Wednesday, April 27, 2011

अमेरिका के जाल में फंसा पाकिस्तान


रणनीतिक रूप से अमेरिका और पाकिस्तान में जो दूरियां बढ़ी हैं, उनको पाट पाना अब संभव नहीं दिखता। ड्रोन हमलों को लेकर भी दोनों देशों के बीच विवाद है। इसमें चालक रहित विमान यानी ड्रोन के प्रयोग और सीआईए की तैनाती का मसला भी है और पाकिस्तान की ओर से जलालुद्दीन हक्कानी और लश्करे-तैयबा को दिए जाने वाले समर्थन का मसला भी..पनी सतही कूटनीति के सहारे खुद को दबंगसमझने वाले पाकिस्तान को अब उसकी हैसियत का अंदाजा लग जाएगा, क्योंकि कथित रूप से दुनिया का वास्तविक दबंगमाने जानेवाले अमेरिका की नजरें अब उसके विरुद्ध टेढ़ी हो गई हैं। इसका प्रमाण यही है कि अमेरिका न सिर्फ धीरे-धीरे पाकिस्तान को दी जानेवाली अपनी मदद घटाने लगा है, बल्कि अफगानिस्तान से सटे कबायली इलाकों के बहाने पाकिस्तान में ड्रोन हमले भी तेज कर दिए हैं। इसके एक संकेत यह भी हैं कि अमेरिकी चाल को समझकर मशहूर क्रिकेटर से राजनेता बने इमरान खान सरीखे कुछ लोग अमेरिका के विरुद्ध आंदोलन की तैयारी कर रहे हैं। लेकिन इससे कोई फर्क पड़ने वाला नहीं है, क्योंकि आज पाकिस्तान की सरजमीं पर शुरू हुआ अमेरिकी खेलकोई साधारण नहीं, बल्कि उसकी खास रणनीति का हिस्सा जैसा प्रतीत हो रहा है। इससे लगता है कि पाकिस्तान लाख कोशिशों के बावजूद अमेरिका को अपने मन मुताबिक समझा पाने में अब सफल नहीं हो पाएगा।

गौरतलब है कि तालिबान का नकाब ओढ़े आतंकियों के खिलाफ अमेरिका को गुस्सा तब आया, जब 11 सितम्बर 2001 यानी 9/11 को अमेरिका में हमले हुए। तमाम जांच पड़ताल के बाद यह स्पष्ट हुआ कि इस मामले में अलकायदा का हाथ है। यह वही अलकायदा है, जिसे उस वक्त पाकिस्तान का भी संरक्षण प्राप्त था। यह वही अलकायदा है, जिसके मुखिया ओसामा बिन लादेन को पाकिस्तान व अफगानिस्तान समेत दुनिया के कई देशों के कुछ खास चरमपंथी अल्लाह के प्रतिनिधि के रूप में देखते हैं। यह वही अलकायदा है, जिससे संबद्ध जेहादी और तमाम बड़े नेता 11 सितम्बर 2001 यानी 9/11 को पाकिस्तान के शहर कराची में मौजूद थे और एक सुरक्षित मकान में बैठकर न्यूयार्क और वाशिंगटन का ताजा हाल टीवी पर देख रहे थे। यूं कहें कि उसी वक्त अमेरिकी शासकों-प्रशासकों के मन-मस्तिष्क में अफगानिस्तान-तालिबान के अलावा पाकिस्तान का भी कुरूप चेहरा उभरा था। नतीजा, अमेरिका ने तालिबान को तबाह करने की ठान ली। एक खास रणनीति के तहत इस कार्य में पाकिस्तानी सेना की मदद ली जाने लगी। इस तरह पाकिस्तानी सैनिकों की गोली से अफगानिस्तान और पाकिस्तान के वही चरमपंथी मारे जाने लगे, जिनसे पाकिस्तानी शासकों को मुहब्बत थी। खैर, अमेरिका ने पाकिस्तान को उसी वक्त स्पष्ट रूप से बता दिया था कि वह चरमपंथियों और आतंकियों को जड़ से खत्म करने में उसकी मदद करे। इसके एवज में अमेरिका द्वारा पाकिस्तान को प्रति वर्ष आठ अरब डॉलर की सहायता भी दी जाने लगी। अब जब नए सिरे से अमेरिका द्वारा दी जानेवाली मदद और पाकिस्तानी कार्रवाइयों की समीक्षा हुई तो स्पष्ट हो गया कि पाकिस्तान के कबायली इलाके मोहमंद में अब भी चरमपंथी जड़ें जमाए बैठे हैं। हालांकि कई बार विभिन्न हमलों में अमेरिकी और पाकिस्तानी सैनिकों के हाथों बड़ी तादाद में चमरपंथी मारे भी गए हैं, लेकिन अमेरिका का मानना है कि अब भी वहां आतंकवाद की फसल लहलहा रही है। यानी जिस उद्देश्य से अमेरिका ने पाकिस्तान की मदद शुरू की थी, वह उद्देश्य पूरा नहीं हुआ। परिणामस्वरूप उसने अब पाकिस्तानी को दी जानेवाली आर्थिक मदद फिलहाल रोक दी है। हालांकि आधिकारिक रूप से आर्थिक मदद रोकने का कारण कुछ और ही बताया गया है, लेकिन परोक्ष रूप से उसकी पाक के प्रति नाराजगी ही दिख रही है। 

