Friday, April 8, 2011

गंभीर खतरे की ओर पाकिस्तान


इस्लामाबाद में कुछ दिनों पहले पाकिस्तान के अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री शहबाज भट्टी की हत्या ने नाभिकीय हथियारों से लैस एक कट्टरपंथी सुन्नी राष्ट्र उभरने के दुनिया के भय को और अधिक पुख्ता कर दिया है। एक ईसाई भट्टी की जान इसलिए ली गई, क्योंकि उन्होंने विवादास्पद ईश निंदा कानून पर अपनी आपत्ति जताई थी। इसके कुछ दिनों पहले पंजाब के गवर्नर सलमान तसीर को भी कट्टरपंथियों ने अपना निशाना बना लिया था। अपने उदार विचारों के लिए मशहूर तसीर ने भी ईश निंदा कानून की आलोचना की थी। इन दोनों मामलों में पाकिस्तान की सरकार ने खामोश रहने का ही फैसला किया। कुल मिलाकर उसने यह अहसास कराया जैसे कुछ हुआ ही न हो। इससे भी अधिक चिंताजनक बात है सेना की भूमिका-खासकर सैन्य प्रमुख जनरल अशफाक परवेज कयानी की खामोशी। आमतौर पर जनरल कयानी लोगों के सामने अपने विचार खुलकर रखने के लिए जाने जाते हैं, लेकिन इन दोनों मामलों में उन्होंने मौन साधना ही बेहतर समझा। इस विषय पर कयानी के मौन और उसके निहितार्थ के विश्लेषण से पहले तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (टीटीपी) के पत्र पर गौर करना उचित होगा। हत्या की दोनों घटनाओं अंजाम देने वाले कट्टरपंथी इसी संगठन से जुड़े हुए हैं। पत्र में मुस्लिम ब्रदरहुड के कथित योद्धाओं का आ ान करते हुए लिखा गया कि अल्लाह के खिलाफ लड़ाई में आप (भट्टी जैसे लोग) इतने दुस्साहसी हो गए हैं कि आप उन लोगों के पक्ष में काम करते हैं या उन्हें समर्थन देते हैं जो पैगंबर का अपमान कर रहे हैं। आपने एक नापाक ईसाई शहबाज भट्टी को ईश निंदा कानून की समीक्षा से संबंधित समिति के बागडोर सौंप दी। इस व्यक्ति का यही अंजाम होना था। अब अल्लाह के आशीर्वाद से इस्लाम के योद्धा ऐसे लोगों का एक-एक कर यही अंजाम करेंगे। यह पत्र आज के पाकिस्तान के दो महत्वपूर्ण पहलुओं की ओर इशारा करता है। पहला यह कि टीटीपी जिस तरह मुस्लिम ब्रदरहु़ड का जिक्र कर रहा है उससे इस मामले में अलकायदा का हाथ उजागर होता है-खासकर इस आतंकी संगठन में दूसरे नंबर की हैसियत रखने वाले अयमान अल जवाहिरी का। जवाहिरी एक समय मुस्लिम ब्रदरहुड का सदस्य था। दूसरा पहलू यह है कि टीटीपी सेना को निशाना बनाने का इच्छुक नहीं, बल्कि वह केवल सिविलियन सरकार पर हमलावर है। इसका मतलब है कि पाकिस्तान में उसे सुरक्षित ठिकाना हासिल है और वह इस सुरक्षा के बलबूते सेना की किसी न किसी रूप में मदद करना चाहता है। कयानी की दुविधा यहीं टिकी है। टीटीपी मूलत: उनकी ही रचना है। आइएसआइ के प्रमुख के रूप में कयानी ने ही इस संगठन की नींव रखी थी। इसका मकसद अफगानिस्तान में तालिबान के उदय से उपजे हालात का फायदा उठाना था। टीटीपी को अल कायदा के ढांचे में एक अन्य शक्ति केंद्र के रूप में सोचा गया था, लेकिन यह योजना बैतुल्ला मेहसूद के अलग हो जाने के कारण बिखर गई। बैतुल्ला अपनी जनजाति पर सेना के हमले, लाल मस्जिद आपरेशन और ड्रोन हमलों से नाखुश था। बैतुल्ला मेहसूद को इसकी कीमत अपनी जान देकर चुकानी पड़ी। इसके बाद से टीटीपी के कई टुकड़े हो गए और पाकिस्तानी सेना ने इस बिखरे संगठन के कुछ टुकड़ों पर अपना नियंत्रण कर लिया। सलमान तसीर के मामले में कयानी यह आड़ ले सकते हैं कि उन्हें उनके ही एक सुरक्षाकर्मी ने मारा। वैसे इसके मूल कारण की जड़ें कट्टरपंथ के व्यापक पहलू से जुड़ती हैं। कयानी को भय था कि तसीर की हत्या की सार्वजनिक निंदा करने से उनकी सेना के मजहबी कट्टरपंथी नाखुश हो जाएंगे और इससे स्थिति गंभीर हो सकती है। कयानी सशस्त्र बलों और खुफिया सेवाओं में कट्टरपंथी मानसिकता के सैनिकों और अधिकारियों की उपस्थिति से भलीभांति परिचित हैं। भट्टी के मामले में कयानी किसी तरह की आड़ नहीं ले सकते। टीटीपी कोई बेलगाम आतंकी समूह नहीं है, बल्कि यह सेना और आइएसआइ द्वारा समर्थित, संरक्षित संगठन है और उसके कुछ सामरिक उद्देश्य हैं। भट्टी की मौत पर कयानी का मौन या तो यह सिद्ध करता है कि वह कट्टरपंथियों का समर्थन करते हैं और ईशनिंदा कानून पर उनके नजरिए से सहमत हैं अथवा वह अपनी ही सेना द्वारा तैयार किए गए कट्टरपंथ के दैत्यों के सामने खुद को असहाय महसूस कर रहे हैं। इससे यह बुनियादी सवाल खड़ा होता है कि क्या कयानी स्वयं कट्टरपंथी विचारों के प्रति सहानुभूति रखते हैं? शायद नहीं। कयानी उत्तरी पंजाब के एक मध्यम वर्ग के परिवार से आते हैं और ऐसे पेशेवर सैनिक हैं जो कट्टरपंथी नहीं हो सकता। इसके बावजूद उन्होंने अपने सैन्य उद्देश्यों को पूरा करने के लिए कट्टरपंथी संगठनों का छद्म तौर पर इस्तेमाल किया है। (लेखक सामरिक मामलों के विशेषज्ञ हैं)

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