Saturday, April 30, 2011
घुटने टेकने वाली नीति
चीन और पाकिस्तान के संदर्भ में भारत की विदेश नीति की कमजोरी पर हैरत जता रहे हैं लेखक
पिछले दिनों विदेश नीति के दो बार नतमस्तक होने से भारतीय सत्ता प्रतिष्ठान की कमजोरी उजागर हो गई है। चीन और पाकिस्तान के सामने सिर झुकाने से सवाल उठता है कि क्या भारत विज्ञापनों में प्रचारित अतुल्य भारत है या फिर वास्तव में एक जड़ भारत है, जो पिछली गलतियों से कोई सबक नहीं लेता। यहां तक कि उसे इस बात का भी अहसास नहीं है कि नीति निर्माण में व्यक्तिवादी रवैये का क्या खामियाजा उठाना पड़ता है। हर भारतीय प्रधानमंत्री के लिए चीन की यात्रा करना एक परंपरा सी बन गई है। यद्यपि मनमोहन सिंह चीन में ब्रिक्स की बैठक में गए थे, फिर भी वह चीनी राष्ट्रपति हू जिंताओ को उपहार देना नहीं भूले। उन्होंने द्विपक्षीय रक्षा विनिमय पर चीन के सामने समर्पण कर दिया। भारत ने रक्षा वार्ता को नत्थी वीजा मामले से अलग कर दिया और भारतीय रक्षा प्रतिनिधिमंडल का स्तर घटाते हुए चीन की चिंताओं को दूर कर दिया। स्मरण रहे कि भारत ने चीन की दो हरकतों की प्रतिक्रिया में उसके साथ रक्षा व्यापार पर रोक लगा दी थी। एक तो चीन ने भारत के नियंत्रण वाले जम्मू-कश्मीर पर भारत की संप्रभुता पर सवाल उठाते हुए इस क्षेत्र के निवासियों को नत्थी वीजा जारी करना शुरू कर दिया था और दूसरे, पिछली गर्मियों में सैन्य टीम का नेतृत्व करने वाले भारतीय सेना के उत्तरी कमान के प्रमुख को सामान्य वीजा देने से इनकार कर दिया था। भारत के खिलाफ पहले अरुणाचल प्रदेश और फिर कश्मीर कार्ड खेलने में चीन ने महज चार साल का समय लिया। यही नहीं, चीन ने भारत के साथ लगती हिमालय सीमा को भी 1,597 किलोमीटर छोटा कर दिया था। चीन ने अपनी सीमा रेखा से लगते जम्मू-कश्मीर के भूभाग को अलग कर दिया था। पाक नियंत्रित कश्मीर में चीन के बढ़ते दखल को देखते हुए अब भारत कश्मीर में दोनों तरफ से चीनी सेनाओं से घिर गया है। चीन-पाकिस्तान में गहराता बंधन असलियत में इनमें से किसी भी देश के साथ युद्ध की स्थिति में भारत के सामने दोहरे मोर्चे की चुनौती खोल देता है। मनमोहन सिंह की चीन यात्रा उत्तरी कमान के प्रमुख के इस सार्वजनिक बयान के बाद हुई कि पाक अधिकृत कश्मीर में चीनी सैनिकों के जमावड़े से चीनी सेना की मौजूदगी पाकिस्तान-भारत की नियंत्रण रेखा पर भी हो गई है। उन्होंने चिंता जताई कि अगर पाकिस्तान के साथ भारत की जंग छिड़ती है तो चीन की मौजूदगी से हालात जटिल हो जाएंगे। हालांकि मनमोहन सिंह ने सैन्य वार्ता की बहाली करके चीन के कश्मीर कार्ड की अनदेखी कर दी। बीजिंग ने नत्थी वीजा मामले पर भी कोई आश्वासन नहीं दिया। प्रधानमंत्री के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार ने कहा है कि इस मामले पर अभी चर्चा जारी है। यही नहीं, नई दिल्ली ने भारतीय सैन्य प्रतिनिधिमंडल पर चीन की संवेदनशीलता की परवाह करते हुए उत्तरी कमान प्रमुख को प्रतिनिधिमंडल से अलग करके इसके स्वरूप में भी परिवर्तन कर दिया है। अब भारत उत्तरी कमान के किसी अन्य अधिकारी के नेतृत्व में प्रतिनिधिमंडल भेजेगा। अगर भारत प्रतिनिधिमंडल के संयोजन और जम्मू-कश्मीर मामले पर चीन की संवेदनशीलता की इतनी ही परवाह करता है तो इसने पहले रक्षा संबंधो को स्थगित क्यों किया था? आखिर, महीनों पहले जब सैन्य संबंधों में गतिरोध आया था तबसे चीन ने अपनी कलाई का शिकंजा और मजबूत ही किया है। इस बीच उसने पाकिस्तान नियंत्रण वाले कश्मीर और नियंत्रण रेखा पर अपनी सैन्य उपस्थिति बढ़ाई है। क्या दूसरे देश की संवेदनशीलता का सम्मान करने का मतलब उसके समक्ष नतमस्तक हो जाना है? पाकिस्तान से आतंकवाद के खिलाफ वचनबद्धता के बिना ही द्विपक्षीय क्रिकेट संबंधों की बहाली भी भारतीय विदेश नीति के घुटने टेकने के समान है। वास्तव में, इसमें पाकिस्तान की जीत है। मुंबई आतंकी हमलों में पाकिस्तानी षड्यंत्रकर्ताओं का बाल भी बांका नहीं हुआ है। साथ ही भारतीय सीमा के पास आतंकी प्रशिक्षण केंद्र अभी भी बदस्तूर आतंकियों की पौध तैयार कर रहे हैं। फिर भी, भारत ने क्रिकेट संबंध और राजनीतिक वार्ता बहाल करके अपनी कमजोरी जाहिर की है। राजनीतिक संबंधों की बहाली में क्रिकेट का इस्तेमाल 26/11 के आतंकी हमले के स्मरण का मखौल उड़ाता है। 1980 के दशक में जबसे पाकिस्तान ने भारत के खिलाफ छद्म युद्ध शुरू किया है, भारत ने पाकिस्तान को खुश करने के लिए तीन बार क्रिकेट कूटनीति का सहारा लिया है, जिसमें से दो बार इसका श्रेय मनमोहन सिंह को जाता है। हैरत की बात है कि आतंक का शिकार ही क्रिकेट कूटनीति के माध्यम से खुशामद कर रहा है, जबकि आतंकवाद का प्रायोजक अपने रुख में कोई बदलाव लाने को तैयार नहीं है। खुद शिकार अपने जख्मों पर नमक छिड़क रहा है। विचित्र बात है कि क्रिकेट संबंधों की बहाली का फैसला तहव्वुर हुसैन राणा के इस खुलासे के तुरंत बाद किया गया है कि 26/11 के मुंबई आतंकी हमले की साजिश उसने पाकिस्तानी सरकारी एजेंसियों के कहने पर बनाई थी। मुंबई आतंकी हमले में पाकिस्तानी सरकार का नियोजन, सहायता और क्रियान्वयन स्पष्ट है। भारतीय नीति निर्माताओं के नरम रुख के कारण इसके अपराधियों के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं हो रही है। मुंबई हमले के जवाब में भारत ने एक नायाब और नए हथियार का इस्तेमाल किया है-साक्ष्यों के पुलिंदे की बमबारी। नियमित अंतराल पर साक्ष्यों के भारी-भरकम पुलिंदे भेजे जा रहे हैं। इससे पाकिस्तान की स्थिति मजबूत और भारत की कमजोर हो रही है। पाकिस्तान के साथ संबंध एक निश्चित दायरे में घूम रहे हैं। आतंकी हमला, वार्ता स्थगित करना, कुछ अंतराल के बाद फिर से वार्ता शुरू करना, फिर आतंकी हमला..लंबे समय से यही सिलसिला चल रहा है। पाकिस्तान के संदर्भ में नीति बदलने में सबसे तेजी अटल बिहारी वाजपेयी ने दिखाई। पाकिस्तान को खुश करने के लिए वह घुटनों के बल झुक गए और बदले में पाकिस्तान ने उन्हें ठोकर मार दी। यही नहीं, 2003 के बीजिंग दौरे पर वाजपेयी ने तिब्बत को लेकर भारत की रही-सही लाभ की स्थिति भी गंवा दी थी। अब यह स्पष्ट है कि भारत भ्रष्टाचार की भारी कीमत चुका रहा है। इसके कारण राष्ट्र कमजोर पड़ रहा है, संस्थान खोखले हो रहे हैं और इस सबसे ऊपर हमारी राष्ट्रीय सुरक्षा खतरे में पड़ रही है। पड़ोसियों के साथ मधुर संबंध कायम रखना एक बात है और खुद को कमजोर, ढुलमुल, अस्थिर राष्ट्र के रूप में पेश करके दबाव में आना बिल्कुल दूसरी बात। इससे दूसरे राष्ट्रों को लगता है कि भारत अपने सिद्धांतों, लक्ष्यों और यहां तक कि राष्ट्रीय आत्मसम्मान की रक्षा करने में भी असमर्थ है। (लेखक सामरिक मामलों के विशेषज्ञ हैं).
