अब वह जमाना गया, जब अमेरिका को गाली देना ही गुट निरपेक्षता कही जाती थी। अब अमेरिका और अमेरिका विरोधी के बीच ध्रुवीकरण नहीं हो रहा। अब ध्रुवीकरण हो रहा है लोकतंत्र समर्थक और लोकतंत्र विराधी के बीच। मुस्लिम देशों में लोकतंत्र का उदय अब धर्मतंत्र को भी समाप्त करने का लक्षण है..छले दो माह से लोकतंत्र ने इस्लाम के पाले में कदम बढ़ा दिए हैं। एकाएक ट्यूनीशिया में जन क्रांति हुई। इसके पूर्व इराक और अफगानिस्तान में भी लोकतंत्र लागू हुआ, किंतु वहां लोकतंत्र पूरी तरह साम्राज्यवादी लोकतंत्र था- थोपा हुआ था, जनता की इसमें कोई भागीदारी नहीं थी। एक प्रकार से लोकतांत्रिक देशों ने अपनी सैन्य शक्ति के बल पर इन दोनों देशों की जनता को तानाशाही से मुक्त कराया था। सच्चाई यह है कि इन दो देशों के अभियान ने लोकतंत्र की व्यवस्था पर भी प्रश्नचिन्ह खड़े किए थे और यही कारण था कि लोकतांत्रिक देश अफगानिस्तान और इराक के बाद अपनी मुहिम को आगे नहीं बढ़ा सके। किंतु ट्यूनीशिया और मिd के परिवर्तन को साफ तौर पर जनक्रांति कहने में कोई हिचक नहीं होनी चाहिए। इन दोनों देशो में न कोई पूर्व तैयारी थी, न कोई नेतृत्व था और न ही कोई मुद्दे थे। सबकुछ पूरी तरह शांत था। इतना शांत कि यदि इसके ठीक पूर्व मतदान होता तो इन दोनों सत्ताधीशों को 90 प्रतिशत से भी अधिक वोट मिलते और दोनों ही दुनिया में अपनी-अपनी लोकप्रियता का ढिंढोरा पीटते मिलते। किंतु परिवर्तन एकाएक इतनी तेज गति से हुआ कि इन्हें न सोचने-समझने का मौका मिला, न संभलने का। सोचने-समझने तक वहां तानाशाही को परास्त करके लोकतंत्र आ चुका था।
लोकतंत्र के लिए जनक्रांति की यह लहर कई जगह शुरू हुई, किंतु निर्णायक स्थान तक नही पहुंच सकी, क्योंकि अन्य देशों में आई क्रांति की लहर स्वत: स्फूर्त न होकर ट्यूनीशिया-मिd की नकल मात्र थी। दूसरी बात यह रही कि इस पहल के पूर्व यहां के तानाशाहों को संभलने का मौका मिल चुका था। तीसरी बात यह भी रही कि ट्यूनीशिया और मिd की सरकारों के साथ लोकतांत्रिक देशों का समझौता था। इन देशों द्वारा हाथ खींच लेने के बाद इन्हें हथियार डालने के अलावा कोई मार्ग नहीं दिखा। लीबिया के साथ वैसी स्थिति नहीं थी। लीबिया पूरी तरह अमेरिकी गुट से स्वतंत्र था। लीबिया को तैयारी करने का अवसर मिला और लीबिया की क्रांति स्व: स्फूर्त न होकर ट्यूनीशिया-मिd की नकल मात्र थी। यही कारण रहा कि दो के बाद किसी तीसरे देश में लोकतंत्र की यह मुहिम आगे नहीं बढ़ सकी।
लोकतांत्रिक देशों ने पुन: इराक-अफगानिस्तान का मार्ग पकड़ा और इन देशों के विद्रोहियों को मदद देनी शुरू की। लीबिया पर हवाई हमले शुरू हुए और लीबिया के तानाशाह कर्नल गद्दाफी की पराजय निश्चित दिख रही है। यमन और कुछ अन्य देशों में यह लोकतंत्र की मुहिम क्या रूप लेगी, यह अभी पता नहीं, किंतु इतना स्पष्ट दिखता है कि मुस्लिम तानाशाही की जड़ों में लोकतंत्र के कीड़े प्रवेश कर चुके हैं और अमेरिका आदि देशों को भी लोकतंत्र थोपने की मुहिम आगे बढ़ाने का बहाना मिल गया है। मुस्लिम देशों में लोकतंत्र की यह छलागं पूरी मुस्लिम विचारधारा में बदलाव लाएगी। अबतक मुसलमान लोकतंत्र के स्थान पर धर्मतंत्र को महत्व देते रहे हैं। यही कारण है कि मुस्लिम देशों के शासक धार्मिक भावना को