Wednesday, April 27, 2011

अलग-अलग राहों का सफर


विभाजन के चार दशक बाद पाकिस्तान और बांग्लादेश को अलग-अलग राहों पर बढ़ता देख रहे हैं लेखक
14 दिन की बांग्लादेश और पाकिस्तान की यात्रा के बाद ऐसा लगा जैसे हम 40 वर्ष पूर्व दोनों देशों के विभाजन के कालखंड में पहुंच गए हों। पाक-बांग्लादेश विभाजन क्यों हुआ? कैसे हुआ? उसके लिए जिम्मेदार कौन था? यह कसरत एक अकादमिक हसरत मात्र ही हो सकती है, परंतु यह स्पष्ट है कि तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान और पश्चिम पाकिस्तान में रहने वालों के बीच साठ के दशक के अंत में विवाद इतना बढ़ गया था कि उनके रास्ते अलग-अलग हो जाना अपरिहार्य हो गया था। मार्च के अंत में मैं इस्लामाबाद में था और अप्रैल के मध्य में ढाका में। मैंने जो कुछ देखा उसने मेरी इस पूर्व धारणा को और अधिक पुख्ता ही किया कि दोनों देशों के लोग अपनी सोच और राह की दृष्टि से इतने भिन्न हैं कि वे एक देश के रूप में साथ रह ही नहीं सकते थे। दोनों देशों को मुस्लिम होने पर गर्व है। फिर भी बांग्लादेश का इस्लाम उदारवादी और समावेशी है। मुल्ला-मौलवी तथा अन्य कट्टरपंथी वहां हैं, परंतु वे बहुलवादी जीवन की लय में बाधा नहीं डालते। बांग्लादेश में इतिहास का ज्ञान कराने वाली पाठ्य पुस्तकें हैं। उन्हें विकृत नहीं किया गया है और न ही पाकिस्तान की पुस्तकों के समान उनमें शत्रुता की सीख दी जाती है। बांग्लादेश में हिंदू को शत्रु नहीं माना जाता। बंगला वहां की राष्ट्रभाषा है, जिसके स्थान पर इस्लामाबाद उर्दू थोपना चाहता था और अंततोगत्वा इसी की परिणति पूर्वी पाकिस्तान की पृथकता के रूप में हुई। वहां एक भिन्न प्रकार की संस्कृति सृजित हुई, जिसमें इस्लाम का वर्चस्व तो है, परंतु संकीर्णता का समावेश नहीं। वहां उर्दू कहीं भी नहीं है, यहां तक कि विद्यालयों में भी नहीं सिखाई जाती। नृत्य, संगीत और कला वहां निर्बाध फल-फूल रहे हैं। बांग्लादेश के राजकवि तुल्य काजी नजरूल इस्लाम के समान ही वहां रवींद्रनाथ ठाकुर भी सुविख्यात और लोकप्रिय हैं। बांग्लादेश में नृत्य की दो विधाओं-कथक और ओडिसी को इसलिए हतोत्साहित नहीं किया जाता कि वे हिंदू मूल की हैं। नृत्य और संगीत पर तब तक कोई रोक नहीं है जब तक वे कला के स्वरूप हैं। वहां महिलाएं हिजाब नहीं पहनतीं और बहुत कम लोग लंबी दाढ़ी रखते हैं। वहां ईश निंदा जैसा कोई कानून भी नहीं है। पाकिस्तान में जो उदारवादी तत्व हैं वे भी कुछ बोलने से डरते हैं। पंजाब के गवर्नर सलमान तसीर और अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री शहबाज भट्टी की हत्याओं ने उदारवादियों की आवाज का गला घोंट दिया है। लश्करे-तैयबा का नेता हाफिज सईद भारत के विरुद्ध जिहाद की बात कर रहा है। उसके जैसे व्यक्ति को बांग्लादेश में कोई भाव नहीं मिलता। जमीयत-ए-इस्लामी ने बांग्लादेश में सेक्युलरिज्म के पानी को गंदा करने का प्रयास किया था, किंतु कोई खास प्रभाव नहीं हुआ। प्रधानमंत्री शेख हसीना के कई नकारात्मक चिह्न हैं किंतु सांप्रदायिक ताकतों के विरुद्ध उनका सतत संघर्ष बांग्लादेश की आन में उनका सकारात्मक योगदान है। इस्लामाबाद के विपरीत ढाका मजहबी ताकतों को राज्य अथवा समाज के मामलों में टांग नहीं अड़ाने देता। बांग्लादेश में यदि खालिदा जिया के नेतृत्व वाली बीएनपी की सत्ता में वापसी होती है तो माहौल