पिछले दिनों एक संसदीय प्रतिनिधि के नेता के रूप में मैं चीन गया था। मेरे साथ राज्यसभा के सदस्य तरुण विजय और लोकसभा के सदस्य कांग्रेस के जी. विवेकानंद, हमदुल्ला सैयद तथा भाजपा के शिवकुमार उदासी गए थे। यह प्रतिनिधिमंडल चीन की कम्युनिस्ट पार्टी की केंद्रीय समिति के अंतरराष्ट्रीय विभाग के निमंत्रण पर चीन गया था। भारतीय चैंबर्स ऑफ कामर्स के सांसद समन्वय सेल ने इसके संयोजन में सहयोग किया था। यह मेरी चीन की पहली यात्रा थी। हमारा दल चीन की राजधानी बीजिंग और दो महत्वपूर्ण आर्थिक केंद्र शंघाई और सेंझन गया। यात्रा के दौरान शासन, कम्युनिस्ट पार्टी और पीपुल्स कांग्रेस के पदाधिकारियों, थिंक टैंक व शंघाई और सेंझन के म्युनिसिपल नेताओं से चर्चा करने के बाद एक बात स्पष्ट लगी-आज का चीन माओ त्से तंुग का चीन नहीं है, बल्कि देंग जियाओ पेंग का चीन है, जिन्होंने आर्थिक सुधारों की शुरुआत की थी। 60 से 70 के दशक में माओ के नेतृत्व में सांस्कृतिक क्रांति हुई थी। उस समय दबाव में देंग जियाओ पेंग को हाशिए पर डाल दिया गया था, क्योंकि माओ के समर्थकों के अनुसार वे कैपिटलिस्ट रोडर थे। माओ की मौत के बाद उन्होंने अपनी पूरी पकड़ बनाई और यह साफ घोषित किया कि हमें आर्थिक विकास करना है और इसके लिए पूंजी चाहिए जो कहीं से भी आ सकती है। सच्चाई यह है कि आज माओ और पारंपरिक कम्युनिस्ट विचारधारा, दोनों हाशिए पर हैं। चीन की मुद्रा पर माओ की तस्वीर जरूर छपी है। बीजिंग के थियेन मन चौक, जहां 1989 में हजारों लोकतांत्रिक समर्थक पुलिस और सेना की गोलियों से मारे गए, पर भी उनकी बहुत बड़ी तस्वीर टंगी है और वहीं उनका शव एक स्मृति स्थल पर संरक्षित रखा गया है। चीन में कम्युनिस्ट पार्टी का शासन है और लोकतंत्र का कोई स्थान नहीं है, लेकिन पारंपरिक साम्यवाद सिद्धांत शासन में दिखाई नहीं पड़ता। माओ की चर्चा कम ही होती है। चीन का कोई भी बड़ा या छोटा नेता अब माओ का कोट नहीं पहनता, सभी सूट और टाई में ही मिलते हैं। आज के चीन की कहानी 1978 के आर्थिक सुधारों से आरंभ होती है। चीन का आर्थिक विकास कई मामलों में प्रभावी और चौंकाने वाला भी है। सड़कें, बिजली, ढांचागत सुविधाएं अंतरराष्ट्रीय व्यापार, उद्योग एवं निर्माण, प्रमुख शहरों के विकास आदि में उन्होंने उल्लेखनीय प्रगति की है। व्यापार की पूरी छूट है, परंतु कुछ परोक्ष नियंत्रण के साथ। शंघाई चीन का प्रमुख व्यापारिक केंद्र है। वहां 60,000 विदेशी कंपनियां कार्यरत हैं। इनमें भारत की कुछ कंपनियां भी हैं। चीन के संबंध दक्षिण कोरिया के साथ काफी तनाव भरे हैं, क्योंकि चीन उत्तर कोरिया का समर्थक है, फिर भी बड़ी संख्या में दक्षिण कोरियाई कंपनियां वहां व्यापार करती हैं। यही हाल ताइवान की कंपनियों का भी है, जिस देश को चीन स्वीकार ही नहीं करता। व्यापार और विदेशी मुद्रा के लिए चीन ने अपने पूरे दरवाजे खोल रखे हैं। चीन कंप्यूटर के हार्डवेयर में बहुत समृद्ध है, लेकिन सॉफ्टवेयर में कमजोर है। चीनियों को इस बात का अहसास है इसीलिए आने वाले वर्षो में सॉफ्टवेयर के शोध पर अधिक ध्यान देने का निर्णय किया है। गांवों में तुलनात्मक रूप से विकास कम है। भविष्य की योजनाओं में चीन के 60 प्रतिशत से अधिक क्षेत्र को शहरों में बदलने का प्रस्ताव है। लोकतांत्रिक क्रांतियों पर उनका कटाक्ष रहता है कि हमारे यहां जैसमीन क्रांति नहीं होती, सिर्फ जैसमीन चाय मिलती है। चीन की राजनीति का एक उल्लेखनीय पक्ष यह है कि साम्यवादी क्रांति होने के बावजूद उन्होंने अपने अतीत का अनादर कभी नहीं किया। राष्ट्रीयता का भाव और दुनिया की एक बड़ी ताकत होने का संकल्प उनके अंदर कूट-कूट कर भरा है। हजारों वर्षो तक चीन में विभिन्न राजवंशों ने राज किया है जिनमें हान, थंग, क्विंग आदि प्रमुख हैं। उनका योगदान विशेष रूप से चीन की राष्ट्रीय अस्मिता और चीनी भाषा की लिपि, जो पूरे देश में एक है-के निर्माण में उल्लेखनीय है। यह भारत की कम्युनिस्ट पार्टियों के लिए बहुत बड़ी नसीहत है, जो भारत के गौरवशाली अतीत की चर्चा मात्र से नाक-भौं सिकोड़ने लगते हैं। शायद यही कारण है कि भारत के कम्युनिस्ट भारत की मिट्टी से नहीं जुड़ सके और हाशिए पर चले गए। हमने चीनी नेताओं से साफ-साफ कहा कि हम चीन से अच्छे रिश्तों के पक्षधर हैं, लेकिन जब तक सीमा विवाद, कश्मीर के संबंध में अलग से वीजा देने की नीति, अरुणाचल प्रदेश को भारत का अभिन्न अंग मानना तथा पाकिस्तान से भारत के खिलाफ प्रायोजित आतंकवाद आदि विषयों पर स्पष्ट निर्णय नहीं होता, तब तक रिश्ते मजबूत नहीं बनेंगे। यह मानने के बावजूद भारत और चीन एशिया की दो बड़ी ताकत हैं, जो दुनिया को प्रभावित करेंगी। वे इस आशंका से बुरी तरह घबराते भी हैं कि अमेरिका के साथ मिलकर भारत चीन के खिलाफ घेराबंदी करेगा। संस्कृति और फिल्म के क्षेत्र में संबंधों को मजबूत करने की काफी गुंजाइश है। महात्मा बुद्ध, योग और कैलाश मानसरोवर इसके बड़े माध्यम हैं। आवारा फिल्म में राजकपूर के अभिनय की चर्चा अभी भी होती है। (लेखक पूर्व केंद्रीय मंत्री हैं).
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