Saturday, April 30, 2011

घुटने टेकने वाली नीति


चीन और पाकिस्तान के संदर्भ में भारत की विदेश नीति की कमजोरी पर हैरत जता रहे हैं लेखक
पिछले दिनों विदेश नीति के दो बार नतमस्तक होने से भारतीय सत्ता प्रतिष्ठान की कमजोरी उजागर हो गई है। चीन और पाकिस्तान के सामने सिर झुकाने से सवाल उठता है कि क्या भारत विज्ञापनों में प्रचारित अतुल्य भारत है या फिर वास्तव में एक जड़ भारत है, जो पिछली गलतियों से कोई सबक नहीं लेता। यहां तक कि उसे इस बात का भी अहसास नहीं है कि नीति निर्माण में व्यक्तिवादी रवैये का क्या खामियाजा उठाना पड़ता है। हर भारतीय प्रधानमंत्री के लिए चीन की यात्रा करना एक परंपरा सी बन गई है। यद्यपि मनमोहन सिंह चीन में ब्रिक्स की बैठक में गए थे, फिर भी वह चीनी राष्ट्रपति हू जिंताओ को उपहार देना नहीं भूले। उन्होंने द्विपक्षीय रक्षा विनिमय पर चीन के सामने समर्पण कर दिया। भारत ने रक्षा वार्ता को नत्थी वीजा मामले से अलग कर दिया और भारतीय रक्षा प्रतिनिधिमंडल का स्तर घटाते हुए चीन की चिंताओं को दूर कर दिया। स्मरण रहे कि भारत ने चीन की दो हरकतों की प्रतिक्रिया में उसके साथ रक्षा व्यापार पर रोक लगा दी थी। एक तो चीन ने भारत के नियंत्रण वाले जम्मू-कश्मीर पर भारत की संप्रभुता पर सवाल उठाते हुए इस क्षेत्र के निवासियों को नत्थी वीजा जारी करना शुरू कर दिया था और दूसरे, पिछली गर्मियों में सैन्य टीम का नेतृत्व करने वाले भारतीय सेना के उत्तरी कमान के प्रमुख को सामान्य वीजा देने से इनकार कर दिया था। भारत के खिलाफ पहले अरुणाचल प्रदेश और फिर कश्मीर कार्ड खेलने में चीन ने महज चार साल का समय लिया। यही नहीं, चीन ने भारत के साथ लगती हिमालय सीमा को भी 1,597 किलोमीटर छोटा कर दिया था। चीन ने अपनी सीमा रेखा से लगते जम्मू-कश्मीर के भूभाग को अलग कर दिया था। पाक नियंत्रित कश्मीर में चीन के बढ़ते दखल को देखते हुए अब भारत कश्मीर में दोनों तरफ से चीनी सेनाओं से घिर गया है। चीन-पाकिस्तान में गहराता बंधन असलियत में इनमें से किसी भी देश के साथ युद्ध की स्थिति में भारत के सामने दोहरे मोर्चे की चुनौती खोल देता है। मनमोहन सिंह की चीन यात्रा उत्तरी कमान के प्रमुख के इस सार्वजनिक बयान के बाद हुई कि पाक अधिकृत कश्मीर में चीनी सैनिकों के जमावड़े से चीनी सेना की मौजूदगी पाकिस्तान-भारत की नियंत्रण रेखा पर भी हो गई है। उन्होंने चिंता जताई कि अगर पाकिस्तान के साथ भारत की जंग छिड़ती है तो चीन की मौजूदगी से हालात जटिल हो जाएंगे। हालांकि मनमोहन सिंह ने सैन्य वार्ता की बहाली करके चीन के कश्मीर कार्ड की अनदेखी कर दी। बीजिंग ने नत्थी वीजा मामले पर भी कोई आश्वासन नहीं दिया। प्रधानमंत्री के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार ने कहा है कि इस मामले पर अभी चर्चा जारी है। यही नहीं, नई दिल्ली ने भारतीय सैन्य प्रतिनिधिमंडल पर चीन की संवेदनशीलता की परवाह करते हुए उत्तरी कमान प्रमुख को प्रतिनिधिमंडल से अलग करके इसके स्वरूप में भी परिवर्तन कर दिया है। अब भारत उत्तरी कमान के किसी अन्य अधिकारी के नेतृत्व में प्रतिनिधिमंडल भेजेगा। अगर भारत प्रतिनिधिमंडल के संयोजन और जम्मू-कश्मीर मामले पर चीन की संवेदनशीलता की इतनी ही परवाह करता है तो इसने पहले रक्षा संबंधो को स्थगित क्यों किया था? आखिर, महीनों पहले जब सैन्य संबंधों में