Friday, April 29, 2011
अमेरिका को भारी झटका, वतन लौट रहीं भारतीय प्रतिभाएं
अमेरिका में रह रहे भारतीय और चीनी मूल के प्रतिभाशाली लोग अब तेजी से स्वदेश वापसी कर रहे हैं। इससे इन दोनों देशों में 'उद्यमशीलता की लहर' चल पड़ी है। ड्यूक विश्वविद्यालय, कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय और हार्वर्ड विश्वविद्यालय के सहयोग से कॉफमैन फाउंडेशन द्वारा किए गए अध्ययन में पाया गया कि मौजूदा रुख से अमेरिका को एक 'बड़ा नुकसान'
होने जा रहा है। 'स्वदेश वापसी करने वाले उद्यमियों के लिए वास्तव में भारत और चीन में घास अधिक हरी है' शीर्षक से जारी रपट में कहा गया है कि किसी समय 'प्रतिभा पलायन'
से लाभ उठाने वाली अमेरिकी अर्थव्यवस्था के लिए यह उलटी गंगा बहने जैसा है। यह भारत और चीन के लिए दीर्घकाल में लाभप्रद होगा। यह रपट अमेरिका में ऐसे करीब 153 कुशल भारतीयों और 111 चीनी कामगारों के बीच कराए गए सव्रेक्षण पर आधारित है, जो स्वदेश वापसी कर चुके हैं। इनमें से करीब आधे लोगों ने कहा कि वे स्वदेश में अपनी कंपनी स्थापित करेंगे। अमेरिका से कितने कुशल कर्मचारी स्वदेश लौट चुके हैं, इस बारे में कोई ठोस आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं। हालांकि रपट के लेखकों में से एक, विवेक वाधवा ने अनुमान व्यक्त किया कि पिछले दो दशक में 1,50,000 लोग भारत और इतने ही लोग चीन वापस लौट चुके हैं। रपट के मुताबिक, 'पिछले पांच साल में इस रुख में जबर्दस्त तेजी आई है और अब हर साल लाखों लोग स्वदेश लौट रहे हैं। ज्यादातर अधिकारी भी इन अनुमानों से सहमति जता रहे हैं।' वाधवा ने कहा, 'उदाहरण के तौर पर चीन के शिक्षा मंत्रालय का अनुमान है कि विदेश में शिक्षा हासिल करने के बाद 2009 में स्वदेश लौटने वाले चीनी लोगों की तादाद 1,08,000 रही, जो इससे पिछले साल के मुकाबले 56.2 प्रतिशत अधिक है। 2010 में यह संख्या बढ़कर अब तक के सर्वोच्च स्तर 1,34,800 पर पहुंच गई।'
वाधवा ने कहा कि कुशल आव्रजक अब 'झुंड' में अमेरिका छोड़ रहे हैं। यह इसलिए है क्योंकि भारत और चीन जैसे देशों में आर्थिक अवसर बढ़े हैं और लोग परिवार व मित्रों के नजदीक आना आना चाहते हैं। इसके अलावा अमेरिका की सख्त आव्रजन पण्राली भी लोगों को स्वदेश वापसी के लिए प्रेरित कर रही है। उन्होंने कहा, 'हम इसे चाहे प्रतिभा पलायन कहें या कुछ और, यह अमेरिका के लिए घातक है। अभी तक जो नवप्रवर्तन यहां हो रहा था, अब विदेश में होगा।' स्वदेश लौटने वाले 60 प्रतिशत से अधिक भारतीयों और 90 प्रतिशत चीनी मूल के लोगों ने कहा कि उनके देश में आर्थिक अवसरों की उपलब्धता उनकी स्वदेश वापसी का एक मुख्य कारण है।
अमेरिका-पाक का दिखावटी मनमुटाव
इधर कुछ ऐसे समाचार सुर्खियों में हैं जिनसे आभास होता है कि अमेरिका और पाकिस्तान के बीच मन-मुटाव बढ़ रहा है। पाकिस्तानी सेनानायक जनरल कयानी को उनके अमेरिकी आकाओं ने काफी खरी- खोटी सुनाई और यह बात साफ करने में कोई कसर नहीं छोड़ी कि उनकी नजर में आईएसआई और पाकिस्तानी फौज का एक तबका आतंकवादी तालिबान का साथ दे रहा है और इसी मदद के कारण तालिबान पर काबू पाना असंभव हो रहा है। कुछ विश्लेषकों ने इस बात पर संतोष प्रकट किया है कि पाकिस्तानी जनरल तिलमिलाए तो बहुत और खिसियाए भी काफी, पर अपनी सफाई में कुछ कह नहीं पाए। इसके साथ ही मुंबई पर हुए दहशतगर्द हमले के दौरान जिस फौजी अफसर मेजर इकबाल का नाम सामने आया था, उसके बारे में भी अमेरिकी जांच के बाद अब किसी शक-शुबहे की गुंजाइश नहीं रही। पर इस नतीजे तक पहुंचने की उतावली नहीं करनी चाहिए कि इस प्रकरण के बाद अमेरिका और पाकिस्तान के संबंधों में दरार आना तो दूर की बात है, थोड़ी सी खटास भी बढ़ेगी। हमारी समझ में यह सब एक नूराकुश्ती का हिस्सा है जिसका फायदा ओबामा की सरकार राजनयिक मंच पर अन्यत्र और स्वदेशी राजनीति में उठाना चाहती है। ओबामा की पहचान सिर्फ अश्वेत राष्ट्रपति के रूप में नहीं है बल्कि उनके नाम से जाहिर होने वाली इस्लामी विरासत से भी है। ओबामा स्वयं सायास यह प्रमाणित करने की चेष्टा करते रहे हैं कि उनकी परवरिश एक ईसाई के रूप में ही हुई है और वह जन्मजात अमेरिकी हैं। यह दोनों बातें आज तक निर्विवाद रूप से सर्वसम्मत नहीं समझी जा सकतीं। आरंभ से ही ओबामा के बारे में उग्र दक्षिणपंथी अमेरिकी यह आशंका पाले हुए हैं कि इस्लामी जगत की तरफ उनका रवैया कुछ नर्म हो सकता है। भले ही कभी-कभी यह बात 'अच्छे' तालिबान के साथ संवाद शुरू करने की जरूरत को रेखांकित करके की जाती है तो कभी पाकिस्तान सरकार को स्वयं आतंकवाद का शिकार बताकर उसके साथ सहानुभूति दर्शाने को प्राथमिकता देकर। तर्क चाहे कुछ भी हो, दबाव भारत जैसे देशों पर ही बढ़ता है जो बरसों से पाकिस्तानी फौज और गुप्तचर संस्था की साजिश के शिकार रहे हैं और जिनके लिए यह समझ पाना असंभव हो गया है कि पाकिस्तान के साथ कैसा सलूक किया जाए- गरम या नरम? यही कारण है कि जब क्रिकेट डिप्लोमेसी के जरिए मोहाली में मनमोहन सिंह ने पाकिस्तान के साथ संबंधों के सामान्यीकरण की कोशिश की तो उन्होंने स्वत:स्फूर्त दिमाग अचानक विचार के रूप में पेश किया। जब कुछ खोजी पत्रकारों ने खुलासा किया कि इस पहल की जमीन तैयार करने के लिए उन्होंने जनरल कयानी से गुप्त संदेशों का आदान-प्रदान किया था तो उन्हें तत्काल सफाई देनी पड़ी कि उन्होंने ऐसा कुछ नहीं किया था। लब्बो लुआब यह है कि अमेरिका जब जी चाहे, उसके साथ अपने हितों की रक्षा के लिए बातचीत कर सकता है। चाहे वह तालिबान हो या फौजी तानाशाह या डबल एजेंट हेडली जैसा गुप्तचर। पर भारत को यही सीख दी जाती है कि