Saturday, April 9, 2011

सत्ता के संघर्ष में पिसती जनता


अतरराष्ट्रीय कूटनीति और मीडिया में छोटे- छोटे भूभागों और आर्थिक संसाधन से हीन देशो में घटने वाली घटनाओं व संघर्षों की आवाज काफी कमजोर होती है। तानाशाही- असंवैधानिक सत्ता प्रक्रिया पर भी उदासीनता पसरी रहती है। अफ्रीकी भूभाग के छोटे-छोटे आर्थिक रूप से कमजोर देशों में मानवाधिकार संरक्षण की बात बेमानी होती है। विडम्बना यह कि संघर्ष और हिंसक राजनीति के दमन पर भी अंतरराष्ट्रीय नियामकों की लोकतांत्रिक प्रक्रिया उदासीनता की स्थिति से बाहर निकलने को तैयार नहीं दिखती है। अगर ऐसा नहीं है तो आइवोरी कोस्ट में भूखी-कुपोषित आबादी का कत्लेआम रोकने की वैश्विक नीतियां क्यों सफल नहीं हो पा रही हैं। अफ्रीका-अरब भूभाग में प्राकृतिक संसाधनों की प्रचुरता की कोई कमी नहीं है। इन प्राकृतिक संसाधनों की कीमत पर आबादी की सुनहरी तस्वीर बनायी जा सकती है। लेकिन यह सुनहरी तस्वीर तभी बनायी जा सकती है जब शांति-स्थिरिता की राजनीतिक प्रक्रिया की बयार निर्बाध गति से बहती रहे। लेकिन अफ्रीका-अरब देशों में क्या शांति-स्थिरता की बात सोची जा सकती है? अरब में तो अब तानाशाही-शरीयत की सत्ता के खिलाफ तेज गति से विद्रोह के स्वर बुलंद होने लगे हैं पर अफ्रीकी देशों में मजहबी-हिंसा प्रक्रिया खतरनाक ढंग से बढ़ रही है। अधिकतर अफ्रीकी देश गृहयुद्ध की आग में जल रहे हैं। कहीं पर सत्ता पर कब्जे के लिए हिंसा का खतरनाक सिलसिला जारी है तो कहीं पर इस्लामिक शरीयत की मांग को लेकर जेहाद हो रहा है। र्चच भी दबदबा स्थिर रखने के लिए राजनीतिक खेल में उलझने से खुद को नहीं रोक पाया है। बहरहाल अफ्रीकी देश आइवोरी कोस्ट में संयुक्त राष्ट्र की उपस्थिति है, लेकिन गृहयुद्ध के न रुकने से मानवाधिकार हनन की स्थितियां और गंभीर हुई हैं और संयुक्त राष्ट्र भी आइवोरी कोस्ट में जारी हिंसा के लिए जिम्मेदार दोषियों की सूची में शामिल हो गया है। यूएन शांति सैनिकों पर आम आबादी के कत्लेआम को संरक्षण देने के आरोप लगे हैं। उसकी अफ्रीकी-अरब नीतियां जरूरी सवाल खड़ा करती हैं। दरअसल आइवोरी कोस्ट में हिंसा के दो प्रमुख केन्द्र हैं। एक सत्ता पर काबिज राष्ट्रपति लरिंट बाम्बो हैं जबकि दूसरे केन्द्र में अंतरराष्ट्रीय समर्थन प्राप्त राष्ट्रपति आलासान ओतारा हैं। आइवोरी कोस्ट में दोदो राष्ट्रपति हैं जिनके बीच सत्ता पर कब्जा करने की खींचातानी में लगातार हिंसा का खेल चल रहा है। आइवोरी कोस्ट सीमित आबादी वाला वह छोटा सा देश है, जिसके पास जनजीवन को चाकचौबंद व खुशनुमा बनाने के लिए न संसाधन मौजूद हैं और न ही आधुनिक युग के लिए जरूरी शिक्षा के रूप मानव श्रम है। भूख- बेकारी पसरी हुई है। कुपोषण के शिकार न सिर्फ बच्चे हैं बल्कि नौजवान भी हैं जिन्हें जरूरी पोषक तत्व मिलना मुश्किल है। यूएन और अन्य अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों के राहत शिवरों मे रहने वाली आइवोरी कोस्ट की आबादी की तंगहाल-बेबस तस्वीरें काफी कुछ इशारा करती हैं। अंतरराष्ट्रीय मान्यता विहीन और सत्ता पर कब्जा जमाये बैठे लरिंट बाम्बो यहां के तानाशाह हैं। उनके साथ सेना खड़ी है। लरिंट बाम्बो ने सेना के बल पर लोकतांत्रिक प्रक्रिया को बंधक बना रखा है। पिछले चुनावों में बाम्बो की हार हुई थी और आलासान ओतारा ने चुनाव जीता था लेकिन बाम्बो ने अपनी तानाशाही के चलते सत्ता हस्तांतरण से इनकार कर दिया था। इसके बावजूद संयुक्त राष्ट्र ने अंतरराष्ट्रीय निगरानी में संपन्न हुए चुनाव-में आलासान ओतारा को राष्ट्रपति माना है। यहां सैनिक तंत्र भी दो भागों में विभाजित है। लरिंट बाम्बो के अधिपत्य को छोड़कर