Wednesday, April 13, 2011

नजदीकी का नया अवसर


भारत और पाकिस्तान के सामने अपने मतभेद सुलझाने का अच्छा अवसर देख रहे हैं लेखक
मुझे विकिलीक्स के इस दावे पर कोई आश्चर्य नहीं हुआ कि कश्मीर पर भारत और पाकिस्तान के बीच समझौते की राह में पाकिस्तान के सेनाध्यक्ष जनरल अशफाक परवेज कयानी बाधक बने। अमेरिकी राजनयिक केबलों के अनुसार प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और राष्ट्रपति आसिफ जरदारी द्वारा एक करार पर हस्ताक्षर करने की सहमति बन चुकी थी, किंतु इसमें पाक सेना प्रमुख जनरल परवेज कयानी ने रोड़े अटका दिए। तत्कालीन ब्रिटिश विदेश मंत्री डेविड मिलिबैंड मुंबई पर 26/11 के आतंकी हमले से एक दिन पहले पाकिस्तान में थे। तब उन्होंने यह कहा था कि कश्मीर पर करार के लिए यही सही समय है। उन्होंने पिछले दरवाजे से दोनों पक्षों में बात कराई और समझौते का स्वीकार्य मसौदा तैयार कराया। मिलिबैंड ने बयान जारी कर कश्मीर मुद्दे पर भारत की आलोचना भी की थी, संभवत: इसलिए कि नई दिल्ली इस्लामाबाद के कुछ प्रस्तावों पर सहमत नहीं थी। बताया जाता है कि जनरल कयानी भारत को पाकिस्तान का शत्रु नंबर एक मानते हैं। गत माह मैं पाकिस्तान की यात्रा पर था। वहां बातचीत का निचोड़ यही था कि कश्मीर पर दोनों देशों के बीच समझौते के किसी भी फार्मूले के सिरे चढ़ने के लिए फौज द्वारा उसका अनुमोदन किया जाना आवश्यक है। यह कोई नई बात नहीं है कि कश्मीर पर अंतिम अभिमत सेना का ही है। 70 के दशक के प्रारंभ में जुल्फिकार अली भुट्टो की लोकतांत्रिक सरकार का संक्षिप्त कार्यकाल ही ऐसा था जब स्थिति अलग थी। आवश्यकता के सिद्धांत के आधार पर न्यायपालिका भी पाक जनरलों के फैसलों की संपुष्टि करती रही। जनरल मुशर्रफ तक को कानूनी मंजूरी मिलती रही थी। मगर पाकिस्तान के प्रधानमंत्री यूसुफ रजा गिलानी की मोहाली यात्रा से सौहार्द की किरण उभरी है। वह विश्व कप का सेमीफाइनल देखने मोहाली आए थे। कयानी की मर्जी के बगैर इस अवसर पर उनकी प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से वार्ता नहीं हो पाती। हो सकता है कि जनता के दबाव के कारण उन्होंने पहले जो रुख अपनाया उसमें बदलाव आया हो। हो सकता है वह यह देखना चाहते हों कि कश्मीर पर दोनों सरकारें क्या रुख अपनाती हैं? पाकिस्तान क्रिकेट टीम के कप्तान की टिप्पणी, पाकिस्तानियों के लिए भारतीयों के साथ रहना अथवा उनके साथ लंबे समय तक संबंध रख पाना कठिन है क्योंकि भारतीय बड़े दिल वाले नही हैं में संकीर्ण मानसिकता झलकती है। यही सोच अधिसंख्य पाकिस्तानियों की है। जनरल कयानी के संबंध में विकिलीक्स का कहना है कि वह पर्दे के पीछे रहते हैं, किंतु सरकार के निर्णयों को प्रभावित करते हैं। कयानी आतंक के मुद्दे पर भूमिका निभा रहे थे और सेना पर सरकार के नियंत्रण पर विवाद को भड़का रहे थे ताकि सेना के लिए अमेरिकी सहायता में वृद्धि हो सके। पाकिस्तान के पूर्व विदेश मंत्री ने कहा था कि जब कश्मीर फार्मूले पर चर्चा हो तो सेना की सम्मति को ध्यान में रखा जाए। कसूरी का कहना है कि परवेज इस बात पर जोर देते थे कि कश्मीर पर होने वाली हर वार्ता में सेना का प्रतिनिधि मौजूद रहे। एक ओर भारत और पाकिस्तान, दोनों कहते हैं कि समाधान कश्मीरियों को भी मान्य होना