था, वित्तीय और विकास मामलों पर विचार करते हैं। एक तरह से, ब्रिक्स देश विकास के लिए वैश्विक साझेदारियों की वकालत कर रहे हैं। ब्रिक्स सहयोग जी-8 जैसे अनेक अंतरराष्ट्रीय और क्षेत्रीय समूहों से अलग है। यह न तो बड़ी शक्तियों का नया समूह है और न ही राजनीतिक गठबंधन। यह तो महज विकास में साझेदार है। ब्रिक्स देशों का सहयोग अंतरराष्ट्रीय आर्थिक संबंधों के लोकतांत्रिकरण की प्रेरक शक्ति है। यह विश्व अर्थव्यवस्था की संवृद्धि में विविधता लाने की दिशा में प्रयासरत है। ब्रिक्स की अन्य समूहों से कोई प्रतिस्पर्धा नहीं है। यह खुला, पारदर्शी और समावेशी है। यह मतैक्य निर्माण के सिद्धांत पर चल रहा है। यह विकसित और विकासशील देशों के बीच संवाद स्थापित करने में सेतु की भूमिका भी निभा रहा है। ब्रिक्स की वर्तमान बैठक में अनेक मुद्दों पर सकारात्मक नतीजों के प्रयास चल रहे हैं। इनमें सबसे प्रमुख है कि वैश्विक चुनौतियों का सामना कैसे करें और इन्हें हल करने में क्या योगदान दें। दूसरा लक्ष्य है, अंतरराष्ट्रीय मसलों पर ब्रिक्स देशों के बीच समायोजन और सहयोग कैसे बढ़ाएं। अंतरराष्ट्रीय मौद्रिक व्यवस्था सुधार के मुद्दे पर मिलकर काम करने, उपभोक्ता वस्तुओं की कीमतों में उतार-चढ़ाव को नियंत्रित करने, जलवायु परिवर्तन और टिकाऊ विकास के उपाय तलाशने पर भी ब्रिक्स देश माथापच्ची कर रहे हैं। तीसरा एजेंडा है तमाम क्षेत्रों में ब्रिक्स सहयोग का विस्तार करना। इसके अलावा, ब्रिक्स देशों के आपसी संबंध सुधारने पर भी बातचीत जारी है। इन मुख्य उद्देश्यों के साथ-साथ हाशिये पर द्विपक्षीय वार्ताएं तथा वाणिज्य मंत्रियों की बैठक भी शामिल हैं। बैठक संपन्न होने के बाद सान्या घोषणापत्र जारी किया जाएगा। संक्षेप में नेताओं की बैठक का उद्देश्य है-सर्वसम्मति विकसित करना, सहयोग बढ़ाना और तालमेल को मजबूत करना। भारत ब्रिक्स समूह का सक्रिय सदस्य है। चीन भारत के साथ मिलकर वित्तीय संकट, जलवायु परिवर्तन, खाद्य व ऊर्जा सुरक्षा, आतंकवाद, अंतरराष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था में सुधार लाने और अंतरराष्ट्रीय संबंधों का बहु-ध्रुवीकरण व लोकतांत्रिकरण जैसे ज्वलंत मुद्दों पर काम करना चाहता है। भारत और चीन के बीच विभिन्न मुद्दों पर पारस्परिक सहयोग का लाभ दोनों देशों की जनता को भी होगा। इसके अलावा, इसका विश्व के विकास में भी योगदान होगा। हमारा मानना है कि चीन, भारत तथा अन्य ब्रिक्स देशों के बीच सहयोग के आलोक में ब्रिक्स देशों के नेताओं की बैठक अंतरराष्ट्रीय समुदाय को विश्वास, एकता, सहयोग का संकेत देगी। यह बैठक ब्रिक्स देशों के बीच सहयोग की प्रक्रिया का श्रेष्ठ उदाहरण पेश करने के कारण मील का पत्थर साबित होगी। यह निश्चित तौर पर समृद्धि के लिए अधिक अवसरों का निर्माण करेगी और मानवता के लिए लाभदायक सिद्ध होगी। (लेखक भारत में चीन के राजदूत हैं).

No comments:

Post a Comment