अभी हाल ही में ब्रिक्स सम्मेलन संपन्न हुआ। दुनिया में सबसे तेजी से उभर रही विकासशील अर्थव्यवस्थाओं ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका के समूह को आज ब्रिक्स का नाम दिया गया है। ये पांचों देश अत्यंत तेजी से विकास ही नहीं कर रहे, दुनिया के विकसित देशों की आर्थिक शक्ति को चुनौती भी दे रहे हैं। दुनिया का आर्थिक संतुलन बदल रहा है और आज से दस वर्ष पहले जिन देशों का वर्चस्व दुनिया में था, उनका प्रभाव कम हुआ है और तेजी से विकास कर रही इन पांच अर्थव्यवस्थाओं ने अपना वर्चस्व आर्थिक शक्ति के नाते स्थापित किया है। ध्यान देने वाली बात है कि दक्षिण अफ्रीका इस समूह में पहली बार शामिल हुआ है। इससे पहले इसमें केवल चीन, भारत, ब्राजील और रूस ही शामिल थे और तब इसे ब्रिक के नाम से जाना जाता था। क्रय शक्ति समता के आधार पर अब चीन दुनिया की दूसरी और भारत तीसरी आर्थिक शक्ति बन चुका है। हम कह सकते हैं कि अब चीन और भारत ही नहीं, रूस, ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका भी आर्थिक शक्तियों के रूप में उभर रहे हैं। वैश्विक मंदी के दौर में यह प्रक्ति्रया और तेज हुई है और ये देश विकसित देशों से आगे बढ़ते जा रहे हैं। ऐसा इसलिए हुआ है कि विकसित देशों की आमदनी में एक ठहराव आ गया है, जबकि ब्रिक्स देशों की राष्ट्रीय आय 8 से 10 प्रतिशत की दर से बढ़ रही है। इसका मतलब यह नहीं है कि इन विकासशील देशों के लोगों का जीवन स्तर भी विकसित देशों सरीखा हो गया है। वास्तव में यह आर्थिक संवृद्धि केवल सकल जीडीपी के स्तर पर है, लेकिन जब हम प्रति व्यक्ति आय की बात करें तो पाते हैं कि प्रति व्यक्ति आय की दृष्टि से अभी विकसित और विकासशील देशों के लोगों के बीच एक बड़ी खाई विद्यमान है। क्रय शक्ति समता के आधार पर भी वर्ष 2009 में भारत की प्रति व्यक्ति आय मात्र 3260 डॉलर प्रतिवर्ष और चीन की प्रति व्यक्ति आय 6770 डॉलर प्रतिवर्ष थी। इसी वर्ष विकसित देशों में औसत प्रति व्यक्ति आय 36473 डॉलर प्रतिवर्ष थी। इसलिए स्वाभाविक ही है कि मानव विकास सूचकांक की दृष्टि से दुनिया में भारत का स्थान वर्ष 2010 में 119वां और चीन का 89वां रहा। ऐसे में ब्रिक्स देशों के तेजी से विकास के बावजूद इन देशों में आम जन के जीवन स्तर में सुधार के लिए अभी बहुत लंबा रास्ता तय करना बाकी है। इसलिए इन देशों के बीच आपसी समझ और सहकारिता इनके और तेजी से विकास और आम जन के जीवन स्तर में सुधार हेतु सहयोगी भूमिका निभा सकते हैं। यह बात सही है कि पिछले दशक के प्रारंभ में चीन, भारत, ब्राजील और रूस की अर्थव्यवस्थाओं का कुल आकार वैश्विक अर्थव्यवस्था के कुल आकार का मात्र छठा हिस्सा ही था, जो वर्ष 2010 तक बढ़कर वैश्विक अर्थव्यवस्था का एक चौथाई हो चुका है। इससे पूर्व चार देशों के ब्रिक समूह के दो सम्मेलन रूस और ब्राजील में हो चुके हैं। दक्षिण अफ्रीक को शामिल करते हुए अब इस समूह का यह तीसरा सम्मेलन चीन के सान्या शहर में संपन्न हुआ है। इन देशों के तेजी से विकास के बावजूद विशेष तौर पर भारत और चीन में अब भी आम जनजीवन मूलभूत आवश्यकताओं के लिए संघर्ष कर रहा है। अभी भी ये देश क्षेत्रीय असंतुलन, ऊर्जा और खाद्य सुरक्षा, गरीबी व बेरोजगारी की समस्याओं से जूझ रहे हैं। दूसरी ओर विकास के लाभ केवल कुछ वर्गो तक सीमित दिखाई देते हैं। भारत और चीन में मध्यम वर्ग का आकार लगातार