इधर कुछ ऐसे समाचार सुर्खियों में हैं जिनसे आभास होता है कि अमेरिका और पाकिस्तान के बीच मन-मुटाव बढ़ रहा है। पाकिस्तानी सेनानायक जनरल कयानी को उनके अमेरिकी आकाओं ने काफी खरी- खोटी सुनाई और यह बात साफ करने में कोई कसर नहीं छोड़ी कि उनकी नजर में आईएसआई और पाकिस्तानी फौज का एक तबका आतंकवादी तालिबान का साथ दे रहा है और इसी मदद के कारण तालिबान पर काबू पाना असंभव हो रहा है। कुछ विश्लेषकों ने इस बात पर संतोष प्रकट किया है कि पाकिस्तानी जनरल तिलमिलाए तो बहुत और खिसियाए भी काफी, पर अपनी सफाई में कुछ कह नहीं पाए। इसके साथ ही मुंबई पर हुए दहशतगर्द हमले के दौरान जिस फौजी अफसर मेजर इकबाल का नाम सामने आया था, उसके बारे में भी अमेरिकी जांच के बाद अब किसी शक-शुबहे की गुंजाइश नहीं रही। पर इस नतीजे तक पहुंचने की उतावली नहीं करनी चाहिए कि इस प्रकरण के बाद अमेरिका और पाकिस्तान के संबंधों में दरार आना तो दूर की बात है, थोड़ी सी खटास भी बढ़ेगी। हमारी समझ में यह सब एक नूराकुश्ती का हिस्सा है जिसका फायदा ओबामा की सरकार राजनयिक मंच पर अन्यत्र और स्वदेशी राजनीति में उठाना चाहती है। ओबामा की पहचान सिर्फ अश्वेत राष्ट्रपति के रूप में नहीं है बल्कि उनके नाम से जाहिर होने वाली इस्लामी विरासत से भी है। ओबामा स्वयं सायास यह प्रमाणित करने की चेष्टा करते रहे हैं कि उनकी परवरिश एक ईसाई के रूप में ही हुई है और वह जन्मजात अमेरिकी हैं। यह दोनों बातें आज तक निर्विवाद रूप से सर्वसम्मत नहीं समझी जा सकतीं। आरंभ से ही ओबामा के बारे में उग्र दक्षिणपंथी अमेरिकी यह आशंका पाले हुए हैं कि इस्लामी जगत की तरफ उनका रवैया कुछ नर्म हो सकता है। भले ही कभी-कभी यह बात 'अच्छे' तालिबान के साथ संवाद शुरू करने की जरूरत को रेखांकित करके की जाती है तो कभी पाकिस्तान सरकार को स्वयं आतंकवाद का शिकार बताकर उसके साथ सहानुभूति दर्शाने को प्राथमिकता देकर। तर्क चाहे कुछ भी हो, दबाव भारत जैसे देशों पर ही बढ़ता है जो बरसों से पाकिस्तानी फौज और गुप्तचर संस्था की साजिश के शिकार रहे हैं और जिनके लिए यह समझ पाना असंभव हो गया है कि पाकिस्तान के साथ कैसा सलूक किया जाए- गरम या नरम? यही कारण है कि जब क्रिकेट डिप्लोमेसी के जरिए मोहाली में मनमोहन सिंह ने पाकिस्तान के साथ संबंधों के सामान्यीकरण की कोशिश की तो उन्होंने स्वत:स्फूर्त दिमाग अचानक विचार के रूप में पेश किया। जब कुछ खोजी पत्रकारों ने खुलासा किया कि इस पहल की जमीन तैयार करने के लिए उन्होंने जनरल कयानी से गुप्त संदेशों का आदान-प्रदान किया था तो उन्हें तत्काल सफाई देनी पड़ी कि उन्होंने ऐसा कुछ नहीं किया था। लब्बो लुआब यह है कि अमेरिका जब जी चाहे, उसके साथ अपने हितों की रक्षा के लिए बातचीत कर सकता है। चाहे वह तालिबान हो या फौजी तानाशाह या डबल एजेंट हेडली जैसा गुप्तचर। पर भारत को यही सीख दी जाती है कि बिना उनकी रजामंदी या इशारे के कोई ऐसी पहल (गरम या नरम) न की जाए जो अमेरिकी के लिए नुकसानदेह हो। हाल में पूर्व प्रधानमंत्री इंद्रकुमार गुजराल के संस्मरण प्रकाशित हुए हैं जिनसे यह पता चलता है कि जब भी भारत पाकिस्तान से प्रायोजित दहशतगर्दी की शिकायत करता है तो अमेरिकी अधिकारी उसे पाकिस्तानी शिकायतों की फेहरिस्त थमा देते हैं जिसमें भारतीय खुफिया एजेंसियों का उल्लेख होता है। शर्म अल शेख में मनमोहन