बिना उनकी रजामंदी या इशारे के कोई ऐसी पहल (गरम या नरम) न की जाए जो अमेरिकी के लिए नुकसानदेह हो। हाल में पूर्व प्रधानमंत्री इंद्रकुमार गुजराल के संस्मरण प्रकाशित हुए हैं जिनसे यह पता चलता है कि जब भी भारत पाकिस्तान से प्रायोजित दहशतगर्दी की शिकायत करता है तो अमेरिकी अधिकारी उसे पाकिस्तानी शिकायतों की फेहरिस्त थमा देते हैं जिसमें भारतीय खुफिया एजेंसियों का उल्लेख होता है। शर्म अल शेख में मनमोहन सिंह ने खुद अपने ऊपर गोल ठोंकने का करिश्मा कर दिखाया था और उसके बाद से भी राजनयिक 'ब्लंडरो' की कोई कमी नहीं रही। इसका सबसे बेहतरीन उदाहरण हिंदुत्ववादी आतंकवादियों को समझौता एक्सप्रेस के धमाके के लिए आरोपी बनाना रहा है। इस बात को भुलाना आसान नहीं कि अगर यह आरोप सच है तो फिर अभियुक्तों की उस सूची को कैसे कोई भी विश्वसनीय समझ सकता है जिसे 'पुख्ता' जांच-पड़ताल के बाद भारत सरकार ने पाकिस्तान को सौंपा था? यह तर्क असंगत नहीं कि पाकिस्तानी गुप्तचर संगठनों ने हिंदुत्ववादी संस्थाओं में भी घुसपैठ कर ली है और अब वह भारत को राजनयिक चक्रव्यूह में घेरने में सफल हुए हैं। जहां तक पाकिस्तान की अमेरिका से नाराजगी का सवाल है, उसके बारे में किसी भी तरह का भ्रम पालना नादानी ही कही जा सकती है। पाकिस्तानी सेना को इस बात का पूरा अहसास है कि बिना अमेरिका की मेहरबानी के उसका दबदबा बना नहीं रह सकता। पाकिस्तानी सेना एक परजीवी प्राणी है जिसे आधी सदी से ज्यादा समय से बिना कुछ करे-धरे भ्रष्टाचारी अय्याशी की लत पड़ चुकी है। पाकिस्तान अपने सैनिक इतिहास का चाहे जितने जोर- शोर से, रणक्षेत्र में अपने पराक्रम और जीतों का उल्लेख करे, हकीकत किसी से छिपी नहीं है। 1947-48 में कश्मीर पर हमला पूरी तरह सफल नहीं हो सका। 1965 में हालत इससे बदतर थी और 1971 में तो बर्बर वंशनाशक तेवर वाली पाकिस्तानी फौज को घुटने टेकने पड़े थे। करगिल में भी उन्हें मुंह की ही खानी पड़ी। यह हाल सिर्फ भारत के साथ मुठभेड़ों का ही नहीं। उत्तर-पश्चिमी सीमांत, वजीरिस्तान और बलूचिस्तान में भी कबाइली बागियों पर काबू पाने में पंजाबी पाकिस्तानी फौज बुरी तरह असफल रही है। भले ही कुछ फौजी तानाशाहों ने लंबे समय तक पाकिस्तान पर राज किया है पर देर-सवेर जनांदोलन या तख्तापलट ने इनका बोरिया-बिस्तर गोल कर दिया है। जनरल जिया के कार्यकाल में न केवल सेना का बल्कि पाकिस्तानी समाज का तेजी से कट्टरपंथी इस्लामीकरण हुआ और इस अभियान में अमेरिकियों ने खुशी-खुशी हाथ बटाया। सऊदी अरब से जिस दकियानूसी आक्रामक वहाबी इस्लाम का निर्यात किया जा रहा था, उसका खर्च सऊदी अरब उठा रहा था और तब अमेरिकियों को यह लगता था कि अफगानिस्तान से साम्यवादी रूसियों को उखाड़ने-खदेड़ने के लिए इस्लामी शमसीर बहुत काम आएगी। उन्हें तब यह इल्म नहीं था कि यह भस्मासुर कितनी जल्द खुद उनकी जान का बबाल बन जाएगा!
इसी दौर में पाकिस्तान ने एटमी बम का निर्माण किया और भारत को असंतुलित रखने के मकसद से कुछ अमेरिकी अपनी आंखे पाकिस्तानी वैज्ञानिक ए क्यू खान की परमाणविक तस्करी से मूंदे रहे। यह सोचना बचपना है कि अफ-पाक रणक्षेत्र को एक मानने वाले आज यकायक पाकिस्तान की सामरिक संवेदनशीलता को नकार रहे हैं। अंत में यह बात याद रखने की जरूरत है कि पाकिस्तान की संप्रभुता का उल्लंघन अमेरिकी गुप्तचर स्वयं लगातार करते रहे हैं और अफ-पाक सरहद पर अमेरिकी हमलों ने कई बार पाकिस्तानी सीमा का अतिक्रमण किया है जिनमें दर्जनों निरीह पाकिस्तानी नागरिक मारे गए हैं। खुद अपने सैनिकों को जवाबी वार में हताहत होने से बचाने के लिए अब अमेरिका ने चालक रहित ड्रोन विमानों का प्रयोग आरंभ कर दिया है। हमारा मानना है कि यह कपट चालें ऐसे ही चलती रहेंगी। भारत को सतर्क रहकर अपना हित साधना होगा।
Thursday, April 28, 2011
धर्मतंत्र को चुनौती देता लोकतंत्र
अब वह जमाना गया, जब अमेरिका को गाली देना ही गुट निरपेक्षता कही जाती थी। अब अमेरिका और अमेरिका विरोधी के बीच ध्रुवीकरण नहीं हो रहा। अब ध्रुवीकरण हो रहा है लोकतंत्र समर्थक और लोकतंत्र विराधी के बीच। मुस्लिम देशों में लोकतंत्र का उदय अब धर्मतंत्र को भी समाप्त करने का लक्षण है..छले दो माह से लोकतंत्र ने इस्लाम के पाले में कदम बढ़ा दिए हैं। एकाएक ट्यूनीशिया में जन क्रांति हुई। इसके पूर्व इराक और अफगानिस्तान में भी लोकतंत्र लागू हुआ, किंतु वहां लोकतंत्र पूरी तरह साम्राज्यवादी लोकतंत्र था- थोपा हुआ था, जनता की इसमें कोई भागीदारी नहीं थी। एक प्रकार से लोकतांत्रिक देशों ने अपनी सैन्य शक्ति के बल पर इन दोनों देशों की जनता को तानाशाही से मुक्त कराया था। सच्चाई यह है कि इन दो देशों के अभियान ने लोकतंत्र की व्यवस्था पर भी प्रश्नचिन्ह खड़े किए थे और यही कारण था कि लोकतांत्रिक देश अफगानिस्तान और इराक के बाद अपनी मुहिम को आगे नहीं बढ़ा सके। किंतु ट्यूनीशिया और मिd के परिवर्तन को साफ तौर पर जनक्रांति कहने में कोई हिचक नहीं होनी चाहिए। इन दोनों देशो में न कोई पूर्व तैयारी थी, न कोई नेतृत्व था और न ही कोई मुद्दे थे। सबकुछ पूरी तरह शांत था। इतना शांत कि यदि इसके ठीक पूर्व मतदान होता तो इन दोनों सत्ताधीशों को 90 प्रतिशत से भी अधिक वोट मिलते और दोनों ही दुनिया में अपनी-अपनी लोकप्रियता का ढिंढोरा पीटते मिलते। किंतु परिवर्तन एकाएक इतनी तेज गति से हुआ कि इन्हें न सोचने-समझने का मौका मिला, न संभलने का। सोचने-समझने तक वहां तानाशाही को परास्त करके लोकतंत्र आ चुका था।