चाहिए, किंतु जब इस मुद्दे पर चर्चा होती है तो उन्हें दरकिनार कर दिया जाता है। हो सकता है कि पर्दे के पीछे उनसे परामर्श होता हो, किंतु ऐसा कोई साक्ष्य उपलब्ध नहीं है। हाल ही में भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव घटने के बनते माहौल के संबंध में चाहे जो भी संदेह हों, यह विश्वास कर पाना कठिन है कि वह मिथ्या है या दिखावा है। मेरी पाकिस्तान यात्रा ने मुझे इस बारे में पहले की अपेक्षा अधिक आश्वस्त कर दिया है कि पाकिस्तान के लोग भारत से संबंधों को सामान्य बनाने के इच्छुक हैं। इस ओर के लोग भी समान रूप से इच्छुक हैं। कुछ भारतीय तो आफरीदी की इस टिप्पणी के बारे में आत्मनिरीक्षण तक बढ़ रहे हैं कि भारत के लोग बड़े दिल वाले नहीं हैं। मुझे भारतीय जनता पार्टी की ओर से कथित क्रिकेट कूटनीति की आलोचना किया जाना तो समझ आता है, क्योंकि पार्टी की समग्र विदेश नीति ही पाकिस्तान-विरोधी सोच पर आधारित है, परंतु वामपंथियों द्वारा भी दोनों प्रधानमंत्रियों की भेंट की भ‌र्त्सना करते हुए भाजपा के तर्को को दोहराना हैरान करने वाला है। हो सकता है कि वामपंथियों ने हिंदू वोट को रिझाने के लिए ऐसा किया हो। यदि मैं दोहराऊं तो समस्या का सारतत्व यह है कि दोनों देशों के विदेश मंत्रालयों में नौकरशाहों की मन:स्थिति व दृष्टिकोण बदलना चाहिए। उनमें एक-दूसरे के प्रति अविश्वास का भाव हर बात को अंतिम मौके पर बिगाड़ देता है। दोनों देशों के उच्चायोगों से संबद्ध प्रकरण उस मन:स्थिति का परिचायक है। पाकिस्तान उच्चायोग से संबद्ध एक ड्राइवर को भारतीय अधिकारियों ने हिरासत में ले लिया। उन्होंने उसे चंडीगढ़ के समीप निषिद्ध क्षेत्र में भटकते हुए पाया था। इस्लामाबाद की प्रतिक्रिया भी बदले की भावना से प्रेरित थी। उसने भारतीय उच्चायोग के एक अधिकारी को हिरासत में ले लिया और भारत की विदेश सचिव निरुपमा राव द्वारा पाकिस्तान के विदेश सचिव सलमान बशीर से अनुरोध किए जाने के पश्चात उसे रिहा किया गया। दुर्भाग्य से दोनों देशों के अधिकारी यह खेल तब खेल रहे थे, जब दोनों प्रधानमंत्री गहन वार्ता में व्यस्त थे कि भारत और पाकिस्तान के बीच संबंध कैसे सुधरें। यदि एक पक्ष धैर्य दिखाता तो आकाश नहीं गिर पड़ता। इसकी व्याख्या मैं मन:स्थिति के तौर पर करता हूं। मतभेदों को सुलझाने के लिए वार्ता की मेज पर बैठने का अवसर एक लंबे समय के बाद आया है। इस्लामाबाद के पास भी भारत के विरुद्ध शिकवे-शिकायतों की एक लंबी सूची हो सकती है। बदले की भावना या फिर विश्वास की कमी के कारण दोनों देशों के बीच की दूरी नहीं पट सकी है। यदि वे ऐसा ही करते रहे तो हमने जिस तरह स्वतंत्रता के बाद से अब तक 62 वर्ष गंवाए हैं, वैसे ही और भी बासठ वर्ष गंवा सकते हैं। दोनों देश आज या कल मामलों को आपस में निपटा लें अन्यथा कलह का एक और दौर चलेगा तथा युद्ध का सिलसिला आगे बढ़ेगा। उन्हें यह अहसास हो जाना चाहिए कि शांति का कोई विकल्प नहीं है। जितना जल्दी उनमें यह भावना घर करेगी, उतना ही दोनों पड़ोसी देशों के लिए बेहतर होगा। इन देशों में विश्व के सबसे अधिक गरीब लोग रहते हैं और लगभग डेढ़ अरब लोग परमाणु युद्ध को लेकर भयाक्रांत हैं। (लेखक वरिष्ठ स्तंभकार हैं|

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