लेखक क्रिकेट मुकाबले के साथ भारत-पाक के बीच शिखर वार्ता से द्विपक्षीय संबंधों की गाड़ी पटरी पर आती देख रहे हैं…
मोहाली में विश्वकप सेमीफाइनल के मैच में भारत ने पाकिस्तान पर जीत हासिल कर देशवासियों को जश्न मनाने का एक बड़ा बहाना दे दिया। मैच के बाद पूरे देश में लोगों ने सड़कों पर निकलकर जिस तरह आतिशबाजी की वह अप्रत्याशित रहा। कुछ इसी तरह का अप्रत्याशित घटनाक्रम मनमोहन सिंह द्वारा पाकिस्तानी शीर्ष नेतृत्व को मोहाली मैच देखने के लिए निमंत्रण देना भी रहा। इस निमंत्रण को पाकिस्तान के प्रधानमंत्री यूसुफ रजा गिलानी ने सहर्ष स्वीकार किया। मनमोहन सिंह की इस कूटनीतिक पहल की प्रशंसा होना स्वाभाविक है। हालांकि मोहाली में दोनों नेताओं की मुलाकात से मुंबई हमलों के कारण दोनों देशों के रिश्तों में कायम हुई खटास कुछ हद तक दूर होती दिखाई दे रही है, लेकिन इसमें और कमी तब आएगी जब पाकिस्तान भारत के प्रति संशय की नजर छोड़कर उसी गर्माहट का परिचय दे जो मोहाली में गिलानी के व्यवहार में देखने को मिली। मोहाली में मनमोहन सिंह -गिलानी की मुलाकात के पहले नई दिल्ली में दोनों देशों के गृहसचिवों की पूर्व निर्धारित वार्ता भी कुछ सार्थक नतीजे लेकर सामने आई, जबकि माना यह जा रहा था कि यह बातचीत औपचारिक ही साबित होगी। एक लंबे अर्से से दोनों देशों के बीच संवाद तो हो रहा था, लेकिन गाड़ी पटरी पर आती नहीं दिख रही थी। माना जा रहा है कि यह मनमोहन सिंह और यूसुफ रजा गिलानी की मोहाली में होने वाली मुलाकात का ही असर रहा कि गृहसचिव स्तर की वार्ता में पाकिस्तान मुंबई हमले की जांच करने वाले विशेष दल को अपने यहां का दौरा करने की अनुमति देने के लिए सैद्धांतिक तौर पर सहमत हो गया। पाकिस्तान के इस बदले हुए रुख के जवाब में भारत ने भी समझौता एक्सप्रेस कांड की जांच उसके साथ साझा की। अब उम्मीद की जा सकती है कि मुंबई हमले की जांच आगे बढ़ाने में मदद मिलेगी और इससे रिश्तों में जमी बर्फ भी पिघलेगी, लेकिन पाकिस्तान बिना रोड़े अटकाए भारतीय जांच दल को मुंबई हमले के साजिशकर्ताओं से पूछताछ करने की स्वीकृति देगा, इसमें अभी संशय है। इस संशय के संकेत खुद गृहमंत्री चिदंबरम ने अपनी प्रेस वार्ता में दिए। गृहसचिव स्तर की वार्ता में दोनों देशों में कई मुद्दों पर समझबूझ कायम हुई। एक ओर जहां यह तय हुआ कि दोनों देशों के गृहसचिवों के बीच हॉटलाइन कायम होगी वहीं इस पर भी सहमति बनी कि एक-दूसरे के यहां मौजूद कैदियों की सूची साझा की जाएगी। मोहाली में मनमोहन-गिलानी की मुलाकात का असर फिलहाल दोनों देशों की जनता पर भले ही न दिखाई दे रहा हो, लेकिन दोनों टीमों ने जिस सौहार्द भरे माहौल में मैच खेला उसका असर जरूर देखने को मिलेगा। मैच के दौरान दोनों टीमों के बीच जिस तरह कहीं कोई तनाव देखने को नहीं मिला वह उल्लेखनीय है। इससे भी अधिक उल्लेखनीय रहा पाकिस्तानी क्रिकेट टीम के कप्तान शाहिद अफरीदी का यह कथन कि जब हम भारत के साथ क्रिकेट खेलते हैं तो लोगों के मन में नफरत क्यों आ जाती है? हम जब अपने कमरे में उनकी फिल्में और कार्यक्रम देखते हैं तो जंग और घृणा वाली भावना कहां चली जाती है? मुझे नहीं लगता कि भारत के साथ मैचों को जिंदगी और मौत का मामला मान कर व्यवहार करने की जरूरत है। शायद यह बदले हुए माहौल का परिणाम है कि दोनों देशों के रिश्तों के संदर्भ में पाकिस्तानी क्रिकेट टीम के