Monday, April 25, 2011

परवेज कयानी से बात करने में परहेज क्यों










तालिबान नेताओं ने अबतक न तो जरदारी की बात मानी और न गिलानी की, इसलिए अब अमेरिका इसमें परवेज कयानी की सहायता चाहता है। इसलिए अगर भारतीय प्रधानमंत्री ने पाक सेना के चीफ ऑफ आर्मी स्टॉफ परवेज कयानी से बातचीत का तार जोड़ रखा है, इससे परेशानी क्या है? ..
तालिबान नेताओं ने अबतक न तो जरदारी की बात मानी और न गिलानी की, इसलिए अब अमेरिका इसमें परवेज कयानी की सहायता चाहता है। इसलिए अगर भारतीय प्रधानमंत्री ने पाक सेना के चीफ ऑफ आर्मी स्टॉफ परवेज कयानी से बातचीत का तार जोड़ रखा है, इससे परेशानी क्या है? ..ब भारत-पाकिस्तान कूटनीतिक संबंधों में एक नए खुलासे से हलचल है। रविवार को यह खुलासा भारतीय अखबारों के पहले पन्ने पर है। एक ब्रिटिश अखबार के खुलासे के हवाले से बताया गया है कि मोहाली में यूसुफ रजा गिलानी के साथ शुरू हुई क्रिकेट डिप्लोमेसी से कई महीने पहले ही प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के एक दूत ने पाकिस्तानी सेना चीफ परवेज कयानी से बातचीत की थी। इस खुलासे को लेकर जोरदार हायतौबा मचाई गई है। जबकि पूछा जा सकता है कि इस खुलासे में असाधारण क्या है- आखिर इस खुलासे में नया क्या है? जब कई भारतीय दूत तालिबान से अपने आगामी संबंधों को लेकर बातचीत कर रहे हैं तो परवेज कयानी से ही बातचीत में कौन-सा अपराध हो गया? जिस परवेज कयानी से बातचीत को इतना बड़ा मसला बनाया गया है, वह दरअसल कोई नई चीज नहीं है। परवेज कयानी पाकिस्तान के सेना प्रमुख हैं और अगर पाकिस्तान के राजनीतिक इतिहास को उठाकर देखा जाए तो कुल 60 साल में 40 साल सेना ही प्रत्यक्ष या परोक्ष तौर पर शासन चलाती रही है। वहां की विदेश नीति तो क्या, गृह नीति से लेकर आम नगर निगम की नीति भी सेना ही चलाती है। किसी भी चुनी हुई सरकार की हिम्मत नहीं है कि वह विदेश नीति के संबंध में सेना की मर्जी के बिना बातचीत कर ले। जो सरकार वहां सेना की मर्जी के बिना चलेगी, उसका हाल वही होगा जो जुल्फिकार अली भुट्टो और नवाज शरीफ का कभी हुआ था। 

अयूब खान ने कैसे तत्कालीन पाक सरकार का तख्ता पलट किया था, यह सारी दुनिया जानती है। जुल्फिकार अली भुट्टो को कैसे फांसी पर लटकाया गया, सबको पता है। नवाज शरीफ को कैसे अटक के किले में परवेज मुशर्रफ ने कैद किया, यह भी सारी दुनिया ने देखा था। और, बेनजीर भुट्टो को कैसे मौत के मुंह में पहुंचाया गया, उसे सारी दुनिया जानती है। हां, यह बात दीगर है कि परवेज कयानी ज्यादा सामने नहीं आते, लेकिन इसका मतलब यह भी नहीं कि उनकी ताकत कम हो गई है। आर्मी चीफ कयानी की ताकत अभी भी उतनी है, जितनी जिया उल हक की थी या जितनी परवेज मुशर्रफ की थी। पाकिस्तानी राजनीति में सक्रिय आसिफ अली जरदारी, यूसुफ रजा गिलानी और नवाज शरीफ तीनों ही कयानी के सामने दंडवत हैं। इनके दूत हर हफ्ते सेना से निर्देश लेने कयानी के पास पहुंचते हैं। कयानी की ताकत का पता उसी समय पूरी दुनिया को चल गया था, जब उन्हें 2013 तक एक्टेंशन खुद राष्ट्रपति जरदारी ने दी। उसके बाद कयानी के दबाव में आईएसआई चीफ शुजा पाशा को भी एक्टेंशन दे दिया गया।