इसके अलावा अमेरिका और पाकिस्तान की खुफिया एजेंसियों के बीच का सार्वजनिक मतभेद अब सेना तक जा पहुंचा है। दोनों देशों के तमाम प्रयास के बावजूद आरंभ से ही काबुल में अफगान नॉर्दर्न एलायंस के काबिज होने का पाकिस्तानी सेना विरोध करती रही है। इनके बीच तब और मतभेद उभरे, जब अफगान-तालिबान के शीर्ष कमांडरों को पाकिस्तान ने पनाह दी। बाद में इन तालिबान ने ही वर्ष 2003 के बाद अफगानिस्तान में विद्रोह शुरू किया। नतीजतन अमेरिकी-नाटो सेना को डेढ़ लाख सैनिक तैनात करने पड़े और बाकायदा युद्ध शुरू हुआ। यह युद्ध पाकिस्तान में तालिबान के संगठित होने का कारण बना, जिसे पहले तो पाकिस्तान ने गंभीरता से नहीं लिया, लेकिन अब वह उसके लिए एक बड़ी समस्या बन गया है। अब पाकिस्तानी इस बात से डरने लगे हैं कि अमेरिका ने पाकिस्तान की जो सूचनाएं एकत्रित की हैं, उसका उपयोग करके वह एक दिन उसके परमाणु हथियार प्रणाली को भेद लेगा। दूसरी ओर, अमेरिका को डर है कि कुछ खास चरमपंथी संगठनों पर नकेल कसने से पाकिस्तान का इनकार करना अमेरिका और यूरोप में और चरमपंथी हमलों की वजह बन सकता है। इससे पाकिस्तान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई करने की मांग भी बढ़ सकती है। इस बात के पर्याप्त सबूत हैं कि पश्चिम और भारत में हुए कई आतंकी हमलों में या तो पाकिस्तानी तालिबान का हाथ रहा है या फिर लश्करे-तैयबा का। 

यह भी कह सकते हैं कि अमेरिका तमाम प्रयास के बावजूद पाकिस्तान को यह समझाने में विफल रहा है कि कुछ चरमपंथी संगठनों से दोस्ती करना और कुछ से निपटना एक ऐसी नीति है, जो देश के और वैश्विक सुरक्षा के लिए आवश्यक है। खैर, रणनीतिक रूप से अमेरिका और पाकिस्तान में जो दूरियां बढ़ी हैं, उनको पाट पाना अब संभव नहीं दिखता। ड्रोन हमलों को लेकर भी दोनों देशों के बीच विवाद है। इसमें चालक रहित विमान यानी ड्रोन के प्रयोग और सीआईए की तैनाती का मसला भी है और पाकिस्तान की ओर से जलालुद्दीन हक्कानी और लश्करे-तैयबा को दिए जाने वाले समर्थन का मसला भी। 

No comments:

Post a Comment