Friday, April 1, 2011

लीबिया के बहाने सामने आए मतभेद


अंतरराष्ट्रीय राजनीति में किसी कमजोर देश के लिए अमेरिका विरोधी होना एक अक्षम्य अपराध है। ऐसे देशों के शासनाध्यक्षों को अमेरिका के दिशा-निर्देशों को नहीं मानने का खामियाजा देर-सबेर भुगतना पड़ता है। मिस्र के पूर्व तानाशाह होस्नी मुबारक इस कड़वी सच्चाई से भली-भांति वाकिफ थे, तभी तो उन्होंने थोड़े-बहुत हठ प्रदर्शन के बाद काहिरा से विदा होने में ही अपनी भलाई समझी। लीबिया के कुख्यात तानाशाह मुअम्मर गद्दाफी कुछ ज्यादा हठी और दुस्साहसी हैं। उनकी सत्ता नहीं छोड़ने की जिद ने विश्व राजनीति में उथल-पुथल मचा दी है। आज नहीं तो कल उनका पतन तय है, लेकिन वे जाने से पहले इस बात पर खुद को शाबासी देने से नहीं चूकेंगे कि उनकी वजह से पश्चिमी देशों की आपसी फूट पूरी दुनिया देख रही है। लीबिया में नो फ्लाई जोन या उड़ान निषिद्ध क्षेत्र कायम करने के लिए आवश्यक सैन्य हस्तक्षेप को लेकर सहमति बनाने की कूटनीतिक प्रक्रिया जितनी उलझनभरी रही है, उससे कहीं ज्यादा परेशानी तो उस नाजुक सहमति को बरकरार रखने की होगी। राष्ट्रपति बराक ओबामा ने अपने पूर्ववर्ती जॉर्ज बुश की इराक में की गई भूलों से सबक लेते हुए समझदारी भरा कदम यह उठाया कि लीबिया पर कोई कार्रवाई करने से पहले उन्होंने संयुक्त राष्ट्र संघ से समुचित वैधता हासिल करने का रास्ता चुना। अंतरराष्ट्रीय वैधता के बगैर यदि लीबिया पर हमला किया जाता तो पूरे मुस्लिम जगत में अमेरिका विरोधी भावनाएं सिर चढ़कर बोलतीं, जिसका फायदा कट्टरपंथी इस्लामिक तत्वों के साथ-साथ गद्दाफी को भी मिलता। अमेरिकी राष्ट्रपति, रक्षा सचिव और विदेश सचिव के बयानों से यह भी स्पष्ट है कि अमेरिका इस बार ऐसा कोई कदम नहीं उठाना चाहता, जिससे यह प्रतीत हो कि लीबिया के खिलाफ अभियान उसकी अगुवाई में चलाया जा रहा है। तभी तो अमेरिका ने अपना हाथ खींचते हुए सैन्य अभियान का नेतृत्व नाटो को सौंपने में काफी उत्सुकता दिखाई। अमेरिका द्वारा हर कदम फूंक-फूंककर रखने के बावजूद लीबिया को दंडित करने पर सर्वसम्मति नहीं बन पाई। लीबिया के ऊपर उड़ान वर्जित क्षेत्र लागू करने के मुद्दे पर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में हुए मतदान में स्थायी सदस्यों चीन और रूस के साथ ही अस्थायी सदस्यों भारत और ब्राजील ने अनुपस्थित रहकर पश्चिमी देशों से अलग रवैया अपनाया। इस कदम को जर्मनी का अप्रत्याशित समर्थन मिलने से पश्चिमी देशों को और धक्का लगा। इन पांचों बड़े देशों ने अपने विरोध प्रदर्शन के जरिये इतना तो बता ही दिया है कि विश्व जनमत का एक बड़ा हिस्सा लीबिया के खिलाफ सैन्य अभियान को अपना समर्थन नहीं देता। सुरक्षा परिषद की प्रस्ताव संख्या 1973 का समर्थन अरब और मुस्लिम संगठनों से कराकर पश्चिमी देशों द्वारा अपने विरोधियों का मुंह बंद करने की कोशिशें कामयाब नहीं हो पाई हैं। युद्ध को अपना समर्थन देना तो दूर, अफ्रीकी यूनियन के अधिकांश सदस्य पश्चिमी देशों का विरोध कर रहे हैं। अफ्रीकी यूनियन बातचीत के जरिये लीबियाई संकट को सुलझाने की वकालत कर रही है और इसी कड़ी में 25 मार्च को उसने आदिस अबाबा में एक सम्मेलन आयोजित किया था। लीबिया में पश्चिमी देशों के वास्तविक इरादों को लेकर अधिकांश विकासशील देश चिंतित और आशंकित नजर आ रहे हैं, जिसके कारण संयुक्त राष्ट्र संघ की विश्र्वसनीयता और प्रतिष्ठा में गिरावट आने की आशंका बन गई है। अमेरिका, फ्रांस और ब्रिटेन की तिकड़ी ने कुछ अरब देशों को साथ मिलाकर