Wednesday, April 6, 2011

लीबिया में नंगी दखलंदाजी रोको


लीबिया को तबाही के रास्ते पर धकेला जा रहा है। नाटो की इस सैन्य दखलंदाजी की भारत में संसद समेत सभी हलकों ने निंदा की है। यूपीए सरकार ने, संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव पर मतदान से अलग रहकर, सही किया था। लेकिन, इतना ही काफी नहीं है। मतदान से अलग रहने वाले सुरक्षा परिषद के अन्य चार सदस्य देशों-रूस, चीन, जर्मनी तथा ब्राजील-के साथ मिलकर भारत को इसकी मांग करनी चाहिए कि सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव को किस तरह लागू किया जा रहा है, उसकी फौरन समीक्षा की जाए
अब से ठीक सौ साल पहले दुनिया ने पहली हवाई बमबारी देखी थी, यानी हवाई जहाजों को जमीन के निशानों पर बम बरसाते देखा था। यह घटना 1911 के 26 अक्टूबर की थी। इटली के विमानों ने त्रिपोली के निकट तुर्क सेनाओं पर बम गिराए थे। उस जमाने में आज का लीबिया उस्मानी साम्राज्य का हिस्सा हुआ करता था। आगे चलकर इटली ने लीबिया को अपना उपनिवेश ही बना लिया था। बहरहाल, लीबिया की जनता ने इतालवी उपनिवेशकों का बहादुरी के साथ मुकाबला किया था। इसके बाद, 1920 के दशक में मुसोलिनी की इटली ने हवाई जहाजों का सहारा लेकर, घोड़े पर सवार होकर लड़ने वाले हजारों कबीलाई लड़ाकों को बम बरसाकर जलाया और मारा था। उस बाद अब फिर लीबिया को अमेरिका, फ्रांस तथा ब्रिटेन के विमानों से तथा युद्धपोतों से भीषण हवाई बमबारी का निशाना बनाया जा रहा है। इटली ने सीधे इस कार्रवाई में हिस्सा नहीं लिया क्योंकि इससे उसके अपने बर्बर औपनिवेशिक इतिहास के प्रेतों के जाग उठने का खतरा था। बहरहाल, उसके सहयोगियों के अनेक विमानों ने इटली में एक हवाई अड्डे से उड़ान भरकर ही बम बरसाए थे। पश्चिमी ताकतें यह बेशर्मीभरा दावा कर रही हैं उनके हवाई हमलों का मकसद लीबिया में असैनिकों की हिफाजत करना है, जबकि उनकी बमबारी में सैकड़ों की संख्या में लीबियाई मारे गए हैं। लीबिया पर इस हमले की शुरूआत 19 मार्च को हुई थी। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव संख्या- 1973 ने एक सम्प्रभु देश के खिलाफ इस आक्रमण के लिए आवरण मुहैया कराने का काम किया है। इस प्रस्ताव में लीबिया पर उड़ान-वर्जित क्षेत्र थोपने के लिए कहा गया है। इस प्रस्ताव की भाषा ऐसी रखी गई है जिससे सीधे-सीधे दखलंदाजी का बहाना मिल जाता है। प्रस्ताव में नागरिकों की हिफाजत करने के लिए अन्य आवश्यक कदम उठाने का भी जो जिक्र है, वह बाकायदा दलखंदाजी का बहाना बन गया है। इस मौके का फायदा उठाकर लीबिया में तमाम सैन्य प्रतिष्ठानों पर बम बरसाए गए हैं। तथाकथित उड़ान वर्जित क्षेत्र लागू कराने को खींचकर, अगले कदम के तौर पर जमीन पर गद्दाफी शासन की सेनाओं को हवाई हमलों का निशाना बनाया गया है। इस तरह, बागियों के साथ नाटो की सैन्य शक्ति को जोड़ दिया गया है। लीबिया के खिलाफ युद्ध की मांग करने में फ्रांस और ब्रिटेन आगे-आगे थे। उनके लिए तो सुरक्षा परिषद का प्रस्ताव, गद्दाफी को हटाने के वास्ते कुछ भी करने के लिए खुली छूट दिया जाना है। ब्रिटिश सरकार के अधिकारी तो यह कहने की हद तक चले गए हैं कि अगर इससे नागरिकों की मौतों को रोका जा सकता है, जैसा कि संयुक्त राष्ट्र के प्रस्ताव में कहा गया है, तो लीबियाई नेता की हत्या भी वैध होगी! बहरहाल, लीबिया के खिलाफ सैन्य हस्तक्षेप के लक्ष्य की अलग-अलग व्याख्याओं को देखते हुए और खुद नाटो के कुछ सहयोगियों की इस सम्बंध में शिकायतों को देखते हुए, आखिरकार यह तय पाया गया कि इन कार्रवाइयों की कमान नाटो को सौंप दी जाए। फिदेल कास्त्रो ने शुरू में ही जो चेतावनी दी थी सही साबित हुई है-नाटो ने लीबिया पर हमला किया है। एक ओर तो नाटो कथित रूप से 'नागरिकों की हिफाजत करने' के नाम पर लीबिया पर सैन्य हमले जारी रखे हुए है और दूसरी ओर यमन तथा बहरीन में निरंकुश निजामों