सैनिकों का एक बड़ा भाग आलासान ओतारा के समर्थन में आकर संघर्ष में शामिल हो गया है। अधिकतर भूभागों पर आलासान ओतारा का कब्जा जरूर है पर मुख्य शहर आबिदजान पर लरिंट बाम्बो के समर्थक सैनिकों का ही कब्जा है। और यहां आबिदजान और डवे दो ऐसे शहर हैं, जिन पर कब्जा किये बिना लोकतांत्रिक प्रक्रिया को बंधक बना कर रखने वाले लरिट बाम्बो के पैर उखाड़ना मुश्किल है। आलासान ओतारा और लंरिंट बाम्बो के सैनिकों के बीच डवे में खतरनाक संघर्ष जारी है। दोनों तरफ की हिंसा और संघर्ष में करीब दो हजार लोगों की मौत की खबर है। अंसवैधानिक राष्ट्रपति लरिंट बाम्बो का कहना है कि यह कत्लेआम आलासान ओतारा के सैनिकों ने किया है, जिन्हें संयुक्त राष्ट्र शांति सैनिकों का समर्थन प्राप्त है। अफवाह यह भी है कि डेवे शहर में हुए कत्लेआम में संयुक्त राष्ट्र के सैनिकों का हाथ है। सवाल है कि संयुक्त राष्ट्र की भूमिका भी सवालों को घेरे में हैं, यह बात संयुक्त राष्ट्र के प्रबंधन तंत्र को कैसे मालूम नहीं होगी। अगर यह सिर्फ और सिर्फ अफवाह है तब भी निदरेष आबादी के कत्लेआम में किसकी भूमिका है क्या इस तथ्य की निष्पक्ष जांच की आवश्यकता नहीं है? संयुक्त राष्ट्र ने शांति संरक्षण के लिए आइवोरी कोस्ट में हस्तक्षेप किया है। उसके शांति सैनिकों की जिम्मेदारी राहत शिविरों में रहने वाली आबादी और निदरेष आबादी की सुरक्षा और उनके मानवाधिकार को संरक्षित करना है। हालांकि संयुक्त राष्ट्र के हस्तक्षेप के बाद भूखी-नंगी आबादी की जिंदगी बचाने के काम में तेजी आयी है और राहत शिविरों में आबादी को जीवन रक्षक सुविधाएं हासिल हो रही हैं। दीर्घकालीक संघर्ष और हिंसा का परिणाम भी बहुत खतरनाक होता है। इस सचाई को दुनिया समझती है पर संकट यह है कि दुनिया के नियामकों के सामने भी चुनौतियां कम नहीं होतीं। अंतरराष्ट्रीय कूटनीति की भी कई विसंगतियां हैं जो अपने स्वार्थो के लिए हिंसक असंवैधानिक सत्ता का प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष समर्थन देते हैं। सवाल है कि असंवैधानिक राष्ट्रपति लरिंट बाम्बो को हथियार और आर्थिक संसाधन कहां से और किस स्वार्थ से दिये जा रहे हैं? आधुनिकता के दौर में शिक्षा जरूरी शक्ति है जो आदमी को सभ्य और संवैधानिक बनाती है। शिक्षा की कसौटी पर अगर हम अफ्रीका और अरब को देखते हैं तो निराशा ही हाथ लगती है। यहां शिक्षा का विस्तार शरीयत और कबीलाई आधारित है जो आदमी को पुरातन काल ही नहीं बल्कि बर्बर काल की याद दिलाता है। अफ्रीकी देशों में जारी संघर्ष बर्बर युग को पुनर्जीवित करता है। अगर शिक्षा का प्रसार हुआ होता तो आज अफ्रीकी भूभाग ने भी बाकी दुनिया की तरह तरक्की की प्रेरक शक्ति हासिल की होती। लेकिन यहां सदियों-सदियों से औपनिवेशिक शक्तियां और नीतियां प्राकृतिक संसाधानों पर कब्जा जमाये बैठी रहीं और अंतत: तानाशाही-कबीलाई और शरीयत वाली सत्ता स्थापित हो गयी। आइवोरी कोस्ट की भूखी-नंगी आबादी के संघर्ष की त्रासदी चिंताजनक ही नहीं बल्कि मानवाधिकार में विश्वास रखने वाले तबके को परेशान करने वाली भी है। संयुक्त राष्ट्र को कोशिश करनी होगी कि सत्ता संघर्ष में निदरेष आबादी का कत्लेआम न हो। तानाशाही व्यवस्था को भी आधुनिकता और लोकतंत्र की अनिवार्यता समझने की जरूरत होनी चाहिए। नहीं समझने वाले तानाशाहों का हाल मिस्र के होस्नी मुबारक और लीबिया के कर्नल गद्दाफी जैसा हो सकता है। शांति और स्थिरता के बिना विकास की भी बात नहीं हो सकती। हिंसाग्रस्त और गृहयुद्ध में फंसे अफ्रीका के इस देश में गरीबी-बेकारी ही नहीं, बल्कि कुपोषित आबादी का भविष्य बेहतर हो भी तो कैसे?


No comments:

Post a Comment