सत्ता की पूंजी मानते रहे हैं। दो स्थानों की जनक्रांति ने पश्चिमी देशों को बल प्रयोग द्वारा भी लोकतंत्र थोपने का मार्ग खोल दिया है। किंतु पश्चिमी देशों की इस कोशिश ने एक बहस को भी जन्म दिया है कि क्या किसी देश के आंतरिक मामलों में अन्य देश हस्तक्षेप कर सकते हैं? कर्नल गद्दाफी यही प्रश्न बार-बार उठा रहे हैं। दूसरी तरफ लोकतांत्रिक टीम का तर्क है कि यदि कोई व्यक्ति बलपूर्वक अपने देश का शासक बन जाए तो अन्य लोकतांत्रिक देश सिर्फ मूक दर्शक कैसे बने रहें? यों इराक पर अमेरिकी आक्रमण ने पूरे मुस्लिम समुदाय को एकजुट कर दिया था, भले ही भय या स्वार्थ के कारण वे चुप रह गए हों। किंतु नई स्थिति में मुस्लिम जगत भी विभाजित हो गया है। लीबिया पर अमेरिकी हमले का वैसा विरोध नहीं है, जैसा इराक-आक्रमण के समय था। फिर भी कुछ देशों की मजबूरी है कि वे स्वयं को अमेरिका के विरुद्ध दिखते रहने का प्रयास करें, भले ही अंदर-अंदर उसके साथ भी हों। उन्होंने अमेरिकी आक्रमण के औचित्य पर शंका प्रकट की है और ऐसे देशों में भारत भी शामिल है।
भारत एक लोकतांत्रिक देश है। लोकतंत्र और तानाशाही अथवा धर्मतंत्र के बीच कोई टकराव होता है तो लोकतंत्र का समर्थन भारत का भी नैतिक दायित्व है। दूसरी ओर किसी देश के आंतरिक मामलों में कोई अन्य देश अकारण हस्तक्षेप करे तो पीड़ित का साथ देना भारत का कर्तव्य है। विचारणीय प्रश्न यह है कि क्या तानाशाही किसी देश का आंतरिक मामला है? बिल्कुल नहीं। क्यों नहीं कर्नल गद्दाफी यह घोषित कर देते हैं कि संयुक्त राष्ट्र संघ लीबिया में जनमत संग्रह करा ले और यदि वहां की जनता मुझे नहीं चाहेगी तो मैं हट जाऊंगा। शायद अमेरिका इस बात पर तैयार होकर आक्रमण बंद कर देगा, किंतु गद्दाफी को यह विश्वास नहीं है कि वहां की जनता स्वतंत्रता की स्थिति में तानाशाही का समर्थन करेगी। ऐसी हालत में कर्नल गद्दाफी जनमत संग्रह हेतु तैयार न हों, तब विश्व समुदाय का क्या कर्तव्य है? मनुष्य किसी देश का गुलाम मात्र नहीं है। वह विश्व समुदाय की एक इकाई है। उसके कुछ प्राकृतिक अधिकार हैं, जिनकी सुरक्षा विश्व समुदाय का दायित्व है। यदि राज्य भी उसके ऐसे अधिकार पर आक्रमण करे तो विश्व समुदाय उसकी सुरक्षा के लिए राज्य को मजबूर कर सकता है। यह अलग बात है कि साम्यवाद और लोकतंत्र के विवाद में लोकतंत्र इतना सशक्त नहीं था कि वह विश्व समुदाय का प्रतिनिधित्व कर सके।
लोकतंत्र के लिए जनक्रांति की यह लहर कई जगह शुरू हुई, किंतु निर्णायक स्थान तक नही पहुंच सकी, क्योंकि अन्य देशों में आई क्रांति की लहर स्वत: स्फूर्त न होकर ट्यूनीशिया-मिd की नकल मात्र थी। दूसरी बात यह रही कि इस पहल के पूर्व यहां के तानाशाहों को संभलने का मौका मिल चुका था। तीसरी बात यह भी रही कि ट्यूनीशिया और मिd की सरकारों के साथ लोकतांत्रिक देशों का समझौता था। इन देशों द्वारा हाथ खींच लेने के बाद इन्हें हथियार डालने के अलावा कोई मार्ग नहीं दिखा। लीबिया के साथ वैसी स्थिति नहीं थी। लीबिया पूरी तरह अमेरिकी गुट से स्वतंत्र था। लीबिया को तैयारी करने का अवसर मिला और लीबिया की क्रांति स्व: स्फूर्त न होकर ट्यूनीशिया-मिd की नकल मात्र थी। यही कारण रहा कि दो के बाद किसी तीसरे देश में लोकतंत्र की यह मुहिम आगे नहीं बढ़ सकी।