को अपने नागरिकों की हत्या करने तथा उन्हें अपंग बनाने की इजाजत दी जा रही है। यमन का राष्ट्रपति अली अब्दुल्ला सालेह पश्चिम का एक मूल्यवान सहयोगी है और बहरीन में तो अमेरिका का पांचवां जहाजी बेड़ा ही स्थित है। इसलिए, उनके नागरिकों की कुर्बानी दी जा सकती है। बहरहाल, अगर पश्चिम के दोहरे पैमाने इतने साफ-साफ देखने में आ रहे हैं तो राष्ट्रपति ओबामा की पाखंडलीला तो सचमुच इंसान का दम ही फुला देगी। नोबेल शांति पुरस्कार से सम्मानित ओबामा ने, अपने युद्धोन्माद को छुपाने की जीतोड़ कोशिश की है। हाल ही में अपने एक भाषण में ओबामा ने एलान किया था : ''हम (लीबियाई) निजाम को हथियारों से वंचित करेंगे, उसकी नकदी की आपूर्ति काट देंगे, विपक्ष की मदद करेंगे और अन्य देशों के साथ मिलकर इसके लिए काम करेंगे कि वह दिन जल्द से जल्द आए, जब गद्दाफी सत्ता छोड़ जाएगा।''
लेकिन, उसी सांस में उन्होंने यह ऐलान भी किया कि, ''अगर हम ताकत के सहारे गद्दाफी का तख्ता पलटने की कोशिश करेंगे, हमारा गठबंधन बिखर जाएगा।'' इस कथित 'मानवतावादी हस्तक्षेप' पर गठबंधन के भीतर के मतभेद भी निकलकर सामने आ गए हैं। अब जबकि नाटो ने इस कार्रवाई की बागडोर संभाल ली है, जर्मनी ने अपनी दो नौसैनिक फ्रिगेटों और आवाक टोही विमानों को हटा लिया है। जर्मनी सुरक्षा परिषद के उन पांच सदस्यों में से एक था, जिन्होंने लीबिया सम्बंधी प्रस्ताव पर मतदान से खुद को अलग कर लिया था। तुर्की नाटो का एक और साझीदार है जिसने उड़ान वर्जित क्षेत्र लागू कराने से आगे बढ़कर सैन्य हस्तक्षेप का विरोध किया है और यह ऐलान किया है कि वह लीबिया में कार्रवाई के लिए कोई सैनिक नहीं देगा। लीबिया पर लंदन में पिछले ही दिनों जो सम्मेलन बुलाया गया है उसमें अरब लीग का प्रतिनिधित्व होने का दावा तो किया जा रहा था, लेकिन वास्तव में उक्त सम्मेलन में न तो अरब लीग के महासचिव ने हिस्सा लिया और न ही मिस्र तथा अल्जीरिया समेत अनेक अरब देशों ने। दूसरी ओर, अरब अमीरात तथा कतर जैसे पश्चिम के वफादार निजाम ही इस सम्मेलन में अरब देशों की ओर से बोलने का दम भर रहे थे। इस बीच अमेरिका तथा ब्रिटेन ने बागियों को हथियार देने की बातें शुरू कर दी हैं। उधर नाटो के कमांडर ने इसका इशारा किया है कि बागियों की कतारों में इस्लामी तत्ववादी और अलकायदा के लोग भी हो सकते हैं। नाटो पर लीबिया के लिए एक अमेरिकापरस्त वैकल्पिक सरकार खड़ी करने का काम भी आ पड़ा है। नाटो का हस्तक्षेप एक सोचा-समझा तथा नंगईभरा कदम है, जिसके पीछे मकसद यह है कि अरब दुनिया में सामने आये जनिवद्रोहों को पलटा जाए और एक तानाशाहीपूर्ण शासन के खिलाफ मानवतावादी हस्तक्षेप के नाम पर, इस लहर का अपहरण कर लिया जाए। गद्दाफी निजाम ने 2003 में पश्चिम से सुलह कर ली थी और वह ब्रिटेन व अन्य पश्चिमी देशों का चहेता बन गया था और उसने बहुराष्ट्रीय तेल निगमों के लिए लीबिया के दरवाजे खोल दिए थे। बहरहाल, अब गद्दाफी का उसी तरह दानवीकरण किया जा रहा है, जैसा इराक में सद्दाम हुसैन का किया गया था। इस तरह पश्चिम एक गृहयुद्ध की आग पर तेल छिड़क रहा है। लीबिया को तबाही के रास्ते पर धकेला जा रहा है। नाटो की इस सैन्य दखलंदाजी की भारत में संसद समेत सभी हलकों ने निंदा की है। यूपीए सरकार ने, संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव पर मतदान से अलग रहकर, सही किया था। लेकिन, इतना ही काफी नहीं है। मतदान से अलग रहने वाले सुरक्षा परिषद के अन्य चार सदस्य देशों-रूस, चीन, जर्मनी तथा ब्राजील-के साथ मिलकर भारत को इसकी मांग करनी चाहिए कि सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव को किस तरह लागू किया जा रहा है, उसकी फौरन समीक्षा की जाए। अमेरिका तथा नाटो को, सुरक्षा परिषद के निर्णय का इस तरह अपहरण करने की इजाजत नहीं दी जा सकती है।



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