सिंह ने खुद अपने ऊपर गोल ठोंकने का करिश्मा कर दिखाया था और उसके बाद से भी राजनयिक 'ब्लंडरो' की कोई कमी नहीं रही। इसका सबसे बेहतरीन उदाहरण हिंदुत्ववादी आतंकवादियों को समझौता एक्सप्रेस के धमाके के लिए आरोपी बनाना रहा है। इस बात को भुलाना आसान नहीं कि अगर यह आरोप सच है तो फिर अभियुक्तों की उस सूची को कैसे कोई भी विश्वसनीय समझ सकता है जिसे 'पुख्ता' जांच-पड़ताल के बाद भारत सरकार ने पाकिस्तान को सौंपा था? यह तर्क असंगत नहीं कि पाकिस्तानी गुप्तचर संगठनों ने हिंदुत्ववादी संस्थाओं में भी घुसपैठ कर ली है और अब वह भारत को राजनयिक चक्रव्यूह में घेरने में सफल हुए हैं। जहां तक पाकिस्तान की अमेरिका से नाराजगी का सवाल है, उसके बारे में किसी भी तरह का भ्रम पालना नादानी ही कही जा सकती है। पाकिस्तानी सेना को इस बात का पूरा अहसास है कि बिना अमेरिका की मेहरबानी के उसका दबदबा बना नहीं रह सकता। पाकिस्तानी सेना एक परजीवी प्राणी है जिसे आधी सदी से ज्यादा समय से बिना कुछ करे-धरे भ्रष्टाचारी अय्याशी की लत पड़ चुकी है। पाकिस्तान अपने सैनिक इतिहास का चाहे जितने जोर- शोर से, रणक्षेत्र में अपने पराक्रम और जीतों का उल्लेख करे, हकीकत किसी से छिपी नहीं है। 1947-48 में कश्मीर पर हमला पूरी तरह सफल नहीं हो सका। 1965 में हालत इससे बदतर थी और 1971 में तो बर्बर वंशनाशक तेवर वाली पाकिस्तानी फौज को घुटने टेकने पड़े थे। करगिल में भी उन्हें मुंह की ही खानी पड़ी। यह हाल सिर्फ भारत के साथ मुठभेड़ों का ही नहीं। उत्तर-पश्चिमी सीमांत, वजीरिस्तान और बलूचिस्तान में भी कबाइली बागियों पर काबू पाने में पंजाबी पाकिस्तानी फौज बुरी तरह असफल रही है। भले ही कुछ फौजी तानाशाहों ने लंबे समय तक पाकिस्तान पर राज किया है पर देर-सवेर जनांदोलन या तख्तापलट ने इनका बोरिया-बिस्तर गोल कर दिया है। जनरल जिया के कार्यकाल में न केवल सेना का बल्कि पाकिस्तानी समाज का तेजी से कट्टरपंथी इस्लामीकरण हुआ और इस अभियान में अमेरिकियों ने खुशी-खुशी हाथ बटाया। सऊदी अरब से जिस दकियानूसी आक्रामक वहाबी इस्लाम का निर्यात किया जा रहा था, उसका खर्च सऊदी अरब उठा रहा था और तब अमेरिकियों को यह लगता था कि अफगानिस्तान से साम्यवादी रूसियों को उखाड़ने-खदेड़ने के लिए इस्लामी शमसीर बहुत काम आएगी। उन्हें तब यह इल्म नहीं था कि यह भस्मासुर कितनी जल्द खुद उनकी जान का बबाल बन जाएगा!
इसी दौर में पाकिस्तान ने एटमी बम का निर्माण किया और भारत को असंतुलित रखने के मकसद से कुछ अमेरिकी अपनी आंखे पाकिस्तानी वैज्ञानिक ए क्यू खान की परमाणविक तस्करी से मूंदे रहे। यह सोचना बचपना है कि अफ-पाक रणक्षेत्र को एक मानने वाले आज यकायक पाकिस्तान की सामरिक संवेदनशीलता को नकार रहे हैं। अंत में यह बात याद रखने की जरूरत है कि पाकिस्तान की संप्रभुता का उल्लंघन अमेरिकी गुप्तचर स्वयं लगातार करते रहे हैं और अफ-पाक सरहद पर अमेरिकी हमलों ने कई बार पाकिस्तानी सीमा का अतिक्रमण किया है जिनमें दर्जनों निरीह पाकिस्तानी नागरिक मारे गए हैं। खुद अपने सैनिकों को जवाबी वार में हताहत होने से बचाने के लिए अब अमेरिका ने चालक रहित ड्रोन विमानों का प्रयोग आरंभ कर दिया है। हमारा मानना है कि यह कपट चालें ऐसे ही चलती रहेंगी। भारत को सतर्क रहकर अपना हित साधना होगा।
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