बदल सकता है। उन्होंने इस्लामिक कार्ड खेल कर अतीत में अंतर पैदा किया था। यदि वह सत्तासीन होती हैं तो हालात फिर से बदल सकते हैं, किंतु देश फिर भी मतांधता की ओर वापस नहीं लौटेगा। ताक लगाए कट्टरपंथी बांग्लादेश के समाज को बदल नहीं सकेंगे। जमायती तत्वों का वर्चस्व हो सकता है, उदारवाद को क्षति भी हो सकती है, फिर भी वह कायम रहेगा। मैं महसूस करता हूं कि वहां समाज सीधे-सीधे दो भागों में बंटा है। एक भाग मुक्ति-समर्थक है और दूसरा मजहबी प्रचार से प्रभावित है। अंततोगत्वा उदारवाद ही विजयी होगा। आतंकवादियों को वहां सरकार का प्रत्यक्ष या परोक्ष समर्थन प्राप्त नहीं है, जबकि अपनी हाल की यात्रा के बाद पाकिस्तान के बारे में निश्चयपूर्वक ऐसा नहीं कह सकता। पूर्वी पाकिस्तान तो हमेशा पश्चिमी पाकिस्तान से अधिक उदार रहा था और हिंदुओं के अधिक सन्निकट भी समझा जाता था। एक बांग्लादेशी बुद्धिजीवी ने पाकिस्तान से विभाजन के संबंध में स्पष्टीकरण दिया कि ऐसा होने का कारण उनके समाज में उदारवाद और समझबूझ होना है, जिससे देश उग्रवाद और पूर्वाग्रह में संलिप्त नहीं हो पाया। बांग्लादेश के संस्थापक शेख मुजीब ने ढाका में मुझे 1972 में बताया था, कुल मिलाकर पाकिस्तान ने चार बातें सिखाई हैं-इस्लाम खतरे में है, हिंदू काफिर हैं, भारत शत्रु है और कश्मीर निश्चित तौर पर फतह किया जाना चाहिए। इसी प्रचार द्वारा विगत अनेक वर्षो में पाकिस्तानियों को भरमाया गया है। उस देश में जो घृणा अभियान चलाया गया वह इस्लाम के सिद्धांतों के भी विरुद्ध है। जब तक पाकिस्तान के लोगों की मनोवृत्ति नहीं बदलती तब तक वे अपने कल्पनालोक से बाहर नहीं निकल सकते। 1971 में जो अत्याचार हुए थे उन्हें न तो बांग्लादेश भूला है और न ही उसने पाकिस्तान को क्षमा किया है, किंतु कुछ लोग वहां हैं जो उन दिनों को याद करते हैं जब दोनों साथ रहते थे। इस्लामाबाद क्या करता है और क्या नहीं करता उसका भारत-बांग्लादेश संबंधों पर कोई खास प्रभाव नहीं पड़ता। दिल्ली ही उसके लिए जिम्मेदार है। ढाका ने वस्तुत: वह सब कुछ किया है जो दोनों देशों के बीच करार में निर्धारित है। उसने ट्रांजिट सुविधाएं दी हैं, जिनसे पूर्वोत्तर राज्यों का शेष भारत से संपर्क सुलभ हुआ है, फिर भी उसे दस लाख डॉलर का बहुप्रचारित ऋण नहीं मिला। बांग्लादेश के लिए बेहतर समाचार मुक्त व्यापार ही होगा। मुझे यह बात समझ नहीं आई कि जब बांग्लादेश से अथवा इस लिहाज से पाकिस्तान से भी व्यापार की बात आती है तो नई दिल्ली अपने कदम पीछे क्यों खींच लेती है। उनसे शुल्क मुक्त (ड्यूटी फ्री) व्यापार से अरबों डालर के आयात पर खास अंतर नहीं पड़ेगा। भारत के विशाल बाजार से दोनों देश लाभ उठा सकते हैं। इससे बांग्लादेश और पाकिस्तान में निहित हित सृजित होंगे। शेख हसीना बड़ी उत्सुकता से मनमोहन सिंह की यात्रा की प्रतीक्षा कर रही हैं। नदी समझौते पर हस्ताक्षर की भी आशा है, किंतु उससे भी अधिक यह कि करार और अन्य सकारात्मक वार्ताओं से अपनी घटती ख्याति और लोकप्रियता को बहाल करने की भी आस लगाए हुए हैं। आशा है कि वह सही सिद्ध होंगी, किंतु मेरा अनुभव यह भी है कि जब पड़ोसी देशों से व्यवहार की बात आती है तो भारत बहुत संकोच बरतता है। नई दिल्ली को कूटनीति की कला सीखनी होगी। (लेखक वरिष्ठ स्तंभकार हैं).

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