लीबिया में हस्तक्षेप को अमेरिका की एक और बड़ी गलती के रूप में देख रहे हैं लेखक
क्या यह विचित्र नहीं कि एक ओर अमेरिका अफगानिस्तान में जारी युद्ध में अपनी पराजय टालने के लिए जूझ रहा है और दूसरी ओर उसने लीबिया में लड़ाई का एक और मोर्चा खोल दिया है और वह भी तब जब पाकिस्तान के संदर्भ में उसकी नीति पूरी तरह लड़खड़ा गई है? इससे भी अधिक चौंकाने वाला यह है कि वह भारत पर उस पाकिस्तान के साथ सभी मुद्दों पर बातचीत फिर से आरंभ करने के लिए दबाव डाल रहा है जो अभी भी आतंकवादियों के लिए सबसे प्रमुख शरणस्थली बना हुआ है। लीबिया में पश्चिमी हस्तक्षेप की शुरुआत सीमित और मानवीय मिशन के रूप में हुई थी, लेकिन अब पश्चिमी देश लीबियाई सेना पर पूरी ताकत से टूट पड़े हैं। इससे एक बार फिर यह साबित हो रहा है कि अमेरिका अरब दुनिया को अपने नियंत्रण से बाहर नहीं जाने देना चाहता। पश्चिमी देशों का यह हस्तक्षेप एक सामान्य भू-राजनैतिक गणित पर आधारित है और यह गणित है कर्नल गद्दाफी को सत्ता से हटाना या उन पर फंदा कस देना ताकि उनकी सत्ता पड़ोसी देशों-मिF और ट्यूनीशिया में उत्पन्न राजनीतिक रिक्तता से लाभ न उठा सके। शायद कम ही लोग उस कीमत का आकलन कर पा रहे हैं जो लोकतंत्रों को इस्लामिक कट्टरता अथवा आतंकवाद के उभार के रूप में चुकानी पड़ी है। अमेरिका अभी भी अरब जगत में अपनी कठपुतली राष्ट्राध्यक्षों की मौजूदगी चाहता है और इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए कट्टरपंथी शक्तियों की परोक्ष मदद लेने से भी संकोच नहीं किया जा रहा है। एक ऐसे समय जब अमेरिका को व्यापक घरेलू सुधार की आवश्यकता है तब हैरत की बात है कि शांति के लिए नोबेल पुरस्कार जीत चुके राष्ट्रपति के नेतृत्व में यह देश एक और युद्ध की तैयारी कर रहा है। अमेरिका शायद यह देखने के लिए तैयार नहीं कि वह जो दो अन्य युद्ध लड़ रहा है उसमें उसे 150 अरब डालर प्रतिवर्ष खर्च करने पड़ रहे हैं। ऐसा लगता है कि फिर से राष्ट्रपति पद पर निर्वाचित होने की कोशिश कर रहे ओबामा अपने देश में अपनी घटती लोकप्रियता सुधारने के लिए लीबिया में एक त्वरित सैन्य जीत चाहते हैं। अमेरिका और पश्चिमी देशों के सैन्य दबाव में यदि गद्दाफी शासन का पतन भी हो जाए तब भी इसकी संभावना कम ही है कि इस्लामिक समूहों से मुक्त एक स्थिर और एकीकृत लीबिया की स्थापना की जा सकेगी। इराक में अमेरिकी सेना के हमले के बाद सद्दाम हुसैन को सत्ता से हटाकर अभीष्ट राजनीतिक उद्देश्यों की प्राप्ति नहीं हो सकी थी। इसके बजाय यह कहा जा सकता है कि अमेरिकी हमले ने एक स्थिर और सेक्युलर इराक को न केवल अस्थिर किया, बल्कि उसमें कट्टरता फैलाने के साथ प्रभावी रूप से उसका विभाजन भी कर दिया। लीबिया ओबामा का इराक बनने की ओर है। विडंबना यह है कि लीबिया के बागियों को मदद देने के साथ अमेरिका अफगानिस्तान में कट्टरपंथी ताकतों अर्थात तालिबान के साथ सौदेबाजी की कोशिश कर रहा है ताकि एक दशक पुराने अफगानिस्तान युद्ध में उसकी निश्चित पराजय टल सके। अमेरिका के रक्षा मंत्री राबर्ट गेट्स ने पिछले दिनों अफगानिस्तान युद्ध से पीछे हटने के लिए अपने सहयोगियों की आलोचना की। अमेरिका अपने सहयोगियों की क्यों आलोचना कर रहा है जब उसने खुद ही जीत के लक्ष्य को दरकिनार कर दिया है और अब केवल काबुल से चेहरा