Thursday, April 28, 2011

हिंद की खुशबू से सराबोर है मॉरीशस का आप्रवासी घाट


मॉरीशस के पोर्ट लुइस में मौजूद आप्रवासी घाट (कुली घाट) से भारतीयों का गहरा संबंध है। सूदूर हिंद महासागर में मेडागास्कर और मालागासी गणराज्य के समीप अफ्रीकी जोन में मौजूद इस द्वीप में पहली बार हमारे पूर्वज बंधुआ मजदूर के रूप में जब यहां पहुंचे तो इसी आप्रवासी घाट पर उतरे थे। जाहिर है इस घाट पर आकर हिंदुस्तानियत की खुशबू आना लाजिमी है। भारत से आने वाला हर पर्यटक भी यहां अपनी आमद जरूर दर्ज कराते हैं। हिंदुस्तान से आए अब तक के सभी राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री के अलावा विशेष मेहमान यहां जरूर पहुंचते हैं। आप्रवासी घाट पर दर्ज तथ्यों के मुताबिक 2 नवम्बर वर्ष 1834 में पहली बार भारत से 36 कुली यहां बंधुआ मजदूर के रूप में लाए गए थे। यह सिलसिला लगातार चलता रहा। यहां दर्ज तथ्यों के मुताबिक आखिरी बार कुली के रूप में 31 मई 1924 को यहां हमारे तमाम पूर्वज बंधुआ मजदूर के रूप में पहुंचे थे। हिंदुस्तान में अंग्रेजी हूकूमत के दौरान यह सिलसिला शुरू हुआ तो सालों-साल चलता ही रहा। औपनिवेशिक इतिहास का सबसे अलग अध्याय यही है कि मॉरीशस में वर्ष 1834 से वर्ष 1900 तक 4,53,063 लोग यहां बंधुआ मजदूर के रूप में इस द्वीप में पहुंचा दिए गए थे। यूं तो मॉरीशस के राज्य में पुराने अभिलेख दसवीं शताब्दी के मिले हैं। इनमें तमिल, द्रविड़ और ओस्ट्रोनेशी नाविकों का जिक्र आता है। वर्ष 1507 में सबसे पहले पुर्तगाली नाविक यहां आए और उन्होंने इस निर्जन द्वीप पर एक यात्रा अड्डा स्थापित किया और फिर कुछ ही सालों में वीरानियत की वजह से छोड़कर चले भी गए। इतिहास में जिक्र मिलता है कि सन 1598 में हॉलैंड के तीन पोत जो स्फाइस आइलैंड की यात्रा पर निकले थे एक चक्रवात के दौरान रास्ता भटक कर यहां पहुंच गए थे। उन्होंने इस द्वीप का नाम अपने नासाओं के युवराज मॉरिस के सम्मान में मॉरीशस रख दिया। सन 1638 में डच लोगों ने पहली स्थायी बस्ती बसाई। यहां आने वाले चक्रवातो और कठोर जलवायु की वजह से वो भी लोग यहां नहीं टिक सके। उसके बाद इस द्वीप पर सन 1715 में फ्रांस ने कब्जा कर लिया और इसका नाम बदलकर 'आइल द फ्रांस' के शासन में चीनी उत्पादन पर जोर दिया गया और इसे आर्थिक रूप सुदृढ़ और विकसित किया गया। अठारहवीं शताब्दी के शुरू में फ्रांस और ग्रेट ब्रिटेन के बीच सैन्य संघर्ष शुरू हो गया। फ्रांस ने व्रिटेन को आर्थिक क्षति पहुंचाने के लिए इस द्वीप में समुद्री डाकुओं को पनाह दे डाली। ये समुद्री डाकू अक्सर मूल्यवान बस्तुओं से लदे ब्रिटिश जहाजों को लूट लेते थे। इन जहोजों में भारत से ब्रिटेन के बीच आयात निर्यात की वस्तु में लदी होती थी। फ्रांस की इस गतिविधि से खीझकर ब्रिटेन ने युद्ध का बिगुल फूंक दिया और सन 1803 से 1815 तक चले युद्ध के दौरान ब्रिटेन इस द्वीप पर कब्जा पाने में कामयाब हो गया। ब्रिटिश शासन के दौरान इस द्वीप का नाम बदलकर वापस मॉरीशस रख दिया गया। इस दौरान फ्रांस ने भी अपनी हार मान ली और ब्रिटेन के समक्ष कुछ शत्रे रख दी जिसमें प्रमुख यह था कि इस द्वीप में फ्रांसीसी भाषा का प्रयोग जारी रहेगा। शायद यही वजह है कि यहां फ्रेंच बोलने वालों की संख्या भी काफी ज्यादा है। आप्रवासी घाट का जिक्र करने से पहले इतिहास के उपयुक्त तथ्यों में जाना बेहद जरूरी था। इस द्वीप में ब्रिटेन का पूर्ण रूप से कब्जा हो जाने के बाद अंग्रेजों के लिए इसे बसाने की भी चुनौती थी क्योंकि भारत और ब्रिटेन के बीच आने-जाने वाले व्यापारिक जहाजों को यहां रोका भी जाता था। इस द्वीप के वीरानेपन की वजह से कोई भी अंग्रेज यहां न बसने को तैयार था न ही रुकने को। अठारहवीं शताब्दी में भारत में अंग्रेजी हूकूमत का दौर चल रहा था। अंग्रेजों ने इस द्वीप को बसाने के लालच में भारत के उत्तर प्रदेश और बिहार राज्य के तमाम अंचलों में रहने वाले गरीब मेहनतकश किसानों और मजदूरों को सब्जबाग दिखाए और कुछ बरसों के एग्रीमेंट पर मॉरीशस ले जाना शुरू कर दिया। इसके लिए अंग्रेजों ने बाकायदा कलकत्ता के बंदरगाह में लेबर डिपो खोल रखा था। जिसके जरिये निर्धन परिवारों के नौजवानों को खूबसूरत करियर और पैसे का लालच देकर यहां पटक दिया जाता था। आप्रवासी घाट ने सैकड़ों साल से हजारों हिंदुस्तानी पूर्वजों की यादें समा और सजा रखी हैं। हमारे पूर्वजों को मूर्ख बनाकर ले जाने वाले अंग्रेजों को उस समय एहसास भी नहीं होगा कि 21वीं शताब्दी में उन्हीं मजदूर परिवारों का कोई बच्चा इस द्वीप और देश का शासक बनेगा। अप्रवासी घाट के जरिये पहली बार यहां पहुंचने वाले पूर्वजों को शायद इससे बड़ी कोई श्रद्धांजलि भी नहीं हो सकती है। खास बात तो ये है कि मॉरीशस के अफ्रीकी देश होने के बाद भी यहां बसने वाले लोगों ने भारतीयता की जीवंतता को बनाए रखा।

No comments:

Post a Comment