लोकतंत्र के लिए जनक्रांति की यह लहर कई जगह शुरू हुई, किंतु निर्णायक स्थान तक नही पहुंच सकी, क्योंकि अन्य देशों में आई क्रांति की लहर स्वत: स्फूर्त न होकर ट्यूनीशिया-मिd की नकल मात्र थी। दूसरी बात यह रही कि इस पहल के पूर्व यहां के तानाशाहों को संभलने का मौका मिल चुका था। तीसरी बात यह भी रही कि ट्यूनीशिया और मिd की सरकारों के साथ लोकतांत्रिक देशों का समझौता था। इन देशों द्वारा हाथ खींच लेने के बाद इन्हें हथियार डालने के अलावा कोई मार्ग नहीं दिखा। लीबिया के साथ वैसी स्थिति नहीं थी। लीबिया पूरी तरह अमेरिकी गुट से स्वतंत्र था। लीबिया को तैयारी करने का अवसर मिला और लीबिया की क्रांति स्व: स्फूर्त न होकर ट्यूनीशिया-मिd की नकल मात्र थी। यही कारण रहा कि दो के बाद किसी तीसरे देश में लोकतंत्र की यह मुहिम आगे नहीं बढ़ सकी।
लोकतांत्रिक देशों ने पुन: इराक-अफगानिस्तान का मार्ग पकड़ा और इन देशों के विद्रोहियों को मदद देनी शुरू की। लीबिया पर हवाई हमले शुरू हुए और लीबिया के तानाशाह कर्नल गद्दाफी की पराजय निश्चित दिख रही है। यमन और कुछ अन्य देशों में यह लोकतंत्र की मुहिम क्या रूप लेगी, यह अभी पता नहीं, किंतु इतना स्पष्ट दिखता है कि मुस्लिम तानाशाही की जड़ों में लोकतंत्र के कीड़े प्रवेश कर चुके हैं और अमेरिका आदि देशों को भी लोकतंत्र थोपने की मुहिम आगे बढ़ाने का बहाना मिल गया है। मुस्लिम देशों में लोकतंत्र की यह छलागं पूरी मुस्लिम विचारधारा में बदलाव लाएगी। अबतक मुसलमान लोकतंत्र के स्थान पर धर्मतंत्र को महत्व देते रहे हैं। यही कारण है कि मुस्लिम देशों के शासक धार्मिक भावना को सत्ता की पूंजी मानते रहे हैं। दो स्थानों की जनक्रांति ने पश्चिमी देशों को बल प्रयोग द्वारा भी लोकतंत्र थोपने का मार्ग खोल दिया है। किंतु पश्चिमी देशों की इस कोशिश ने एक बहस को भी जन्म दिया है कि क्या किसी देश के आंतरिक मामलों में अन्य देश हस्तक्षेप कर सकते हैं? कर्नल गद्दाफी यही प्रश्न बार-बार उठा रहे हैं। दूसरी तरफ लोकतांत्रिक टीम का तर्क है कि यदि कोई व्यक्ति बलपूर्वक अपने देश का शासक बन जाए तो अन्य लोकतांत्रिक देश सिर्फ मूक दर्शक कैसे बने रहें? यों इराक पर अमेरिकी आक्रमण ने पूरे मुस्लिम समुदाय को एकजुट कर दिया था, भले ही भय या स्वार्थ के कारण वे चुप रह गए हों। किंतु नई स्थिति में मुस्लिम जगत भी विभाजित हो गया है। लीबिया पर अमेरिकी हमले का वैसा विरोध नहीं है, जैसा इराक-आक्रमण के समय था। फिर भी कुछ देशों की मजबूरी है कि वे स्वयं को अमेरिका के विरुद्ध दिखते रहने का प्रयास करें, भले ही अंदर-अंदर उसके साथ भी हों। उन्होंने अमेरिकी आक्रमण के औचित्य पर शंका प्रकट की है और ऐसे देशों में भारत भी शामिल है।
भारत एक लोकतांत्रिक देश है। लोकतंत्र और तानाशाही अथवा धर्मतंत्र के बीच कोई टकराव होता है तो लोकतंत्र का समर्थन भारत का भी नैतिक दायित्व है। दूसरी ओर किसी देश के आंतरिक मामलों में कोई अन्य देश अकारण हस्तक्षेप करे तो पीड़ित का साथ देना भारत का कर्तव्य है। विचारणीय प्रश्न यह है कि क्या तानाशाही किसी देश का आंतरिक मामला है? बिल्कुल नहीं। क्यों नहीं कर्नल गद्दाफी यह घोषित कर देते हैं कि संयुक्त राष्ट्र संघ लीबिया में जनमत संग्रह करा ले और यदि वहां की जनता मुझे नहीं चाहेगी तो मैं हट जाऊंगा। शायद अमेरिका इस बात पर तैयार होकर आक्रमण बंद कर देगा, किंतु गद्दाफी को यह विश्वास नहीं है कि वहां की जनता स्वतंत्रता की स्थिति में तानाशाही का समर्थन करेगी। ऐसी हालत में कर्नल गद्दाफी जनमत संग्रह हेतु तैयार न हों, तब विश्व समुदाय का क्या कर्तव्य है? मनुष्य किसी देश का गुलाम मात्र नहीं है। वह विश्व समुदाय की एक इकाई है। उसके कुछ प्राकृतिक अधिकार हैं, जिनकी सुरक्षा विश्व समुदाय का दायित्व है। यदि राज्य भी उसके ऐसे अधिकार पर आक्रमण करे तो विश्व समुदाय उसकी सुरक्षा के लिए राज्य को मजबूर कर सकता है। यह अलग बात है कि साम्यवाद और लोकतंत्र के विवाद में लोकतंत्र इतना सशक्त नहीं था कि वह विश्व समुदाय का प्रतिनिधित्व कर सके।
लोकतंत्र के लिए जनक्रांति की यह लहर कई जगह शुरू हुई, किंतु निर्णायक स्थान तक नही पहुंच सकी, क्योंकि अन्य देशों में आई क्रांति की लहर स्वत: स्फूर्त न होकर ट्यूनीशिया-मिd की नकल मात्र थी। दूसरी बात यह रही कि इस पहल के पूर्व यहां के तानाशाहों को संभलने का मौका मिल चुका था। तीसरी बात यह भी रही कि ट्यूनीशिया और मिd की सरकारों के साथ लोकतांत्रिक देशों का समझौता था। इन देशों द्वारा हाथ खींच लेने के बाद इन्हें हथियार डालने के अलावा कोई मार्ग नहीं दिखा। लीबिया के साथ वैसी स्थिति नहीं थी। लीबिया पूरी तरह अमेरिकी गुट से स्वतंत्र था। लीबिया को तैयारी करने का अवसर मिला और लीबिया की क्रांति स्व: स्फूर्त न होकर ट्यूनीशिया-मिd की नकल मात्र थी। यही कारण रहा कि दो के बाद किसी तीसरे देश में लोकतंत्र की यह मुहिम आगे नहीं बढ़ सकी।