जहां तक हमारे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की बात है तो उनकी हार्दिक इच्छा है कि पाकिस्तान से संबंध सुधरें। पता नहीं, इसमें वे कितने सफल होंगे। न तो वे इंदिरा गांधी की तरह ताकवतर हैं और न जवाहर लाल नेहरू की तरह बुद्धिमान हैं। फिर भी वे पाकिस्तान से किसी भी कीमत पर संबंध सुधारना चाहते हैं। हो सकता है, कहीं न कहीं उनके मन में भावनात्मक स्तर पर पाकिस्तान के चकवाल जिला स्थित अपने अतीत के पुश्तैनी गांव की याद भी बरकरार हो। अब यह अलग बात है कि उनके चकवाल-कनेक्शन को पाकिस्तानी सेना कितना समझती और सम्मान करती है, यह तो समय बताएगा। हालांकि मनमोहन सिंह के चकवाल और रावलपिंडी स्थित सेना हेडक्वार्टर में बहुत ज्यादा दूरी नहीं है। कयानी से मनमोहन सिंह ने जो बातचीत की है, वह व्यवहारिक है। अगर पाकिस्तान से संबंध सुधारने हैं तो कयानी से ही बातचीत करने का फायदा भी है। लोगों को यह याद है कि भारतीय विदेश मंत्री एसएम कृष्णा और तत्कालीन पाकिस्तानी विदेश मंत्री शाह महमूद कुरेशी के बीच जब पिछले साल जुलाई में इस्लामाबाद में बातचीत हो रही थी तो कुरैशी किस तरह कयानी से बार-बार फोन पर निर्देश ले रहे थे। आजादी के 60 साल बाद भी दोनों मुल्कों में संबंध नहीं सुधरे हैं- न पाकिस्तान ने माना, न भारत ने। अब अगर मनमोहन सिंह ईमानदारी से प्रयास कर रहे हैं और उसमें हर तरह के चैनल का अगर इस्तेमाल करते हैं तो इसमें खिंचाई करने के बजाय उनको अवसर दिए जाने में हर्ज क्या है। आखिर उन्हें हतोत्साहित क्यों किया जाए। 

भारतीय हुक्मरान अच्छी तरह जानते हैं कि जरदारी और गिलानी बेहद दबाव में हैं, क्योंकि नवाज शरीफ बार-बार जाकर कयानी को कुछ न कुछ ऑफर देते रहते हैं। नवाज शरीफ के इन कदमों से जरदारी और गिलानी डरे हुए हैं। शरीफ समय-समय पर जल्द से जल्द चुनाव के लिए भी कयानी से बात करते हैं। हालांकि कयानी फिलहाल राजनीतिक दलों की आपसी लड़ाई को अपने फायदे में इस्तेमाल करने के इच्छुक नहीं हैं, क्योंकि शांत स्वभाव वाले कयानी आगे न आकर पीछे से ही सरकार चलाने के पक्ष में हैं। परवेज मुशर्रफ के समय चीफ जस्टिस इफ्तिखार चौधरी द्वारा चलाए गए अभियान के बाद मुशर्रफ का हd कयानी देख चुके हैं- उन्हें सत्ता भी गंवानी पड़ी और भागकर लंदन में शरण लेनी पड़ी। कयानी इसीलिए सिविल सोसायटी या कट्टरपंथियों से सीधे टकराव के बजाय परदे के पीछे से ही सरकार चलाने में दिलचस्पी ले रहे हैं। 

अब सवाल है कि कयानी से बातचीत कितना बड़ा अपराध है? किसी फौजी अधिकारी से जो किसी देश के सत्ता तंत्र पर नियंत्रण रखता है, क्या बातचीत अपराध है? जब आप पहले भी फौजी अधिकारियों से बातचीत करते रहे हैं तो आज बातचीत कैसे अपराध हो जाएगी। विदेश नीति में यह कहीं नहीं है कि चुनी हुई सरकार से ही बातचीत होगी। अगर पाकिस्तान की नियति ही सेना है तो आखिर क्या कर सकते हैं। 


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