विकिलीक्स के खुलासे पर लेखक की टिप्पणी
पिछले दिनों विकिलीक्स के खुलासों से यह स्पष्ट हो गया भारतीय राजनेता अमेरिका के पिछलग्गू हैं। एक तरह से नेताओं ने देश को अमेरिका के पास गिरवी ही रख दिया है। हमारे देश की त्रासदी यह है कि सत्तारूढ़ दल के साथ-साथ विपक्ष के नेता भी अमेरिका के पिछलग्गू हैं। इसलिए जब संसद में परमाणु समझौते का विरोध करने की नौबत आई थी, तब भाजपा के दिग्गज नेता अमेरिका के राजदूत के सामने नतमस्तक होकर कह रहे थे कि हम तो परमाणु समझौते के पक्ष में हैं। केवल राजनीतिक कारणों से ही इसका विरोध कर रहे हैं। इन खुलासों से लगता है कि राजनेताओं ने देश की सार्वभौमिकता, संप्रभुता और स्वायत्तता को पूरी तरह से अमेरिका एवं उसकी बहुराष्ट्रीय कंपनियों के हाथों बेच दिया है। विकिलीक्स ने दावा किया है कि परमाणु समझौते के मुद्दे पर संसद में विश्वासमत प्राप्त करने के लिए मनमोहन सरकार ने छह सांसदों को दस-दस करोड़ रुपये दिए थे। भारतीय राजनेता इतने अमेरिकीपरस्त हैं कि मंत्रिमंडल में किस नेता को कौन-सा पद दिया जाए, यह दिल्ली में नहीं, बल्कि वाशिंगटन में तय होता है। इस बात का खुलासा हुआ है कि संप्रग-1 कार्यकाल में प्रारंभ में पेट्रोलियम मंत्रालय मणिशंकर अय्यर को दिया गया था। मणिशंकर अय्यर की छाप एक ईमानदार नेता की है, इसलिए माना जाता था कि वह अमेरिका के समर्थन में देश हित की बलि नहीं चढ़ाएंगे। इसी को ध्यान में रखते हुए उन्होंने ईरान के साथ गैस पाइपलाइन की चर्चा आगे बढ़ाई थी। किंतु अमेरिका नहीं चाहता था कि भारत और ईरान के बीच पाइपलाइन समझौता हो, इसीलिए मुरली देवड़ा को इस मंत्रालय का प्रभार सौंपा गया। भारतीय संसद पर हमला करने वाले अफजल गुरु को अभी तक आखिर फांसी क्यों नहीं दी गई? इस सवाल का जवाब हर कोई जानना चाहता है। विकिलिक्स ने यह रहस्योद्घाटन किया है कि अफजल गुरु की दया याचिका तत्कालीन राष्ट्रपति अब्दुल कलाम के पास आई होती, तो वह अफजल गुरु को तुरंत फांसी पर चढ़ाने की वकालत करते। जब सरकार को इस बात का पता चला, तो अफजल की दया याचिका राष्ट्रपति तक पहुंचने ही नहीं दी। कांगे्रस अच्छी तरह जानती थी कि यदि अफजल को फांसी दी जाती है तो उत्तर प्रदेश के चुनाव में कांगे्रस का सूपड़ा ही साफ हो जाता। अन्य राज्यों में भी उसे मुंह की खानी पड़ती। मुस्लिम वोट की राजनीति के कारण ही अफजल अभी तक बचा हुआ है। भारत सरकार अब्दुल कलाम से अधिक अफजल गुरु को महत्व देती है। इससे इस सरकार से कैसे अपेक्षा की जा सकती है कि वह आतंकवाद के खिलाफ कड़े कदम उठाएगी? पाकिस्तान द्वारा भेजे गए आतंकवादियों ने जिस तरह से मुंबई को घंटों तक बंधक बनाए रखा और सैकड़ों लोगों की जान ली, तब भारतीय जनता यह चाहती थी कि पाकिस्तान को ऐसा सबक दिया जाए, जिसे वह जिंदगीभर न भूले। उस समय भारत के सुरक्षा सलाहकार केरल के एम.के. नारायणन थे। नारायणन अपने कट्टर पाकिस्तान विरोधी रवैये के लिए जाने जाते हैं। वह सोनिया गांधी के भी काफी करीब हैं, इसलिए राजनीतिक रूप से काफी शक्तिशाली थे। किंतु भारत सीमा पर पाक सैनिकों की संख्या कम करके उन्हें अफगानिस्तान सीमा पर तैनात करने के अपने स्वार्थ के कारण अमेरिका नहीं चाहता था कि भारत पाकिस्तान के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करे। अमेरिका के इशारे पर नारायणन को सलाहकार पद से हटा दिया गया। विकिलीक्स के माध्यम से यह सच्चाई सामने आ गई है कि हमारे नेताओं ने देश के हितों को ताक पर रखकर अमेरिका को लाभ पहुंचाया है। अपने निहित स्वार्थ के कारण हमारे देश के नेता अमेरिका की गुलामी सहने को तैयार हो गए हैं। आज एक बार फिर एक नए स्वतंत्रता आंदोलन की जरूरत है ताकि देश स्वार्थी नेताओं के चंगुल से छूट जाए। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)
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