लोकतांत्रिक देशों ने पुन: इराक-अफगानिस्तान का मार्ग पकड़ा और इन देशों के विद्रोहियों को मदद देनी शुरू की। लीबिया पर हवाई हमले शुरू हुए और लीबिया के तानाशाह कर्नल गद्दाफी की पराजय निश्चित दिख रही है। यमन और कुछ अन्य देशों में यह लोकतंत्र की मुहिम क्या रूप लेगी, यह अभी पता नहीं, किंतु इतना स्पष्ट दिखता है कि मुस्लिम तानाशाही की जड़ों में लोकतंत्र के कीड़े प्रवेश कर चुके हैं और अमेरिका आदि देशों को भी लोकतंत्र थोपने की मुहिम आगे बढ़ाने का बहाना मिल गया है। मुस्लिम देशों में लोकतंत्र की यह छलागं पूरी मुस्लिम विचारधारा में बदलाव लाएगी। अबतक मुसलमान लोकतंत्र के स्थान पर धर्मतंत्र को महत्व देते रहे हैं। यही कारण है कि मुस्लिम देशों के शासक धार्मिक भावना को सत्ता की पूंजी मानते रहे हैं। दो स्थानों की जनक्रांति ने पश्चिमी देशों को बल प्रयोग द्वारा भी लोकतंत्र थोपने का मार्ग खोल दिया है। किंतु पश्चिमी देशों की इस कोशिश ने एक बहस को भी जन्म दिया है कि क्या किसी देश के आंतरिक मामलों में अन्य देश हस्तक्षेप कर सकते हैं? कर्नल गद्दाफी यही प्रश्न बार-बार उठा रहे हैं। दूसरी तरफ लोकतांत्रिक टीम का तर्क है कि यदि कोई व्यक्ति बलपूर्वक अपने देश का शासक बन जाए तो अन्य लोकतांत्रिक देश सिर्फ मूक दर्शक कैसे बने रहें? यों इराक पर अमेरिकी आक्रमण ने पूरे मुस्लिम समुदाय को एकजुट कर दिया था, भले ही भय या स्वार्थ के कारण वे चुप रह गए हों। किंतु नई स्थिति में मुस्लिम जगत भी विभाजित हो गया है। लीबिया पर अमेरिकी हमले का वैसा विरोध नहीं है, जैसा इराक-आक्रमण के समय था। फिर भी कुछ देशों की मजबूरी है कि वे स्वयं को अमेरिका के विरुद्ध दिखते रहने का प्रयास करें, भले ही अंदर-अंदर उसके साथ भी हों। उन्होंने अमेरिकी आक्रमण के औचित्य पर शंका प्रकट की है और ऐसे देशों में भारत भी शामिल है।
भारत एक लोकतांत्रिक देश है। लोकतंत्र और तानाशाही अथवा धर्मतंत्र के बीच कोई टकराव होता है तो लोकतंत्र का समर्थन भारत का भी नैतिक दायित्व है। दूसरी ओर किसी देश के आंतरिक मामलों में कोई अन्य देश अकारण हस्तक्षेप करे तो पीड़ित का साथ देना भारत का कर्तव्य है। विचारणीय प्रश्न यह है कि क्या तानाशाही किसी देश का आंतरिक मामला है? बिल्कुल नहीं। क्यों नहीं कर्नल गद्दाफी यह घोषित कर देते हैं कि संयुक्त राष्ट्र संघ लीबिया में जनमत संग्रह करा ले और यदि वहां की जनता मुझे नहीं चाहेगी तो मैं हट जाऊंगा। शायद अमेरिका इस बात पर तैयार होकर आक्रमण बंद कर देगा, किंतु गद्दाफी को यह विश्वास नहीं है कि वहां की जनता स्वतंत्रता की स्थिति में तानाशाही का समर्थन करेगी। ऐसी हालत में कर्नल गद्दाफी जनमत संग्रह हेतु तैयार न हों, तब विश्व समुदाय का क्या कर्तव्य है? मनुष्य किसी देश का गुलाम मात्र नहीं है। वह विश्व समुदाय की एक इकाई है। उसके कुछ प्राकृतिक अधिकार हैं, जिनकी सुरक्षा विश्व समुदाय का दायित्व है। यदि राज्य भी उसके ऐसे अधिकार पर आक्रमण करे तो विश्व समुदाय उसकी सुरक्षा के लिए राज्य को मजबूर कर सकता है। यह अलग बात है कि साम्यवाद और लोकतंत्र के विवाद में लोकतंत्र इतना सशक्त नहीं था कि वह विश्व समुदाय का प्रतिनिधित्व कर सके।
हिंद की खुशबू से सराबोर है मॉरीशस का आप्रवासी घाट
मॉरीशस के पोर्ट लुइस में मौजूद आप्रवासी घाट (कुली घाट) से भारतीयों का गहरा संबंध है। सूदूर हिंद महासागर में मेडागास्कर और मालागासी गणराज्य के समीप अफ्रीकी जोन में मौजूद इस द्वीप में पहली बार हमारे पूर्वज बंधुआ मजदूर के रूप में जब यहां पहुंचे तो इसी आप्रवासी घाट पर उतरे थे। जाहिर है इस घाट पर आकर हिंदुस्तानियत की खुशबू आना लाजिमी है। भारत से आने वाला हर पर्यटक भी यहां अपनी आमद जरूर दर्ज कराते हैं। हिंदुस्तान से आए अब तक के सभी राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री के अलावा विशेष मेहमान यहां जरूर पहुंचते हैं। आप्रवासी घाट पर दर्ज तथ्यों के मुताबिक 2 नवम्बर वर्ष 1834 में पहली बार भारत से 36 कुली यहां बंधुआ मजदूर के रूप में लाए गए थे। यह सिलसिला लगातार चलता रहा। यहां दर्ज तथ्यों के मुताबिक आखिरी बार कुली के रूप में 31 मई 1924 को यहां हमारे तमाम पूर्वज बंधुआ मजदूर के रूप में पहुंचे थे। हिंदुस्तान में अंग्रेजी हूकूमत के दौरान यह सिलसिला शुरू हुआ तो सालों-साल चलता ही रहा। औपनिवेशिक इतिहास का सबसे अलग अध्याय यही है कि मॉरीशस में वर्ष 1834 से वर्ष 1900 तक 4,53,063 लोग यहां बंधुआ मजदूर के रूप में इस द्वीप में पहुंचा दिए गए थे। यूं तो मॉरीशस के राज्य में पुराने अभिलेख दसवीं शताब्दी के मिले हैं। इनमें तमिल, द्रविड़ और ओस्ट्रोनेशी नाविकों का जिक्र आता है। वर्ष 1507 में सबसे पहले पुर्तगाली नाविक यहां आए और उन्होंने इस निर्जन द्वीप पर एक यात्रा अड्डा स्थापित किया और फिर कुछ ही सालों में वीरानियत की वजह से छोड़कर चले भी गए। इतिहास में जिक्र मिलता है कि सन 1598 में हॉलैंड के तीन पोत जो स्फाइस आइलैंड की यात्रा पर निकले थे एक चक्रवात के दौरान रास्ता भटक कर यहां पहुंच गए थे। उन्होंने इस द्वीप का नाम अपने नासाओं के युवराज मॉरिस के सम्मान में मॉरीशस रख दिया। सन 1638 में डच लोगों ने पहली स्थायी बस्ती बसाई। यहां आने वाले चक्रवातो और कठोर जलवायु की वजह से वो भी लोग यहां नहीं टिक सके। उसके बाद इस द्वीप पर सन 1715 में फ्रांस ने कब्जा कर लिया और इसका नाम बदलकर 'आइल द फ्रांस' के शासन में चीनी उत्पादन पर जोर दिया गया और इसे आर्थिक रूप सुदृढ़ और विकसित किया गया। अठारहवीं शताब्दी के शुरू में फ्रांस और ग्रेट ब्रिटेन के बीच सैन्य संघर्ष शुरू हो गया। फ्रांस ने व्रिटेन को आर्थिक क्षति पहुंचाने के लिए इस द्वीप में समुद्री डाकुओं को पनाह दे डाली। ये समुद्री डाकू अक्सर मूल्यवान बस्तुओं से लदे ब्रिटिश जहाजों को लूट लेते थे। इन जहोजों में भारत से ब्रिटेन के बीच आयात निर्यात की वस्तु में लदी होती थी। फ्रांस की इस गतिविधि से खीझकर ब्रिटेन ने युद्ध का बिगुल फूंक दिया और सन 1803 से 1815 तक चले युद्ध के दौरान ब्रिटेन इस द्वीप पर कब्जा पाने में कामयाब हो गया। ब्रिटिश शासन के दौरान इस द्वीप का नाम बदलकर वापस मॉरीशस रख दिया गया। इस दौरान फ्रांस ने भी अपनी हार मान ली और ब्रिटेन के समक्ष कुछ शत्रे रख दी जिसमें प्रमुख यह था कि इस द्वीप में फ्रांसीसी भाषा का प्रयोग जारी रहेगा। शायद यही वजह है कि यहां फ्रेंच