कप्तान ने इतनी सकारात्मक बात कही। पाकिस्तान को अंतत: यह समझना होगा कि भारत से रिश्ते सुधारना खुद उसके अपने हित में है। उसे यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि भारत उसका अहित नहीं चाहता। इस समय पाकिस्तान गंभीर आंतरिक चुनौतियों से दो-चार है। वह जैसी विस्फोटक स्थिति में नजर आ रहा है वह पूरे भारतीय उपमहाद्वीप के लिए चिंता का विषय है। पाकिस्तान इस सच्चाई से मुंह नहीं मोड़ सकता कि उसे वैश्विक आतंकवाद का केंद्र माना जाने लगा है। चूंकि पाकिस्तान अपनी आंतरिक चुनौतियों से नहीं निपट पा रहा इसलिए भारत की चिंता बढ़ना स्वाभाविक है। यदि दोनों देशों के रिश्ते सामान्य हो जाते हैं और कट्टरपंथी ताकतों पर काबू पाने के लिए साझा प्रयास किए जाते हैं तो इससे जितना लाभ भारत को होगा उससे कहीं अधिक पाकिस्तान को। यदि आतंकी तत्वों पर काबू पाने के लिए दोनों देशों के बीच खुफिया सूचनाओं का सही ढंग से आदान-प्रदान होता रहे तो उसका सीधा लाभ दोनों देशों की अर्थव्यवस्था को मिलेगा। देखना यह है कि दोनों देशों के नेता आपसी विश्वास बढ़ाने वाले कोई ठोस कदम उठाने में सक्षम होते हैं या नहीं। वर्तमान में पाकिस्तान जैसी स्थितियों से दो-चार है उन्हें देखते हुए उसका नाभिकीय हथियारों से लैस होना एक गहरी चिंता का विषय है। एक अनुमान के अनुसार पाकिस्तान ने भारत से ज्यादा नाभिकीय हथियार जुटा लिए हैं। नाभिकीय हथियार जुटाने की होड़ किसी के हित में नहीं। इस होड़ पर विराम तभी लग सकता है जब दोनों देशों में एक-दूसरे के प्रति भरोसा बढ़े। पाकिस्तान जिस तरह भारत से रिश्ते सुधारने के लिए आगे आया उससे यह उम्मीद बढ़ी है कि वह विश्वास बहाली के कदम गंभीरता के साथ उठाएगा, लेकिन इस उम्मीद के साथ यह आशंका बनी ही रहेगी कि संबंध सुधार के प्रयासों पर पानी न फिर जाए। इस आशंका का कारण अतीत के बुरे अनुभव हैं। भारतीय प्रधानमंत्री की लाहौर बस यात्रा के बाद कारगिल ने दोनों देशों के रिश्ते बिगाड़ दिए थे। पाकिस्तान से धोखा खाने के बावजूद भारत ने मुशर्रफ को आगरा निमंत्रित किया, लेकिन बात बनी नहीं। इसके बाद रिश्ते सामान्य करने के लिए भारतीय प्रधानमंत्री दक्षेस सम्मेलन में भाग लेने इस्लामाबाद गए। उस दौरान पाकिस्तान ने जो वायदे किए थे वे आज तक पूरे नहीं हुए। पाकिस्तान से संबंध सुधारने की कोशिश के साथ-साथ उससे सतर्क रहने की आवश्यकता इसलिए है, क्योंकि वहां की सेना शासनतंत्र पर हावी है और वह भारत को एक खतरे के रूप में देखती है। भारत इसकी अनदेखी नहीं कर सकता कि पाकिस्तानी सेना के नियंत्रण वाली खुफिया एजेंसी आइएसआइ भारत विरोधी गतिविधियों में लिप्त है। वह भारत को अस्थिर-अशांत करने का ताना-बाना बुनती ही रहती है। कश्मीर को अशांत रखना उसके एजेंडे में शीर्ष पर है। जब पाकिस्तानी सेना का एक वर्ग सदैव इस कोशिश में रहता है कि भारत से संबंध सुधरने न पाएं तब फिर भारतीय नेतृत्व को इसके लिए सजग रहना होगा कि उसे फिर से धोखा न खाना पड़े। अभी यह नहीं कहा जा सकता कि पाकिस्तान भारत से संबंध सुधारने के लिए प्रतिबद्ध है, लेकिन इतना अवश्य है कि घपले-घोटालों से घिरी भारत सरकार को कुछ राहत मिलती दिख रही है और विनम्र-विद्वान अर्थशास्त्री के रूप में विख्यात मनमोहन सिंह कूटनीति के मैदान में भी अपनी छाप छोड़ने में सफल रहे।
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