बढ़ रहा है और साथ ही बढ़ रही है आय संपत्ति की असमानताएं। अभी भी भारत में प्रति व्यक्ति खाद्यान्न उपलब्धता 436 ग्राम प्रति व्यक्ति प्रतिदिन ही है। अभी भी जहां अमेरिका में प्रति व्यक्ति ऊर्जा उपभोग 7766 किलो तेल के बराबर है, भारत में यह 529 किलो और चीन में 1484 किलो ही है। ऐसे में इन देशों में मानव विकास के लिए सुविधाएं जुटाने की नितांत आवश्यकता है। ब्रिक्स देशों का यह सम्मेलन इन समस्याओं के मद्देनजर आपसी सहयोग बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है, लेकिन भारत और चीन के बीच इस सहयोग को बढ़ाने की दृष्टि से कई कठिनाइयां हैं। भारत और चीन के बीच सहयोग का एक महत्वपूर्ण पहलू विदेशी व्यापार है, लेकिन भारत और चीन के बीच विदेशी व्यापार का असंतुलन एक महत्वपूर्ण समस्या है। आज भारत और चीन के बीच विदेशी व्यापार जो 1990 में नगण्य ही था, वह बढ़कर 60 अरब डॉलर तक पहुंच गया है, लेकिन इसमें भारत द्वारा निर्यात केवल 20 अरब डॉलर और आयात 40 अरब डॉलर के हैं, ऐसे में भारत और चीन के बीच व्यापार शेष 20 अरब डॉलर तक पहुंच चुका है। भारत द्वारा निर्यात में कच्चा माल और आयात में तैयार माल की अधिकता है। इस व्यापार असंतुलन का मुख्य कारण चीनी सरकार द्वारा अपने उद्योगों को भारी मात्रा में सब्सिडी देना है। ऐसे में चीनी माल लागत से भी कम मूल्य पर भारत सहित अन्य देशों को निर्यात कर दिया जाता है। दूसरी ओर चीनी सरकार द्वारा युआन की विनिमय दर कृत्रिम रूप से कम रखी गई है। अमेरिका सहित अन्य देशों से युआन का पुनर्मूल्यन करने की मांग लगातार उठती रही है, लेकिन चीनी सरकार किसी भी हालत में युआन का पुनर्मूल्यन करने के लिए तैयार नहीं है। इस प्रकार विदेशी व्यापार में असंतुलन के चलते भारत सहित दुनिया के दूसरे मुल्कों में चीन के प्रति अकुलाहट और कड़वाहट विद्यमान है। चीन की इस विदेश व्यापार नीति के चलते चीन और दूसरे देशों के बीच आपसी सहयोग संभव नहीं है। चीनी सरकार द्वारा अपने उद्योगों को अनावश्यक रूप से अधिक सब्सिडी देने के कारण बजट घाटा बढ़ रहा है। बढ़ते बजट घाटे के चलते मुद्रा का अधिक प्रसार चीन में महंगाई बढ़ा रहा है। चीनी माल से मुकाबला करने के लिए भारत में भी सरकार पर टैक्स कम करने का दबाव बना रहता है। ऐसे में दोनों देशों को राजकोषीय घाटा बढ़ाना पड़ता है और दोनों देशों के निवासी महंगाई से त्रस्त रहते हैं। साथ ही साथ चीन द्वारा लगातार भारत के साथ सीमा विवाद बढ़ाने के कारण भारत को रक्षा पर अपना व्यय बढ़ाना पड़ रहा है। ब्रिक्स के अंतर्गत पिछले दशक में वरिष्ठ सुरक्षा अधिकारियों, विदेश मंत्रियों, वित्त मंत्रियों, केंद्रीय बैंक के गर्वनरों, व्यापार प्रतिनिधि मंडलों और वित्तीय संस्थाओं के प्रतिनिधियों के बीच आपसी बातचीत सहयोग बढ़ाने की दृष्टि से कुछ महत्वपूर्ण कदम उठाए गए हैं। कहा जा रहा है कि जिस प्रकार से विकसित देशों के जी-8 समूह में आपसी सहयोग की व्यवस्था बनाई गई है। उसी प्रकार से ब्रिक्स सम्मेलन में आपसी मतैक्य, सहयोग और समन्वय बढ़ाकर इन देशों के आम जन की समस्याओं को सुलझाने का प्रयास किया जा सकता है, लेकिन इसके लिए जरूरी है कि चीन अपने लघुकालिन स्वार्थ को त्यागते हुए इस समूह के देशों में सहयोग का एक नया अध्याय लिखने का प्रयास करे। (लेखक आर्थिक मामलों के जानकार हैं).
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