जापान में परमाणु मोर्चे पर स्थिति अनिश्चित बनी हुई है और दैनिक आधार पर परस्पर विरोधी वैज्ञानिक रिपोर्टें आ रही हैं। हमने जहां एक विकराल मानवीय त्रासदी को अपनी आंखों से देखा और इससे निपटने के लिए अपनी शक्तियां झोंक दीं, वहीं नाभिकीय संक्रमण की विराट समस्या अभी भी मुंह बाए खड़ी है।
इन संयंत्रों के चारों ओर 20-20 किलोमीटर तक के क्षेत्र में खाद्य व जल विकिरण संक्रमण की चिंताजनक रिपोर्टें आ रही हैं। ऐसी खतरनाक सुनामी कुछ दशकों में एक बार आ ही जाती है, परन्तु इस सुनामी ने भविष्य के पति लाखों सवाल खड़े कर दिए हैं। हमारे सामने नए परमाणु ऊर्जा संयंत्रों से संबंधित जहां गंभीर समस्याएं दरपेश हैं वहीं अनेकों पुराने संयंत्रों की मरम्मत की समय-सारिणी भी चिंता का विषय है क्योंकि इनमें पयुक्त टैक्नोलॉजी खुद सवालों के घेरे में है। हमें समस्त विश्व में परमाणु संयंत्रों की सुरक्षा का लेखा-जोखा करने की जरूरत है। विकसित देशों में यह पयास पहले ही शुरू हो चुके हैं। मुझे इस बात पर हैरानी है कि भूकम्पीय क्षेत्र में स्थित और सुनामी के खतरे की संभावनाओं वाले जापान ने योजना तैयार करते समय अपनी लगभग 60 पतिशत ऊर्जा जरूरतें पूरी करने वाले इतने बड़े परमाणु संयंत्र इसी इलाके में ही क्यों लगाए। या शायद यह द्वितीय विश्व युद्ध के बाद बहुराष्ट्रीय कंपनियों के दबाव में किए गए राजनीतिक समझौते और 2 दशकों की विश्व बैंक पोषित योजनाबंदी का हिस्सा था? विकिलीक्स द्वारा भारत-अमेरिका परमाणु समझौते के मुद्दे एवं `वोट के लिए नोट` के सवाल पर किए गए रहस्योद्घाटनों ने दोनों देशों द्वारा हताशा में राजनीतिक कदम उ"ाए जाने के संकेत दिए हैं। परमाणु तकनीक की आपूर्ति करने वाले अन्य देशों के मामले में भी स्थिति कोई अलग नहीं होगी। व्यक्तिगत स्तर पर मैं 1985 से ही परमाणु ऊर्जा का बहुत बड़ा पक्षधर चला आ रहा हूं जब मैं बिजली मंत्रालय का काम देखता था। आज भी मेरी यही राय है कि यह भविष्य के लिए बेहतरीन विकल्प है।
परन्तु जिस बात की कभी कल्पना नहीं की थी वह घटित हो गई और वह भी जापान जैसे देश में जहां कि विश्व भर में सबसे उत्कृष्ट सुरक्षा एवं गुणवत्ता मानक पयुक्त होते हैं। इस मुद्दे पर आगे कदम बढ़ाने से पूर्व हमें `सुरक्षा लेखा-जोखा` करना होगा। समस्या बहुत उलझन भरी है क्योंकि किन्हीं भी 2 विशेषज्ञों की आपस में राय नहीं मिलती इसलिए हमारे सामने इंतजार करने और स्थिति पर नजर रखने के अलावा और कोई चारा नहीं। वर्तमान स्थिति में आवेश में आकर कोई फैसला लेना राजनीतिक आत्महत्या के तुल्य होगा। जापान में जैसे-जैसे मानवीय त्रासदी की परतें खुल रही हैं मौतों की संख्या 20,000 के पार चली गई है। हजारों का अभी कोई अता-पता नहीं। लाखों लोग विपदा झेल रहे हैं और नुकसान किसी भी तरह की गणनाओं से पार जा चुका है। 8.9 की तीव्रता वाला भूकम्प और बाद में आए लगभग 6 की तीव्रता वाले 300 झटके भविष्य की हमारी जीवनशैली को ही बदल देंगे।
मध्य पूर्व की घटनोंः मध्य पूर्व लगातार दहक रहा है और कर्नल गद्दाफी के सत्ता ढांचे पर अमेरिका व उनके सहयोगियों द्वारा किए गए बड़े स्तर के हमले के बावजूद घटनों कुछ ज्यादा ही तेजी से घटित हो रही हैं। लीबिया गृह युद्ध की चपेट में है और जमीनी हकीकतों की सही तस्वीर पता नहीं चल पा रही, जबकि बहरीन व यमन में स्थिति विस्फोटक बनती जा रही है। सऊदी अरब की सेनाओं की मौजूदगी के बावजूद इन दोनों देशों की सड़कों पर हिंसा भड़क उ"ाr है और इससे आंदोलन को अधिक बल मिलेगा। अमेरिका के लिए स्थिति बहुत क"िन हो जाएगी क्योंकि मध्य पूर्व में बहरीन और सऊदी अरब ही उसके सबसे पमुख दोस्त हैं।
हम भी इस घटनाक्रम से अछूते नहीं रहेंगे क्योंकि मध्य पूर्व की अनिश्चित स्थितियों के कारण तेल की कीमतों में जबर्दस्त तेजी आ सकती है। इसके अलावा भी निकट भविष्य में भारत की अपनी खुद की अनेक चिंतों होंगी। पधानमंत्री द्वारा पस्तुत मुदास्फीति के आकलन के दृष्टिगत 2011 का वर्ष बहुत क"िनाइयों भरा होगा। दुनिया भर में खाद्य कीमतों के मोर्चे पर चिंताजनक रुझान पहले ही स्पष्ट होने शुरू हो गए हैं। वैश्विक बाजारों में `तूफान पूर्व की शांति` जैसी स्थिति है। गत कुछ तिमाहियों के दौरान आंशिक आर्थिक पुनरुत्थान के बाद विकसित देशों से दोबारा अशुभ संकट के संदेश मिल रहे हैं। यदि मध्य पूर्व एवं उत्तरी अफ्रीका में संकट गहरा गया तो भविष्य में समस्याओं का कोई आसान हल निकल पाना संभव नहीं होगा। जिस तरीके से अमेरिका और उसके सहयोगी लीबिया की स्थिति से निपट रहे हैं। उस पर विश्व स्तर पर मतैक्य नहीं है। कोई भी अन्य किसी स्थान पर इराक व अफगानिस्तान जैसी स्थिति नहीं चाहता। यदि लीबिया पर हवाई हमले अपने उद्देश्य पाप्त करने में असफल रहे तो ऊंट किस करवट बै"sगा? बात पश्चिम बंगाल कीः पश्चिम बंगाल में कांग्रेस एवं तृणमूल कांग्रेस के बीच हुआ चुनावी समझौता जमीनी हकीकतों पर आधारित है और हमारी व्यवस्था के लिए हितकर है। वाम मोर्चा पश्चिम बंगाल व केरल दोनों ही स्थानों पर घाटे में रहेगा। उनकी संसद में सीटें 60 से घटकर 2009 में मात्र 24 रह गई थीं और 2014 में यह एक अंक तक पहुंच सकती हैं। बंगाल में ममता बनर्जी से बहुत उम्मीदें हैं और उनकी जीत का मार्जिन बहुत आश्चर्यजनक रह सकता है।
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