लोकतांत्रिक देशों ने पुन: इराक-अफगानिस्तान का मार्ग पकड़ा और इन देशों के विद्रोहियों को मदद देनी शुरू की। लीबिया पर हवाई हमले शुरू हुए और लीबिया के तानाशाह कर्नल गद्दाफी की पराजय निश्चित दिख रही है। यमन और कुछ अन्य देशों में यह लोकतंत्र की मुहिम क्या रूप लेगी, यह अभी पता नहीं, किंतु इतना स्पष्ट दिखता है कि मुस्लिम तानाशाही की जड़ों में लोकतंत्र के कीड़े प्रवेश कर चुके हैं और अमेरिका आदि देशों को भी लोकतंत्र थोपने की मुहिम आगे बढ़ाने का बहाना मिल गया है। मुस्लिम देशों में लोकतंत्र की यह छलागं पूरी मुस्लिम विचारधारा में बदलाव लाएगी। अबतक मुसलमान लोकतंत्र के स्थान पर धर्मतंत्र को महत्व देते रहे हैं। यही कारण है कि मुस्लिम देशों के शासक धार्मिक भावना को सत्ता की पूंजी मानते रहे हैं। दो स्थानों की जनक्रांति ने पश्चिमी देशों को बल प्रयोग द्वारा भी लोकतंत्र थोपने का मार्ग खोल दिया है। किंतु पश्चिमी देशों की इस कोशिश ने एक बहस को भी जन्म दिया है कि क्या किसी देश के आंतरिक मामलों में अन्य देश हस्तक्षेप कर सकते हैं? कर्नल गद्दाफी यही प्रश्न बार-बार उठा रहे हैं। दूसरी तरफ लोकतांत्रिक टीम का तर्क है कि यदि कोई व्यक्ति बलपूर्वक अपने देश का शासक बन जाए तो अन्य लोकतांत्रिक देश सिर्फ मूक दर्शक कैसे बने रहें? यों इराक पर अमेरिकी आक्रमण ने पूरे मुस्लिम समुदाय को एकजुट कर दिया था, भले ही भय या स्वार्थ के कारण वे चुप रह गए हों। किंतु नई स्थिति में मुस्लिम जगत भी विभाजित हो गया है। लीबिया पर अमेरिकी हमले का वैसा विरोध नहीं है, जैसा इराक-आक्रमण के समय था। फिर भी कुछ देशों की मजबूरी है कि वे स्वयं को अमेरिका के विरुद्ध दिखते रहने का प्रयास करें, भले ही अंदर-अंदर उसके साथ भी हों। उन्होंने अमेरिकी आक्रमण के औचित्य पर शंका प्रकट की है और ऐसे देशों में भारत भी शामिल है।
भारत एक लोकतांत्रिक देश है। लोकतंत्र और तानाशाही अथवा धर्मतंत्र के बीच कोई टकराव होता है तो लोकतंत्र का समर्थन भारत का भी नैतिक दायित्व है। दूसरी ओर किसी देश के आंतरिक मामलों में कोई अन्य देश अकारण हस्तक्षेप करे तो पीड़ित का साथ देना भारत का कर्तव्य है। विचारणीय प्रश्न यह है कि क्या तानाशाही किसी देश का आंतरिक मामला है? बिल्कुल नहीं। क्यों नहीं कर्नल गद्दाफी यह घोषित कर देते हैं कि संयुक्त राष्ट्र संघ लीबिया में जनमत संग्रह करा ले और यदि वहां की जनता मुझे नहीं चाहेगी तो मैं हट जाऊंगा। शायद अमेरिका इस बात पर तैयार होकर आक्रमण बंद कर देगा, किंतु गद्दाफी को यह विश्वास नहीं है कि वहां की जनता स्वतंत्रता की स्थिति में तानाशाही का समर्थन करेगी। ऐसी हालत में कर्नल गद्दाफी जनमत संग्रह हेतु तैयार न हों, तब विश्व समुदाय का क्या कर्तव्य है? मनुष्य किसी देश का गुलाम मात्र नहीं है। वह विश्व समुदाय की एक इकाई है। उसके कुछ प्राकृतिक अधिकार हैं, जिनकी सुरक्षा विश्व समुदाय का दायित्व है। यदि राज्य भी उसके ऐसे अधिकार पर आक्रमण करे तो विश्व समुदाय उसकी सुरक्षा के लिए राज्य को मजबूर कर सकता है। यह अलग बात है कि साम्यवाद और लोकतंत्र के विवाद में लोकतंत्र इतना सशक्त नहीं था कि वह विश्व समुदाय का प्रतिनिधित्व कर सके।
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