Wednesday, April 13, 2011

अब तो खुल जाएं हमारी आंखें


बांग्लादेश मुक्ति संग्राम में लापता भारतीय सैनिकों के परिजन आज तक उनके लिए आवाज उठा रहे हैं। उनका आरोप है कि वे भी पाकिस्तान की जेलों में कैद हैं या थे, लेकिन सरकार को जिस आक्रामक सक्रियता के साथ उनकी खोजबीन करनी चाहिए थी, नहीं किया गया। गोपालदास हमारे सामने पाकिस्तान की जेलों में बंद भारतीयों तथा उनको मिलने वाली यंतण्रा एवं संत्रास के साक्षी हैं
गोपालदास पाकिस्तान के कोट लखपत जेल से रिहा होकर स्वदेश आ चुके हैं। भारत-पाकिस्तान के बीच समग्र बातचीत की फिर से शुरुआत करने के तोहफे के तौर पर पाकिस्तान ने उन्हें भारत वापस भेज दिया। उनकी वापसी के साथ पाकिस्तान की जेलों में बंद भारतीय नागरिकों की त्रासदी की ओर फिर एक बार देश का ध्यान गया है। वास्तव में गोपालदास की कहानी सुनकर किसी का भी कलेजा मुंह को आ जाएगा। 1984 में वे गिरफ्तार हुए और 2011 में वापस आए हैं। 25 वर्ष की उम्र में दूसरे देश की जेल में बंद होने वाला यह व्यक्ति 52 साल की उम्र में वापस आया है। यानी उसने अपनी पूरी जवानी पाकिस्तान में बतौर कैदी गुजार दी। इन 27 वर्षों में उसके अंतर्मन में क्या बीत रही होगी, उसकी कल्पना मात्र हमारे आपके अंदर सिहरन पैदा कर देती है!
यह अकेले गोपालदास की कहानी नहीं है। न जाने उसके जैसे कितने भारतीय वहां की जेलों में सड़ रहे हैं, कितने मर-खप गए और कितने की जीवनलीला और समाप्त होगी। गोपालदास के अनुसार केवल लाहौर की कोट लखपत जेल में ही 32 भारतीय कैदी हैं। उसने वहां भारतीय कैदियों के साथ होने वाले र्दुव्‍यवहार का जो वर्णन किया है वह भी हिला देने वाला है। गोपालदास के जेल में रहते हुए ही पांच- छ: भारतीय कैदियों की मौत हो गई।
उनका यह भी कहना है कि कम से कम आठ भारतीय कैदी ऐसे हैं जिनकी सजा पूरी हो चुकी है, पर वे रिहा नहीं हो रहे। क्यों नहीं हो रहे? उन्होंने 10 अक्टूबर 2007 को उच्चतम न्यायालय के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश के. जी. बालकृष्णन को पत्र लिखते हुए कहा था कि विभिन्न जेलों में स्थानांतरित होते हुए उसने देखा है कि कम से कम 200 भारतीय कैदी हैं। क्या उनकी रिहाई न होने के लिए केवल पाकिस्तान दोषी है? जिस वतन पर वे पैदा हुए वह उनकी रिहाई के लिए क्या कर रहा है? ध्यान रखने की बात है कि स्वयं गोपालदास की रिहाई में भारत सरकार का कोई योगदान नहीं है। यह तो उनके परिजनों का हौसला कहिए कि सरकार की बेरुखी के बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी और उसके पत्र को उच्चतम न्यायालय तक पहुंचाया। उच्चतम न्यायालय ने इसका संज्ञान लेते हुए सरकार को नोटिस जारी किया एवं अपील पर सुनवाई आरम्भ हुई। न्यायालय ने पाकिस्तान सरकार से उन्हें रिहा करने की अपील की। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह द्वारा पाकिस्तान के राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी एवं प्रधानमंत्री यूसुफ रजा गिलानी को भारत-पाकिस्तान क्रिकेट मैच देखने का निमंतण्रदेने के बाद जो माहौल बना उसमें सद्भाव के वातवारण में योगदान का संदेश देने के लिए उन्हें रिहा कर दिया गया। प्रधानमंत्री यूसुफ रजा गिलानी ने कहा भी कि पाकिस्तान सरकार ने भारत के उच्चतम न्यायालय की मंशा का अपने आप संज्ञान लेकर गोपालदास को रिहा किया है। साफ है कि अगर उच्चतम न्यायालय पहल नहीं करता तो गोपालदास भी अन्य अनेक भारतीयों की तरह पाकिस्तान की जेल में पड़े होते। उनके परिजनों की जिजीविषा का अभिनंदन करना होगा जो 27 वर्षों तक उनकी रिहाई के लिए संघर्ष करते रहे। गोपालदास का देश-प्रेम देखिए, बाघा सीमा पार करने के साथ ही उसने सबसे पहले अपने वतन की माटी को पण्राम किया और उसे ऐसे चूमा जैसे कोई पुत्र लम्बे समय बाद अपनी मां से मिल रहा है। यही वह जज्बा है जो भारत को तमाम झंझावातों के बावजूद एक रखे हुए है। लेकिन देश का शासन चलाने वाले देशभक्तों के प्रति अपने सक्रिय आचरण से आवश्यक कृतज्ञता प्रकट नहीं करते। गोपालदास ने केंद्र सरकार के प्रति जैसी नाराजगी व्यक्त की है वह स्वाभाविक है। वतन की माटी चूमते