बोलने वालों की संख्या भी काफी ज्यादा है। आप्रवासी घाट का जिक्र करने से पहले इतिहास के उपयुक्त तथ्यों में जाना बेहद जरूरी था। इस द्वीप में ब्रिटेन का पूर्ण रूप से कब्जा हो जाने के बाद अंग्रेजों के लिए इसे बसाने की भी चुनौती थी क्योंकि भारत और ब्रिटेन के बीच आने-जाने वाले व्यापारिक जहाजों को यहां रोका भी जाता था। इस द्वीप के वीरानेपन की वजह से कोई भी अंग्रेज यहां न बसने को तैयार था न ही रुकने को। अठारहवीं शताब्दी में भारत में अंग्रेजी हूकूमत का दौर चल रहा था। अंग्रेजों ने इस द्वीप को बसाने के लालच में भारत के उत्तर प्रदेश और बिहार राज्य के तमाम अंचलों में रहने वाले गरीब मेहनतकश किसानों और मजदूरों को सब्जबाग दिखाए और कुछ बरसों के एग्रीमेंट पर मॉरीशस ले जाना शुरू कर दिया। इसके लिए अंग्रेजों ने बाकायदा कलकत्ता के बंदरगाह में लेबर डिपो खोल रखा था। जिसके जरिये निर्धन परिवारों के नौजवानों को खूबसूरत करियर और पैसे का लालच देकर यहां पटक दिया जाता था। आप्रवासी घाट ने सैकड़ों साल से हजारों हिंदुस्तानी पूर्वजों की यादें समा और सजा रखी हैं। हमारे पूर्वजों को मूर्ख बनाकर ले जाने वाले अंग्रेजों को उस समय एहसास भी नहीं होगा कि 21वीं शताब्दी में उन्हीं मजदूर परिवारों का कोई बच्चा इस द्वीप और देश का शासक बनेगा। अप्रवासी घाट के जरिये पहली बार यहां पहुंचने वाले पूर्वजों को शायद इससे बड़ी कोई श्रद्धांजलि भी नहीं हो सकती है। खास बात तो ये है कि मॉरीशस के अफ्रीकी देश होने के बाद भी यहां बसने वाले लोगों ने भारतीयता की जीवंतता को बनाए रखा।
अस्तित्व का संकट
पाकिस्तान में बिगड़ते हालात पर ys[kd की टिप्पणी
पाकिस्तान अस्तित्व के संकट से जूझ रहा है। वहीं दूसरी ओर उसके पड़ोसियों को एक राष्ट्र के रूप में उसकी मौत के परिणामों की चिंता सताने लगी है। पाकिस्तान के तो जन्म में ही विषबीज बोए हुए थे। किसी भी देश के लिए धर्म को शासन का आधार बनाना एक अस्थिर आधार साबित हुआ है और जब इसका इस्तेमाल नए अस्तित्वों के निर्माण के लिए किया गया है तो आंदोलन के नेताओं पर शक होना स्वाभाविक ही है। पाकिस्तान में कई लोग आज भी पंथ के आधार पर एक नई सल्तनत खड़ी करने का सपना देखते हैं। इस वायरस से सबसे पहले और सबसे ज्यादा प्रभावित होने वाली सेना लोकतांत्रिक सिद्धांतों पर अमल करती हुई नहीं दिख रही है। ऐसा नहीं है कि पाकिस्तान में कथित लोकतंत्र-समर्थकों को इस्लामी कट्टरपंथ की सर्वोच्चता की धारणा से परहेज है। अहमदियों के सफाए से लेकर सूफीवाद पर हमले तक हालात तेजी से खराब हुए हैं। चूंकि सेना ऐसा चाहती भी थी इसलिए इस प्रक्रिया में और तेजी आई है। इन तमाम वजहों से पाकिस्तानी समाज में सड़ांध पैदा होने लगा है। आज पाकिस्तान के अस्तित्व पर मौत का साया मंडरा रहा है। दूसरे जो लोग कोशिश करने के लिए तैयार हैं और अपनी कमजोर ताकत से घड़ी के कांटे को पीछे घुमाना चाहते हैं उनके लिए भी खतरा और बढ़ गया है। भारत ने इस सड़ांध को रोकने के लिए अपनी तरफ से कई कोशिशें की हैं, लेकिन नतीजा कोई अधिक उत्साहजनक नहीं दिख रहा है। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और पाक प्रधानमंत्री यूसुफ रजा गिलानी ने जिस मोहाली भावना का परिचय दिया है, उससे समग्र वार्ता का मार्ग प्रशस्त करने में मदद मिली है, लेकिन क्या इससे असल मुद्दे यानी इस्लामी कट्टरपंथी आतंकवाद के समाधान में मदद मिलेगी। हालांकि यह सवाल अभी अस्पष्ट नजर आ रहा है, क्योंकि 26/11 के मुंबई में शामिल पाकिस्तानियों से पूछताछ की अनुमति देने में अभी भी हिचक बनी हुई है। इसके लिए पाकिस्तानी सेना जिम्मेदार है, जिसे लगता है कि भारत के खिलाफ आतंकवाद के आरोपियों को पाकिस्तानी न्याय प्रणाली अधिक सुरक्षा प्रदान कर सकती है। हाफिज सईद को लाहौर में पूरी आजादी है, क्योंकि पाकिस्तानी न्यायपालिका ने उसे बरी कर दिया है। जबकि खुद पाकिस्तान भी मानता है कि अदालतों द्वारा दी गई सजाओं को देखते हुए उसे बरी किया जाना कुछ अधिक ही छूट है। हिरासत में जो लोग हैं वे सम्मानित अतिथियों की तरह रहते हैं। इस सड़ांध भरे अस्तित्व से उबरने के लिए पाकिस्तान को मदद की जरूरत है। भारत और अफगानिस्तान के साथ-साथ अमेरिका और नाटो मित्र देश भी अपने ही तरीकों से मदद कर सकते हैं। भारत और अफगानिस्तान अपनी-अपनी अर्थव्यवस्थाएं और बाजार खोल सकते हैं और पाकिस्तान को आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में सहयोग करने के बदले में अमेरिकी खैरात पर निर्भर रहने की बदनामी झेलने से मुक्त कर सकते हैं। इसके अलावा व्यापार, आवागमन और सांस्कृतिक संबंधों के फायदे भी पहंुचा सकते हैं। उधर अमेरिका अफगानिस्तान के साथ लगने वाले सीमावर्ती कबाइली इलाकों में आतंकवादी कमांडरों पर ड्रोन हमलों से उपजे अमरीका-विरोधी रुख को दूर कर सकता है। इसके लिए वह इस प्रकार की कार्रवाइयां बंद करके पाकिस्तान को अमेरिकी मुख्यभूमि पर 9/11 के हमलों के भगोड़ों की धरपकड़ का मौका दे सकता है। अगर पाकिस्तानी सैन्य प्रशासन के विरोध के चलते ऐसा नहीं होता है तो अमेरिका, उसके मित्र देशों तथा भारत को पाकिस्तान के परमाणु हथियारों और परमाणु सामग्री के श्चोतों को निष्कि्रय करने की योजना तैयार कर लेनी चाहिए ताकि पाकिस्तान सेना इन्हें आतंकवादियों को न सौंप सके। इन्हें सेना सामरिक पैठ और क्षेत्रीय प्रभाव की तलाश में अपना अग्रणी व्यूह मानती है। परमाणु कवच की आड़ में भूराजनीति के हथियार के रूप में आतंकवाद को इस्तेमाल करने की नापाक चाल को देखते हुए यह बहुत जरूरी है। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं).
