अमेरिका-पाक संबंधों पर लेखक की टिप्पणी
दो आईएसआई एजेंटों के परिवारों को मुआवजे के तौर पर दिए गए पैसे के बाद पाकिस्तान में अमेरिकी जासूस रेमंड डेविस की रिहाई से अमेरिका-पाक के बीच चल रहा राजनयिक विवाद फिलहाल थम गया है। लेकिन इस प्रकरण के समाप्त होने से यह संकेत नहीं मिलता कि पिछले कुछ समय से अमेरिका और पाकिस्तान के संबंधों में तनाव कम होने लगा है। दोनों देशों के बीच कई मुद्दों पर विवाद है। इनमें पाकिस्तान के फाटा इलाके पर अमेरिकी ड्रोन हमलों का मुद्दा भी शामिल है। अमेरिका के लिए अफगानिस्तान में तालिबान उग्रवादियों के खिलाफ उसकी मुहिम में पाकिस्तान महत्वपूर्ण सहयोगी देश है और अमेरिकी सहायता के बिना पाकिस्तान का अस्तित्व ही खतरे में पड़ जाएगा। भविष्य में पाकिस्तान को अमेरिकी मदद के प्रवाह पर डेविस मामले के दूरगामी प्रभाव पड़ने की संभावना है। अफगानिस्तान में कुछ उग्रवादी संगठनों को नाकाम करने के पाकिस्तानी वायदे पर संदेह के चलते अमेरिकी कांग्रेस सहायता पैकेज की समीक्षा कर सकती है। अमेरिका में बहुमत वाली पार्टी रिपब्लिकन की सांसद डाना रोहराबाखर ने कहा कि डेविस मामले को देखते हुए हमें अपने सिद्घांतों पर गंभीरता से गौर करना होगा कि हम किसे सहायता दें और क्या सहायता पाने वाला हमारा मित्र है या नहीं। कहीं ऐसा तो नहीं कि वह हमारा फायदा तो उठा रहा हो। आतंक के खिलाफ अमेरिकी लड़ाई में सहयोग करने के लिए राजी होते समय शायद पाकिस्तानी नेताओं ने घरेलू राजनीति पर पड़ने वाले इसके असर पर ध्यान नहीं दिया था। पाकिस्तान के फाटा इलाके पर जारी अमेरिकी ड्रोन हमलों ने न केवल वहां के लोगों को अमेरिका-विरोधी बना दिया है, बल्कि वे पाकिस्तान सरकार के भी खिलाफ हो गए हैं। पूर्व राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू बुश ने इन हमलों की शुरुआत की थी, जो बराक ओबामा के शासन काल में काफी बढ़ गए हैं। इस्लामाबाद ने इन हमलों को लेकर बार-बार अमेरिका से आपत्ति प्रकट करते हुए कहा है कि इनसे देश की प्रभुसत्ता का उल्लंघन हो रहा है। पिछले साल ही ऐसे 124 हमलों में अफगानिस्तान की सीमा पर आतंकवादियों के गढ़ माने जाने वाले पाकिस्तानी सीमांत इलाके में करीब 1,200 लोग मारे गए थे। अमेरिका का कहना है कि इन हमलों में पाकिस्तानी उग्रवादियों को निशाना बनाया गया था, लेकिन पाकिस्तानी अधिकारी कहते हैं कि इनमें कई नागरिक भी मारे जा रहे हैं। पाकिस्तानी सरकार के सूत्रों के अनुसार, अमेरिकी ड्रोन हमले में एक उग्रवादी के पीछे 50 नागरिक मारे जाते हैं। अफगानिस्तान-पाकिस्तान क्षेत्र में अमेरिकी नेतृत्व में नाटो सेनाओं के इन हमलों की अफगान राष्ट्रपति हामिद करजई ने भी निंदा की है। हाल ही में दो कारणों से ओबामा सरकार के साथ उनके रिश्तों में खटास आ गया है। पहला कारण है ड्रोन हमला। इनमें न केवल तालिबान बल्कि नागरिक भी मारे जा रहे हैं। दूसरे, करजई विभिन्न तालिबान धड़ों के साथ शांति वार्ता में पाकिस्तान सेना के समर्थन वाले हक्कानी ग्रुप को भी शामिल करना चाहते हैं, जबकि अमेरिका इसके पक्ष में नहीं है। अफगानिस्तान-पाकिस्तान क्षेत्र में अमेरिकी नेतृत्व में नाटो सेनाओं की मौजूदगी ने पाकिस्तानी सरकार को मुश्किल में डाल दिया है, लेकिन इससे पाकिस्तान सरकार को अपनी पूर्वी सीमा पर ध्यान देने का मौका भी मिला है। पाकिस्तान के पास अगर फाटा में आतंक के खिलाफ लड़ाई के लिए अतिरिक्त क्षेत्रीय बल न होते तो वह अपनी सेनाओं के एक बड़े हिस्से को इस ओर न लगा पाता। पाकिस्तानी सरकार जानती है कि अमेरिकी नेतृत्व वाली नाटो सेनाओं की इस साल जुलाई में प्रस्तावित वापसी के बाद आतंकवादियों के खतरे से निपटना मुश्किल हो जाएगा और इसलिए इन सेनाओं का अफ-पाक इलाके में बना रहना ही पाकिस्तान के हित में है। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं).
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