Thursday, April 28, 2011

आंकड़ों में उलझी गरीबी


भारत और चीन, ये दो ऐसे देश हैं जिनकी आर्थिक क्षमता और संभावना पर अभी दुनिया की सबसे ज्यादा निगाहें हैं। ये दोनों देश न सिर्फ एशिया की आर्थिक गतिविधियों की लगातार धुरी बने हुए हैं बल्कि अमेरिका जैसी स्वयंभू आर्थिक महाशक्ति भी इन्हें दरकिनार कर अपने भविष्य को लेकर कोई मुगालता पालने का खतरा मोल नहीं ले सकती। तकरीबन एक हफ्ते पहले विश्व बैंक और अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष ने 'ग्लोबल मॉनिटरिंग रिपोर्ट-2011' जारी की थी। इसके मुताबिक जिस तेजी से भारत और चीन की अर्थव्यवस्था कुलांचे भर रही है, वह दुनिया को गुरबत केंधेरे से बचाने में खासी मददगार होगी। रिपोर्ट केआकलन को अगर सही मानें तो एशिया के ये दो देश अपनी आर्थिक क्षमता के बल पर दुनियाभर के गरीबों की गिनती आधी तक घटाने की ताकत रखते हैं। इस आकलन में एक बार फिर से इन दोनों देशों की उद्यमशीलता, उत्पादन और उपभोग की बहुप्रसारीय विस्तार की संभावना को महत्वपूर्ण माना गया। वैसे इस तरह के आकलन नए नहीं हैं। जहां यूरोप और अमेरिका के विकास का चरम उन्हें आगे की राह के लिए इन देशों की तरफ देखने के लिए मजबूर कर रहा है, वहीं पूरी दुनिया में ऐसी आर्थिक समझ भी बन रही है कि ग्लोबल बाजार की छतरी में जब तक इन दोनों देशों को पूरी तरह शामिल नहीं किया जाता, आर्थिक मंदी जैसे खतरे उनकी परेशानी बढ़ाते रहेंगे। अलबत्ता तस्वीर का दूसरा पहलू भी है, जो खासा विरोधाभासी है। पहले जिक्र हाल में आई एशियाई विकास बैंक की रिपोर्ट का। 'ग्लोबल फूड प्राइस इन्फ्लेशन एंड डेवलपिंग एशिया' शीर्षक से जारी रिपोर्ट में कहा गया है कि एशिया के कई देशों में इस साल खाद्य वस्तुओं की कीमत में औसतन दस फीसद तक का इजाफा हुआ है। अगर रुख यही रहा तो 6.4 करोड़ लोगों के इस पूरे महादेश को गरीबी रेखा से नीचे आ जाने का खतरा है। एडीबी की रिपोर्ट को सीधे भारत और चीन पर टिप्पणी न भी मानें तो यह तय है कि इन दोनों देशों की अपनी समृद्धि और विकास का आउटफ्लो इतना ज्यादा या कारगर नहीं है कि वह बाकी अर्थव्यवस्थाओं को खुशहाल बना सकें। और अगर ऐसा है तो यह कहीं न कहीं इनके भीतरी आर्थिक ताने-बाने के अनसुलझे रहने के कारण ही है। अकेले भारत की बात करें तो यहां विकास का रिसाव अब जाकर कहीं-कहीं निचली सतह को स्पर्श कर रहा है। गनीमत है कि सरकार और उसकी विकास एजेंसियां भी डेवलपमेंट के सरफेस पर उगी हरियाली के बजाय उसके इनकूलसिव ग्रोथ को महत्वपूर्ण मान रही हैं। रही चीन की बात तो वहां विकास के 'अर्थ' पर जिस तरह राज्य का 'अनर्थ' हावी है, उसके कल्याणकारी फलित के प्रति आशान्वित रहना खतरनाक है। हां, यह जरूर है कि गरीबी दूर करना यदि विकास का पैमाना बना रहे तो दुनिया में बेहतर कल की संभावना बनी रहेगी।

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