बचाने वाली विदाई चाहता है। अमेरिका लीबियाई ठिकानों पर सैकड़ों मिसाइलें तो दाग रहा है, लेकिन उसे यह नहीं सूझ रहा कि पाकिस्तान में तेजी से बढ़ रहे अमेरिका विरोध से कैसे निपटा जाए? पाकिस्तान अमेरिका से सबसे अधिक सहायता पाने वाला देश है, लेकिन वहां अमेरिकी विरोधी भावनाएं लगातार बढ़ रही हैं। अमेरिका पाकिस्तानी सेना तथा उसकी खुफिया एजेंसी आइएसआइ पर अपना हाथ अभी भी रखे हुए-बावजूद इसके कि वे अपने आतंकी एजेंडे को छोड़ने के लिए तैयार नहीं। हालिया घटनाक्रम एक बार फिर यह याद दिला रहा है कि छोटे और आंतरिक रूप से कमजोर देशों में राजनीतिक उद्देश्यों की पूर्ति के लिए वाह्य कारक कितने महत्वपूर्ण होते हैं। अमेरिका के चोरी-छिपे समर्थन के साथ सऊदी अरब ने बहरीन में शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों को कुचलने के लिए अपनी सेनाएं भेजीं। दूसरी ओर गृहयुद्ध का शिकार लीबिया पश्चिमी सैन्य हमलों का निशाना बन गया। एक स्पष्ट तथ्य यह है कि दुनिया में जेहाद को बढ़ावा देने में जितना योगदान सऊदी अरब ने दिया है उतना किसी अन्य देश ने नहीं दिया, लेकिन बहरीन में उसके हस्तक्षेप पर पश्चिमी देश चुप्पी साधे हुए हैं। एक समय अफगानिस्तान में ऐसा ही हो चुका है जब सोवियत सेनाओं ने सबसे पहले वहां दखल दिया और बाद में सोवियत सेनाओं को पराजित करने के लिए अमेरिका ने अफगानिस्तान के बागियों को हथियार उपलब्ध कराए। सीआइए के इस काम ने अल कायदा सरीखे संगठन के उभरने के साथ वैश्विक स्तर पर आतंकवाद की शुरुआत कराई। आज जब अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआइए लीबिया में बागियों को मदद देने और गद्दाफी शासन का अंत करने के लिए गोपनीय अभियान चला रही है तब वाशिंगटन अपनी गलतियों का चक्र पूरा कर रहा है। साफ है, उसने अफगानिस्तान और इराक में अपनी अतीत की गलतियों से कोई सबक नहीं सीखा। इन देशों में फटाफट सैन्य जीत हासिल करने के अमेरिका के मंसूबे ध्वस्त हो गए। मानवीय स्वतंत्रता को बढ़ावा देने के नाम पर अमेरिका ने जो दोहरे मानदंड अपनाए हैं उनसे एक बार फिर यह संकेत जा रहा है कि किसी भी समाज में लोकतांत्रिक सशक्तीकरण तभी संभव है जब यह अमेरिका और अन्य पश्चिमी शक्तियों के राजनीतिक हित में हो। अमेरिका और अन्य पश्चिमी देशों का यह रवैया एक प्रकार से विश्व की सबसे बड़ी, पुरानी और सर्वाधिक शक्तिशाली तानाशाही चीन के हाथों में खेलना है, जो लंबे समय से पश्चिम पर यह आरोप लगाता रहा है कि लोकतंत्र को प्रोत्साहन पश्चिमी देशों का एक राजनीतिक उपकरण है। चीन यह देखकर खुश ही होगा कि अमेरिका अपनी अर्थव्यवस्था में गिरावट के बावजूद एक और युद्ध में उलझ रहा है। जाहिर है, अतीत में रूस की तरह चीन भी संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में लीबिया में हस्तक्षेप के प्रस्ताव को वीटो नहीं करेगा। मूल बात यह है कि क्या आप नियम आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था चाहते हैं या एक ऐसा तंत्र चाहते हैं जो किसी देश के राजनीतिक अथवा सैन्य हित पर आधारित हो। विश्व के लिए यह उचित नहीं हो सकता कि सबसे शक्तिशाली देश अपने संकीर्ण हितों की पूर्ति के लिए किसी देश में दखल दे। (लेखक सामरिक मामलों के विशेषज्ञ हैं).
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