हुए उसने कहा कि समय पंख लगाकर उड़ गया है और साथ में मेरी जवानी भी उड़ गई है। गोपालदास ने पाकिस्तान से ज्यादा भारत सरकार की निंदा की है। उसका यह कहना ठीक ही है कि हमारी अपनी सरकार ने उसकी जिंदगी बर्बाद की है। उसकी पीड़ा और खीझ समझ में आने वाली है। उसे जासूसी के आरोप में गिरफ्तार किया गया। उच्चतम न्यायालय में उसके पत्र से ही पता चलता है कि गोपालदास भारतीय जासूस बनकर ही पाकिस्तान गए थे। उसने अपने पत्र में यह प्रश्न उठाया था कि भारत सरकार अपने जासूसों को रिहा कराने के लिए क्यों नहीं आगे आती? जिस समय वह पाकिस्तान के अंदर गिरफ्तार हुआ वह पंजाब में पाकिस्तान द्वारा आतंकवाद निर्यात करने का दौर था और उसमें भारतीय खुफिया एजेंसियां भारतीयों को उस पार भारत विरोधी गतिविधियों की जानकारी लेने के लिए प्रवेश कराती थीं। देश सेवा और धन का लालच- दोनों का इस्तेमाल किया जाता था। जाहिर है, इस देश ने उसके साथ ऐसी कृतघ्नता की है जिसकी कतई भरपाई नहीं हो सकती। भारत ने उन्हें आजाद कराने के लिए कुछ भी नहीं किया। कोई जासूस नहीं है तब भी भारत सरकार का यह दायित्व बनता था कि अपने नागरिक को मुक्त कराने के लिए एड़ी-चोटी एक करे। यह उच्चायोग के दायित्व में शामिल होता है। जिस देश का नागरिक विदेशी भूमि पर किसी आरोप में गिरफ्तार होता है उस देश के दूतावास/उच्चायोग की जिम्मेदारी है कि उससे मिलकर असलियत जाने एवं उसे कानूनी सहायता मुहैया कराए। गोपालदास को 27 जुलाई 1984 को गिरफ्तार किया गया एवं 26 अक्टूबर 1986 को 25 वर्ष की सजा हुई। उनकी मानें तो दूतावास ने उनसे मिलने तक की कोशिश नहीं की। अपने नागरिकों की रक्षा किसी सरकार का प्राथमिक दायित्व है चाहे वह देश के अंदर हो या बाहर। जो सरकार अपने नागरिकों के बचाव के लिए हरसम्भव प्रयत्न नहीं कर सकती उसे शासन में रहने का क्या हक है? भारत सरकार की बेरुखी की मार के कारण गोपालदास की ही नियति अन्य कैदियों की है। भारत की जेलों में भी पाकिस्तान के नागरिक इसी प्रकार सजा भुगत रहे होंगे। हां, भारत सरकार इस मामले में पाकिस्तान से शायद ही कुछ छिपाने का यत्न करती हो? दो पड़ोसियों के बीच ऐसी स्थिति दुर्भाग्यपूर्ण है। लेकिन यथार्थ तो यथार्थ है, भले ही वह कितना कटु एवं त्रासदपूर्ण हो। एक-दूसरे के यहां जासूसी दुनिया के ज्यादातर देश करते हैं, पर ऐसी स्थिति कहीं पैदा नहीं होती। किसी देश के नागरिक के भूलवश सीमा पार कर जाने की ऐसी सजा मिलने का भयावह उदाहरण शायद दुनिया में मिले। इसे विडम्बना ही कहेंगे कि भारत और पाकिस्तान के बीच यही त्रासदी सामान्य अवस्था हो चुकी है। 1971 के बांग्लादेश मुक्ति संग्राम में लापता भारतीय सैनिकों के परिजन आज तक उनके लिए आवाज उठा रहे हैं, और उनका आरोप है कि वे भी पाकिस्तान की जेलों में कैद हैं या थे, लेकिन सरकार को जिस आक्रामक सक्रियता के साथ उनकी खोजबीन करनी चाहिए थी, नहीं किया गया। अटल बिहारी वाजपेयी की शांति पहल के बाद इस दिशा में थोड़ी उम्मीद जगी थी। सरकार द्वारा यह मामला लगातार उठाया गया और हर बार पाकिस्तान सरकार ने कहा कि उनकी जेलों में एक भी भारतीय सैनिक बंद नहीं है। तत्कालीन राष्ट्रपति जनरल परवेज मुशर्रफ ने कहा था कि उनके परिजन आकर स्वयं जेलों में देख लें। कुछ परिजन पाकिस्तान गए भी, लेकिन वहां उन्हें स्वतंत्र रूप से खोजबीन करने की अनुमति नहीं थी। उसके बाद से वह मामला जस का तस है। गोपालदास हमारे सामने पाकिस्तान की जेलों में बंद भारतीयों तथा उनको मिलने वाली यंतण्रा एवं संत्रास के साक्षी हैं। उन्होंने उच्चतम न्यायालय को लिखे पत्र में युद्धबंदियों के होने का भी उल्लेख किया था। कम से कम अब उनकी बात का संज्ञान लेकर भारत सरकार को सक्रियता बढ़ानी चाहिए। हाल ही में गृह सचिवों की बातचीत में दोनों देशों ने अपनी जेलों में एक दूसरे के कैदियों के बारे में जांच कराकर रिपोर्ट देने तथा उनकी रिहाई के लिए काम करने का निश्चय किया है। लेकिन भारत सरकार जब तक दृढ़ संकल्पशक्ति का परिचय नहीं देती न जाने कितने गोपालदास इस त्रासदी के शिकार होते रहेंगे।



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