लीबिया के खिलाफ सैन्य कार्रवाई को व्यापक स्वरूप देने की कोशिश की है ताकि मुस्लिम देशों की जनता इस लड़ाई को ईसाइयत और इस्लाम के बीच जंग न समझ ले। लेकिन विडंबना तो यह है कि लीबिया के खिलाफ मोर्चा खोलने वाले देशों में ही असहमति के स्वर तेज हो गए हैं। ब्रिटेन के सेना प्रमुख जनरल सर डेविड रिचर्डस ने इस बात को जोर देकर रेखांकित किया है कि गद्दाफी को निशाना बनाने की स्वीकृति संयुक्त राष्ट्र प्रस्ताव में नहीं दी गई है, जबकि रक्षा सचिव लियाम फॉक्स ने साफ कर दिया है कि कर्नल गद्दाफी की हत्या करने से ब्रिटेन को कोई गुरेज नहीं होगा। प्रधानमंत्री कैमरून के विचार रक्षा सचिव फॉक्स से मेल खाते हैं। दबे स्वर में कैमरून यह तो स्वीकार करते हैं कि यूएन प्रस्ताव केवल लीबिया की जनता की हिफाजत करने का अधिकार देती है, लेकिन उनका यह भी मानना है कि गद्दाफी के सत्ता में रहते हुए लीबियाई जनता की हिफाजत करना मुमकिन नहीं है। दूसरे शब्दों में, ब्रिटेन की सरकार को को यूएन प्रस्ताव की मूल भावना के विपरीत लीबिया में शासन बदलाव या गद्दाफी का सफाया करने में जरा भी हिचकिचाहट नहीं है। सऊदी अरब में ब्रिटिश राजदूत रह चुके सर एंड्रयू ग्रीन ने भी कैमरून सरकार की राजनीतिक योजना की जमकर खिंचाई की है। उनका कहना है कि सबसे बड़ी गलती तो एक अरब मुस्लिम देश पर हमला करके की गई है, और तो और वहां से निकलने की भी कोई स्पष्ट योजना नहीं है। यूरोपीय संघ में फ्रांस और जर्मनी की दोस्ती खास चर्चा का विषय रहती है, लेकिन लीबिया के मुद्दे पर दोनों देशों में गंभीर मतभेद पैदा हो गए हैं। नाटो को मिशन की कमान सौंपने पर भी जैसे-तैसे सहमति बनाई गई है। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में लीबिया पर हुए मतदान में जर्मनी की अनुपस्थित से इतना तो साफ हो गया है कि इस असहमति को सहमति में बदलना आसान नहीं होगा। फ्रांस यह नहीं चाहता था कि लीबियाई मिशन की कमान नाटो के पास हो, क्योंकि ऐसा होने पर नाटो सदस्य के रूप में तुर्की की बात भी सुनी जाती। यही कारण है कि फ्रांस ने यह प्रस्ताव रखा कि ऑपरेशन ऑडीसी डॉन तो नाटो फौज चलाए, लेकिन उसका राजनीतिक नियंत्रण एक समिति के पास हो जिसमें यूरोप, कनाडा, अमेरिका और कुछ अरब देशों के विदेश मंत्री शामिल हों। तुर्की के समीक्षकों को यह समझने में ज्यादा देर नहीं लगी कि यह अजीबोगरीब व्यवस्था केवल तुर्की को बाहर रखने के लिए सुझायी गई है। जाहिर है कि इस अभियान की कमान नाटो का देने के लिए अमेरिका और ब्रिटेन को खासी मशक्कत करनी पड़ी है। लंबे दौर की बैठकों के बाद आखिरकार फ्रांस को झुकना पड़ा। 27 मार्च से नाटो ने ऑपरेशन यूनिफाइड प्रोटेक्टर के तहत लीबिया में सैन्य अभियान की कमान संभाल ली है। दरअसल, लीबिया पर फ्रांस और तुर्की के टकराव की जड़ में तुर्की की यूरोपीय यूनियन की सदस्यता है, जिसका फ्रांस पुरजोर विरोध कर रहा है। सरकोजी ने लीबिया पर कार्रवाई में अंतरराष्ट्रीय गठबंधन सेना में संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) को भी शामिल कर यह जताने की कोशिश की है कि केवल पश्चिमी देश ही नहीं, बल्कि अरब देश भी गद्दाफी के खिलाफ खड़े हैं। गौरतलब है कि कतर के बाद यूएई दूसरा अरब देश है, जो गठबंधन सेना में शामिल हुआ है। निस्संदेह यूरोप के बड़े देशों के मध्य आपसी मनमुटाव ने यूरोपीय संघ की एकता को तगड़ा झटका दिया है। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)

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