Tuesday, April 5, 2011

विवादों से घिरी विदाई


एक समय देश का नाम रोशन करने वाले मोहम्मद यूनुस की पिछले महीने हुई बर्खास्तगी से बांग्लादेश को शर्मसार होना पड़ा है। यूनुस ने आज से लगभग तीन दशक पूर्व बांग्लादेश में ग्रामीण बैंक की स्थापना की थी। मोहम्मद यूनुस को वर्ष 2006 में नोबेल पुरस्कार मिलने पर पूरी दुनिया में इस उपलब्धि की चर्चा रही। यूनुस को हटाने के पीछे उनके उम्र को मुख्य कारण बताया जा रहा है। ग्रामीण बैंक के अनुसार 60 साल की उम्र पार करने के बाद भी 70 साल के यूनुस बैंक के प्रबंध निदेशक के रूप में बने हुए थे। दस साल पूर्व इनके कार्यकाल को बढ़ा दिया गया था। इस बर्खास्तगी का कारण यूनुस द्वारा बांग्लादेशी सरकार की आलोचना करने को भी बताया जा रहा है। ग्रामीण बैंक में 25 फीसदी हिस्सेदारी रखने वाली सरकार ने उनकी उम्र का हवाला देते हुए उन्हें बर्खास्त कर दिया। अदालत ने भी बर्खास्तगी के इस फैसले को सही ठहराया है। इसके अलावा एक अन्य विवाद यह भी जुड़ा कि यूनुस का बैंक लोगों से ऊंची ब्याज दर वसूलता है। ग्रामीण बैंक लोगों से 24 से 36 फीसदी तक ब्याज लेता था। इतनी ऊंची दर पर ब्याज वसूलने की खबर लोगों तक नहीं पहुंच पाने का कारण विश्व स्तर मिली ख्याति एवं मीडिया द्वारा बैंक का पक्ष लिया जाना रहा था। हालांकि उन पर बैंक के जरिए करोड़ों डॉलर की हेराफेरी करने का आरोप लग चुका है। वहीं पड़ोसी मुल्क भारत में निजी संस्थाओं द्वारा वसूले जाने वाला ब्याज दर ग्रामीण बैंक की तुलना में काफी कम है। बैंकर व अर्थशास्त्री यूनुस ने तीन दशक पूर्व गरीबों के कल्याण के लिए इस बैंक की स्थापना की थी लेकिन सरकार के साथ मतभेद के कारण उन्हें ग्रामीण बैंक के मुख्य पद से हाथ धोना पड़ा। राजनीति में आने के मकसद से वर्ष 2007 में यूनुस ने एक राजनीतिक पार्टी के गठन की घोषणा की थी लेकिन इससे प्रधानमंत्री शेख हसीना के साथ रिश्तों में खटास आ गई। यूनुस के समर्थकों का मानना है कि राजनीति में आने के प्रयासों के कारण ही उन्हें इस तरह से हटाया गया है। पिछले साल नवंबर में यूनुस और सरकार के बीच रिश्तों में उस समय काफी तल्खी आ गई थी जब नार्वे सरकार की आर्थिक मदद से बने एक वृत्तचित्र में यूनुस पर सहायता राशि में हेरफेर का गंभीर आरोप लगाया था। हालांकि बाद में ओस्लो ने इस विवाद को सुलझा लिया। लेकिन बांग्लादेशी सरकार ने इस पर जांच समिति बैठा दी। दिसंबर में हसीना ने बैंक को खून चूसने वाला बताया। सरकार के विरोध के बाद वंडरविल्ट विश्वविद्यालय से अर्थशास्त्र में पीएचडी करने वाले यूनुस बैंक की स्वायत्तता बचाए रखने के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बचाव अभियान शुरू कर सरकार पर दबाव बनाने लगे। लेकिन आखिरकार उन्हें जाना ही पड़ा। 1983 में स्थापित इस बैंक ने अब तक आठ करोड़ से ज्यादा लोगों को ऋण दिया है। बैंक हर साल लगभग एक अरब डॉलर का लोन देता है। बैंकिंग क्षेत्र में मिली अपार सफलता के बाद ग्रामीण बैंक ने दूसरे कई सेक्टरों में भी हाथ आजमाए। ग्रामीण ट्रस्ट, ग्रामीण फंड, ग्रामीण शक्ति, ग्रामीण टेलीकॉम, ग्रामीण शिक्षा और ग्रामीण फोन के अलावा और क्षेत्रों में सफलतापूर्वक प्रवेश किया। ग्रामीण फोन 2.7 करोड़ ग्राहकों के साथ देश की सबसे बड़ी फोन कंपनी है। खैर, गरीबों के लिए पूंजी की जरूरत बन चुके इस बैंक के साथ विवाद का जुड़ना इस महान प्रयास को धक्का लगने जैसा है। सफलताओं के आगे बैंक अति महत्वाकांक्षी हो गया और उसके साथ एक के बाद विवाद लगातार जुड़ने लगे। बैंक सफलता की मद में इस तरह से चूर हो गया कि उसे होश ही नहीं रहा कि उसे भी अन्य संस्थाओं की तरह कायदे-कानून से चलना चाहिए। बांग्लादेश बैंक की इस बैंक में 25 फीसदी हिस्सेदारी है। यूनुस की विदाई के बाद संभव है कि सरकार इसे अपने नियंत्रण में ले ले लेकिन उसे चाहिए कि बैंक की स्वायत्तता बनी रहे जिससे इससे जुड़े लोगों को नुकसान न उठाना पड़े। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)

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