आंकड़ों में उलझी गरीबी
भारत और चीन, ये दो ऐसे देश हैं जिनकी आर्थिक क्षमता और संभावना पर अभी दुनिया की सबसे ज्यादा निगाहें हैं। ये दोनों देश न सिर्फ एशिया की आर्थिक गतिविधियों की लगातार धुरी बने हुए हैं बल्कि अमेरिका जैसी स्वयंभू आर्थिक महाशक्ति भी इन्हें दरकिनार कर अपने भविष्य को लेकर कोई मुगालता पालने का खतरा मोल नहीं ले सकती। तकरीबन एक हफ्ते पहले विश्व बैंक और अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष ने 'ग्लोबल मॉनिटरिंग रिपोर्ट-2011' जारी की थी। इसके मुताबिक जिस तेजी से भारत और चीन की अर्थव्यवस्था कुलांचे भर रही है, वह दुनिया को गुरबत केंधेरे से बचाने में खासी मददगार होगी। रिपोर्ट केआकलन को अगर सही मानें तो एशिया के ये दो देश अपनी आर्थिक क्षमता के बल पर दुनियाभर के गरीबों की गिनती आधी तक घटाने की ताकत रखते हैं। इस आकलन में एक बार फिर से इन दोनों देशों की उद्यमशीलता, उत्पादन और उपभोग की बहुप्रसारीय विस्तार की संभावना को महत्वपूर्ण माना गया। वैसे इस तरह के आकलन नए नहीं हैं। जहां यूरोप और अमेरिका के विकास का चरम उन्हें आगे की राह के लिए इन देशों की तरफ देखने के लिए मजबूर कर रहा है, वहीं पूरी दुनिया में ऐसी आर्थिक समझ भी बन रही है कि ग्लोबल बाजार की छतरी में जब तक इन दोनों देशों को पूरी तरह शामिल नहीं किया जाता, आर्थिक मंदी जैसे खतरे उनकी परेशानी बढ़ाते रहेंगे। अलबत्ता तस्वीर का दूसरा पहलू भी है, जो खासा विरोधाभासी है। पहले जिक्र हाल में आई एशियाई विकास बैंक की रिपोर्ट का। 'ग्लोबल फूड प्राइस इन्फ्लेशन एंड डेवलपिंग एशिया' शीर्षक से जारी रिपोर्ट में कहा गया है कि एशिया के कई देशों में इस साल खाद्य वस्तुओं की कीमत में औसतन दस फीसद तक का इजाफा हुआ है। अगर रुख यही रहा तो 6.4 करोड़ लोगों के इस पूरे महादेश को गरीबी रेखा से नीचे आ जाने का खतरा है। एडीबी की रिपोर्ट को सीधे भारत और चीन पर टिप्पणी न भी मानें तो यह तय है कि इन दोनों देशों की अपनी समृद्धि और विकास का आउटफ्लो इतना ज्यादा या कारगर नहीं है कि वह बाकी अर्थव्यवस्थाओं को खुशहाल बना सकें। और अगर ऐसा है तो यह कहीं न कहीं इनके भीतरी आर्थिक ताने-बाने के अनसुलझे रहने के कारण ही है। अकेले भारत की बात करें तो यहां विकास का रिसाव अब जाकर कहीं-कहीं निचली सतह को स्पर्श कर रहा है। गनीमत है कि सरकार और उसकी विकास एजेंसियां भी डेवलपमेंट के सरफेस पर उगी हरियाली के बजाय उसके इनकूलसिव ग्रोथ को महत्वपूर्ण मान रही हैं। रही चीन की बात तो वहां विकास के 'अर्थ' पर जिस तरह राज्य का 'अनर्थ' हावी है, उसके कल्याणकारी फलित के प्रति आशान्वित रहना खतरनाक है। हां, यह जरूर है कि गरीबी दूर करना यदि विकास का पैमाना बना रहे तो दुनिया में बेहतर कल की संभावना बनी रहेगी।
Wednesday, April 27, 2011
क्यूबा में बदलाव की हवा
राउल कास्त्रो राज्य की जिम्मेदारियों को नए सिरे से परिभाषित करते हुए कहते हैं कि इसका काम देश की सार्वभौमिकता बनाए रखना, अपराधों को नियंत्रित करना और गरीबी तथा हिंसा को दूर करना है। इसलिए आर्थिक विकेंद्रीकरण उन्हें आवश्यक लगता है, लेकिन इसका अर्थ पूंजीवाद व निजीकरण को बढ़ावा देना कतई नहीं है। ध्यान से देखा जाए तो राउल कास्त्रो का यह विचार साम्यवादी चीन के तजुर्बे से मेल नहीं खाता क्योंकि चीन में जब आर्थिक बदलाव हुए तो वहां पूंजीवाद का परोक्ष प्रभाव बढ़ा है। क्यूबा के बदलाव को इसी नजरिए से देखा जा रहा है, लेकिन राउल कास्त्रो ऐसी किसी आशंका को खारिज करते हैं..ब क्यूबा में राउल कास्त्रो ने देश की छठी कम्युनिस्ट कांग्रेस का उद्घाटन किया, तब किसी को यह अनुमान नहीं था कि वे भावी राष्ट्रध्यक्षों के लिए अधिकतम दस वर्षो का कार्यकाल निश्चित करने की बात करेंगे। उस कांग्रेस में केवल यही आश्चर्य सामने नहीं आया था, बल्कि अभी वैश्विक राजनीति में क्रांति, सत्ता परिवर्तन, दीर्घकालिक स्थायित्व और ईमानदार नेतृत्व की मिसाल बने साम्यवादी देश क्यूबा में कुछ और परिवर्तन दुनिया को अचरज में डालने वाले साबित होने थे। क्यूबा का मित्र राष्ट्र और फिदेल कास्त्रो के करीबी वेनेजुएला में ह्यूगो शावेज वर्ष 1999 से सत्ता संभाले हुए हैं और वर्ष 2012 को आगामी छह वर्षो के लिए फिर सत्ता संभालने को तैयार हैं। अरब देशों में दो-तीन दशकों से सत्ता संभाले राष्ट्राध्यक्षों, सैन्य तानाशाहों के खिलाफ जनता सड़कों पर उतर आई है और नेतृत्व परिवर्तन की मांग कर रही है। ऐसे में यह सवाल उठना जायज है कि जनांदोलन या विपक्षी दलों के हमलों के बिना क्यूबा में नेतृत्व की समयसीमा तय करने की घोषणा करने की कौन सी जरूरत आन पड़ी? राउल कास्त्रो ने अपने आप ही प्रस्थान बिंदु घोषित कर दी। जबकि उनके बड़े भाई और अब तक क्यूबा में साम्यवाद की कमान संभालते आए फिदेल कास्त्रो ने कम्युनिस्ट पार्टी के मुखिया का पद छोड़ते हुए इसकी कमान राउल कास्त्रो को ही सौंप दी है। नेतृत्व में परिवर्तन के साथ ही क्यूबा अपने आर्थिक ढांचे में फेरबदल के लिए भी तैयार हो रहा है। फरवरी 2008 में फिदेल कास्त्रो से सत्ता संभालने के बाद राउल कास्त्रो ने संकेत दिए थे कि वे बड़े पैमाने पर आर्थिक व ढांचागत बदलाव लाएंगे और अब ऐसा लग रहा है कि वे इसे पूरी तरह अमल में लाने को प्रतिबद्घ हैं। क्यूबा में अब आम जनता को घर व कार खरीदने व बेचने का अधिकार देने का कानून बन रहा है, साथ ही सरकारी लीज पर किसानों को जमीन देने की भी तैयारी चल रही है। पहले फैसले से जहां क्यूबा के आंतरिक बाजार में भारी बदलाव देखने मिलेगा, वहीं दूसरा फैसला लागू होने से जमीन मालिकों की संख्या बढ़ेगी, जो वर्ष 1959 की क्रांति के बाद बेहद कम थी। इन फैसलों के पीछे सरकार पर बोझ कम करने का इरादा बताया जा रहा है। ज्ञात हो कि क्यूबा में 90 प्रतिशत कार्य सरकार द्वारा प्रदत्त है। इसका अर्थ है कि सरकार पर वेतन देने का बोझ बना हुआ है। अगले पांच वर्षो में 90 प्रतिशत सरकारी कर्मचारियों को घटाकर 65 प्रतिशत तक लाने का इरादा है।
