पाकिस्तान में बिगड़ते हालात पर ys[kd की टिप्पणी
पाकिस्तान अस्तित्व के संकट से जूझ रहा है। वहीं दूसरी ओर उसके पड़ोसियों को एक राष्ट्र के रूप में उसकी मौत के परिणामों की चिंता सताने लगी है। पाकिस्तान के तो जन्म में ही विषबीज बोए हुए थे। किसी भी देश के लिए धर्म को शासन का आधार बनाना एक अस्थिर आधार साबित हुआ है और जब इसका इस्तेमाल नए अस्तित्वों के निर्माण के लिए किया गया है तो आंदोलन के नेताओं पर शक होना स्वाभाविक ही है। पाकिस्तान में कई लोग आज भी पंथ के आधार पर एक नई सल्तनत खड़ी करने का सपना देखते हैं। इस वायरस से सबसे पहले और सबसे ज्यादा प्रभावित होने वाली सेना लोकतांत्रिक सिद्धांतों पर अमल करती हुई नहीं दिख रही है। ऐसा नहीं है कि पाकिस्तान में कथित लोकतंत्र-समर्थकों को इस्लामी कट्टरपंथ की सर्वोच्चता की धारणा से परहेज है। अहमदियों के सफाए से लेकर सूफीवाद पर हमले तक हालात तेजी से खराब हुए हैं। चूंकि सेना ऐसा चाहती भी थी इसलिए इस प्रक्रिया में और तेजी आई है। इन तमाम वजहों से पाकिस्तानी समाज में सड़ांध पैदा होने लगा है। आज पाकिस्तान के अस्तित्व पर मौत का साया मंडरा रहा है। दूसरे जो लोग कोशिश करने के लिए तैयार हैं और अपनी कमजोर ताकत से घड़ी के कांटे को पीछे घुमाना चाहते हैं उनके लिए भी खतरा और बढ़ गया है। भारत ने इस सड़ांध को रोकने के लिए अपनी तरफ से कई कोशिशें की हैं, लेकिन नतीजा कोई अधिक उत्साहजनक नहीं दिख रहा है। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और पाक प्रधानमंत्री यूसुफ रजा गिलानी ने जिस मोहाली भावना का परिचय दिया है, उससे समग्र वार्ता का मार्ग प्रशस्त करने में मदद मिली है, लेकिन क्या इससे असल मुद्दे यानी इस्लामी कट्टरपंथी आतंकवाद के समाधान में मदद मिलेगी। हालांकि यह सवाल अभी अस्पष्ट नजर आ रहा है, क्योंकि 26/11 के मुंबई में शामिल पाकिस्तानियों से पूछताछ की अनुमति देने में अभी भी हिचक बनी हुई है। इसके लिए पाकिस्तानी सेना जिम्मेदार है, जिसे लगता है कि भारत के खिलाफ आतंकवाद के आरोपियों को पाकिस्तानी न्याय प्रणाली अधिक सुरक्षा प्रदान कर सकती है। हाफिज सईद को लाहौर में पूरी आजादी है, क्योंकि पाकिस्तानी न्यायपालिका ने उसे बरी कर दिया है। जबकि खुद पाकिस्तान भी मानता है कि अदालतों द्वारा दी गई सजाओं को देखते हुए उसे बरी किया जाना कुछ अधिक ही छूट है। हिरासत में जो लोग हैं वे सम्मानित अतिथियों की तरह रहते हैं। इस सड़ांध भरे अस्तित्व से उबरने के लिए पाकिस्तान को मदद की जरूरत है। भारत और अफगानिस्तान के साथ-साथ अमेरिका और नाटो मित्र देश भी अपने ही तरीकों से मदद कर सकते हैं। भारत और अफगानिस्तान अपनी-अपनी अर्थव्यवस्थाएं और बाजार खोल सकते हैं और पाकिस्तान को आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में सहयोग करने के बदले में अमेरिकी खैरात पर निर्भर रहने की बदनामी झेलने से मुक्त कर सकते हैं। इसके अलावा व्यापार, आवागमन और सांस्कृतिक संबंधों के फायदे भी पहंुचा सकते हैं। उधर अमेरिका अफगानिस्तान के साथ लगने वाले सीमावर्ती कबाइली इलाकों में आतंकवादी कमांडरों पर ड्रोन हमलों से उपजे अमरीका-विरोधी रुख को दूर कर सकता है। इसके लिए वह इस प्रकार की कार्रवाइयां बंद करके पाकिस्तान को अमेरिकी मुख्यभूमि पर 9/11 के हमलों के भगोड़ों की धरपकड़ का मौका दे सकता है। अगर पाकिस्तानी सैन्य प्रशासन के विरोध के चलते ऐसा नहीं होता है तो अमेरिका, उसके मित्र देशों तथा भारत को पाकिस्तान के परमाणु हथियारों और परमाणु सामग्री के श्चोतों को निष्कि्रय करने की योजना तैयार कर लेनी चाहिए ताकि पाकिस्तान सेना इन्हें आतंकवादियों को न सौंप सके। इन्हें सेना सामरिक पैठ और क्षेत्रीय प्रभाव की तलाश में अपना अग्रणी व्यूह मानती है। परमाणु कवच की आड़ में भूराजनीति के हथियार के रूप में आतंकवाद को इस्तेमाल करने की नापाक चाल को देखते हुए यह बहुत जरूरी है। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं).
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