गतिरोध आया था तबसे चीन ने अपनी कलाई का शिकंजा और मजबूत ही किया है। इस बीच उसने पाकिस्तान नियंत्रण वाले कश्मीर और नियंत्रण रेखा पर अपनी सैन्य उपस्थिति बढ़ाई है। क्या दूसरे देश की संवेदनशीलता का सम्मान करने का मतलब उसके समक्ष नतमस्तक हो जाना है? पाकिस्तान से आतंकवाद के खिलाफ वचनबद्धता के बिना ही द्विपक्षीय क्रिकेट संबंधों की बहाली भी भारतीय विदेश नीति के घुटने टेकने के समान है। वास्तव में, इसमें पाकिस्तान की जीत है। मुंबई आतंकी हमलों में पाकिस्तानी षड्यंत्रकर्ताओं का बाल भी बांका नहीं हुआ है। साथ ही भारतीय सीमा के पास आतंकी प्रशिक्षण केंद्र अभी भी बदस्तूर आतंकियों की पौध तैयार कर रहे हैं। फिर भी, भारत ने क्रिकेट संबंध और राजनीतिक वार्ता बहाल करके अपनी कमजोरी जाहिर की है। राजनीतिक संबंधों की बहाली में क्रिकेट का इस्तेमाल 26/11 के आतंकी हमले के स्मरण का मखौल उड़ाता है। 1980 के दशक में जबसे पाकिस्तान ने भारत के खिलाफ छद्म युद्ध शुरू किया है, भारत ने पाकिस्तान को खुश करने के लिए तीन बार क्रिकेट कूटनीति का सहारा लिया है, जिसमें से दो बार इसका श्रेय मनमोहन सिंह को जाता है। हैरत की बात है कि आतंक का शिकार ही क्रिकेट कूटनीति के माध्यम से खुशामद कर रहा है, जबकि आतंकवाद का प्रायोजक अपने रुख में कोई बदलाव लाने को तैयार नहीं है। खुद शिकार अपने जख्मों पर नमक छिड़क रहा है। विचित्र बात है कि क्रिकेट संबंधों की बहाली का फैसला तहव्वुर हुसैन राणा के इस खुलासे के तुरंत बाद किया गया है कि 26/11 के मुंबई आतंकी हमले की साजिश उसने पाकिस्तानी सरकारी एजेंसियों के कहने पर बनाई थी। मुंबई आतंकी हमले में पाकिस्तानी सरकार का नियोजन, सहायता और क्रियान्वयन स्पष्ट है। भारतीय नीति निर्माताओं के नरम रुख के कारण इसके अपराधियों के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं हो रही है। मुंबई हमले के जवाब में भारत ने एक नायाब और नए हथियार का इस्तेमाल किया है-साक्ष्यों के पुलिंदे की बमबारी। नियमित अंतराल पर साक्ष्यों के भारी-भरकम पुलिंदे भेजे जा रहे हैं। इससे पाकिस्तान की स्थिति मजबूत और भारत की कमजोर हो रही है। पाकिस्तान के साथ संबंध एक निश्चित दायरे में घूम रहे हैं। आतंकी हमला, वार्ता स्थगित करना, कुछ अंतराल के बाद फिर से वार्ता शुरू करना, फिर आतंकी हमला..लंबे समय से यही सिलसिला चल रहा है। पाकिस्तान के संदर्भ में नीति बदलने में सबसे तेजी अटल बिहारी वाजपेयी ने दिखाई। पाकिस्तान को खुश करने के लिए वह घुटनों के बल झुक गए और बदले में पाकिस्तान ने उन्हें ठोकर मार दी। यही नहीं, 2003 के बीजिंग दौरे पर वाजपेयी ने तिब्बत को लेकर भारत की रही-सही लाभ की स्थिति भी गंवा दी थी। अब यह स्पष्ट है कि भारत भ्रष्टाचार की भारी कीमत चुका रहा है। इसके कारण राष्ट्र कमजोर पड़ रहा है, संस्थान खोखले हो रहे हैं और इस सबसे ऊपर हमारी राष्ट्रीय सुरक्षा खतरे में पड़ रही है। पड़ोसियों के साथ मधुर संबंध कायम रखना एक बात है और खुद को कमजोर, ढुलमुल, अस्थिर राष्ट्र के रूप में पेश करके दबाव में आना बिल्कुल दूसरी बात। इससे दूसरे राष्ट्रों को लगता है कि भारत अपने सिद्धांतों, लक्ष्यों और यहां तक कि राष्ट्रीय आत्मसम्मान की रक्षा करने में भी असमर्थ है। (लेखक सामरिक मामलों के विशेषज्ञ हैं).

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