राउल कास्त्रो राज्य की जिम्मेदारियों को नए सिरे से परिभाषित करते हुए कहते हैं कि इसका काम देश की सार्वभौमिकता बनाए रखना, अपराधों को नियंत्रित करना और गरीबी तथा हिंसा को दूर करना है। इसलिए आर्थिक विकेंद्रीकरण उन्हें आवश्यक लगता है, लेकिन इसका अर्थ पूंजीवाद व निजीकरण को बढ़ावा देना कतई नहीं है। यह ध्यान रहे कि साम्यवादी चीन में जब आर्थिक बदलाव हुए तो वहां पूंजीवाद का परोक्ष प्रभाव बढ़ा है। क्यूबा के बदलाव को इसी नजरिए से देखा जा रहा है, लेकिन राउल कास्त्रो ऐसी किसी आशंका को खारिज करते हैं। हालांकि वहां की जनता में कांग्रेस की घोषणाओं के बाद मिश्रित प्रतिक्रियाएं देखने मिली हैं। लोग प्रसन्न हैं कि अब उनके वित्तीय प्रबंध में राज्य का सीधा दखल नहीं रहेगा, लेकिन इसके साथ सशंकित भी हैं कि राज्य का नियंत्रण कम होने से उनका आर्थिक भविष्य कैसा होगा? रहा सवाल नेतृत्व परिवर्तन का, तो क्रांति के पांच दशक बाद अब तक वहां नई पीढ़ी का मजबूत नेतृत्व तैयार नहीं हुआ है। राउल कास्त्रो स्वयं अगले वर्ष 80 साल के होने जा रहे हैं। फिदेल कास्त्रो पहले ही अपने स्वास्थ्य के कारण मुख्यधारा से हट गए हैं। ऐसे में क्यूबा में स्थायित्व बनाए रखने, अमेरिकी दबाव से स्वतंत्र नीतियां बनाने, अर्थव्यवस्था की बदलती परिभाषाओं के अनुरूप देश को तैयार करने और आर्थिक संकट से बचाने के लिए युवा नेतृत्व की पंक्ति तैयार होना बेहद जरूरी है। कास्त्रो बंधु क्यूबा को इस क्रांति में कैसे सफल करते हैं यह देखने वाली बात होगी।
राउल कास्त्रो राज्य की जिम्मेदारियों को नए सिरे से परिभाषित करते हुए कहते हैं कि इसका काम देश की सार्वभौमिकता बनाए रखना, अपराधों को नियंत्रित करना और गरीबी तथा हिंसा को दूर करना है। इसलिए आर्थिक विकेंद्रीकरण उन्हें आवश्यक लगता है, लेकिन इसका अर्थ पूंजीवाद व निजीकरण को बढ़ावा देना कतई नहीं है। यह ध्यान रहे कि साम्यवादी चीन में जब आर्थिक बदलाव हुए तो वहां पूंजीवाद का परोक्ष प्रभाव बढ़ा है। क्यूबा के बदलाव को इसी नजरिए से देखा जा रहा है, लेकिन राउल कास्त्रो ऐसी किसी आशंका को खारिज करते हैं। हालांकि वहां की जनता में कांग्रेस की घोषणाओं के बाद मिश्रित प्रतिक्रियाएं देखने मिली हैं। लोग प्रसन्न हैं कि अब उनके वित्तीय प्रबंध में राज्य का सीधा दखल नहीं रहेगा, लेकिन इसके साथ सशंकित भी हैं कि राज्य का नियंत्रण कम होने से उनका आर्थिक भविष्य कैसा होगा? रहा सवाल नेतृत्व परिवर्तन का, तो क्रांति के पांच दशक बाद अब तक वहां नई पीढ़ी का मजबूत नेतृत्व तैयार नहीं हुआ है। राउल कास्त्रो स्वयं अगले वर्ष 80 साल के होने जा रहे हैं। फिदेल कास्त्रो पहले ही अपने स्वास्थ्य के कारण मुख्यधारा से हट गए हैं। ऐसे में क्यूबा में स्थायित्व बनाए रखने, अमेरिकी दबाव से स्वतंत्र नीतियां बनाने, अर्थव्यवस्था की बदलती परिभाषाओं के अनुरूप देश को तैयार करने और आर्थिक संकट से बचाने के लिए युवा नेतृत्व की पंक्ति तैयार होना बेहद जरूरी है। कास्त्रो बंधु क्यूबा को इस क्रांति में कैसे सफल करते हैं यह देखने वाली बात होगी।
अमेरिका के जाल में फंसा पाकिस्तान
रणनीतिक रूप से अमेरिका और पाकिस्तान में जो दूरियां बढ़ी हैं, उनको पाट पाना अब संभव नहीं दिखता। ड्रोन हमलों को लेकर भी दोनों देशों के बीच विवाद है। इसमें चालक रहित विमान यानी ड्रोन के प्रयोग और सीआईए की तैनाती का मसला भी है और पाकिस्तान की ओर से जलालुद्दीन हक्कानी और लश्करे-तैयबा को दिए जाने वाले समर्थन का मसला भी..पनी सतही कूटनीति के सहारे खुद को ‘दबंग’ समझने वाले पाकिस्तान को अब उसकी हैसियत का अंदाजा लग जाएगा, क्योंकि कथित रूप से दुनिया का वास्तविक ‘दबंग’ माने जानेवाले अमेरिका की नजरें अब उसके विरुद्ध टेढ़ी हो गई हैं। इसका प्रमाण यही है कि अमेरिका न सिर्फ धीरे-धीरे पाकिस्तान को दी जानेवाली अपनी मदद घटाने लगा है, बल्कि अफगानिस्तान से सटे कबायली इलाकों के बहाने पाकिस्तान में ड्रोन हमले भी तेज कर दिए हैं। इसके एक संकेत यह भी हैं कि अमेरिकी चाल को समझकर मशहूर क्रिकेटर से राजनेता बने इमरान खान सरीखे कुछ लोग अमेरिका के विरुद्ध आंदोलन की तैयारी कर रहे हैं। लेकिन इससे कोई फर्क पड़ने वाला नहीं है, क्योंकि आज पाकिस्तान की सरजमीं पर शुरू हुआ अमेरिकी ‘खेल’ कोई साधारण नहीं, बल्कि उसकी खास रणनीति का हिस्सा जैसा प्रतीत हो रहा है। इससे लगता है कि पाकिस्तान लाख कोशिशों के बावजूद अमेरिका को अपने मन मुताबिक समझा पाने में अब सफल नहीं हो पाएगा।
गौरतलब है कि तालिबान का नकाब ओढ़े आतंकियों के खिलाफ अमेरिका को गुस्सा तब आया, जब 11 सितम्बर 2001 यानी 9/11 को अमेरिका में हमले हुए। तमाम जांच पड़ताल के बाद यह स्पष्ट हुआ कि इस मामले में अलकायदा का हाथ है। यह वही अलकायदा है, जिसे उस वक्त पाकिस्तान का भी संरक्षण प्राप्त था। यह वही अलकायदा है, जिसके मुखिया ओसामा बिन लादेन को पाकिस्तान व अफगानिस्तान समेत दुनिया के कई देशों के कुछ खास चरमपंथी अल्लाह के प्रतिनिधि के रूप में देखते हैं। यह वही अलकायदा है, जिससे संबद्ध जेहादी और तमाम बड़े नेता 11 सितम्बर 2001 यानी 9/11 को पाकिस्तान के शहर कराची में मौजूद थे और एक सुरक्षित मकान में बैठकर न्यूयार्क और वाशिंगटन का ताजा हाल टीवी पर देख रहे थे। यूं कहें कि उसी वक्त अमेरिकी शासकों-प्रशासकों के मन-मस्तिष्क में अफगानिस्तान-तालिबान के अलावा पाकिस्तान का भी कुरूप चेहरा उभरा था। नतीजा, अमेरिका ने तालिबान को तबाह करने की ठान ली। एक खास रणनीति के तहत इस कार्य में पाकिस्तानी सेना की मदद ली जाने लगी। इस तरह पाकिस्तानी सैनिकों की गोली से अफगानिस्तान और पाकिस्तान के वही चरमपंथी मारे जाने लगे, जिनसे पाकिस्तानी शासकों को मुहब्बत थी। खैर, अमेरिका ने पाकिस्तान को उसी वक्त स्पष्ट रूप से बता दिया था कि वह चरमपंथियों और आतंकियों को जड़ से खत्म करने में उसकी मदद करे। इसके एवज में अमेरिका द्वारा पाकिस्तान को प्रति वर्ष आठ अरब डॉलर की सहायता भी दी जाने लगी। अब जब नए सिरे से अमेरिका द्वारा दी जानेवाली मदद और पाकिस्तानी कार्रवाइयों की समीक्षा हुई तो स्पष्ट हो गया कि पाकिस्तान के कबायली इलाके मोहमंद में अब भी चरमपंथी जड़ें जमाए बैठे हैं। हालांकि कई बार विभिन्न हमलों में अमेरिकी और पाकिस्तानी सैनिकों के हाथों बड़ी तादाद में चमरपंथी मारे भी गए हैं, लेकिन अमेरिका का मानना है कि अब भी वहां आतंकवाद की फसल लहलहा रही है। यानी जिस उद्देश्य से अमेरिका ने पाकिस्तान की मदद शुरू की थी, वह उद्देश्य पूरा नहीं हुआ। परिणामस्वरूप उसने अब पाकिस्तानी को दी जानेवाली आर्थिक मदद फिलहाल रोक दी है। हालांकि आधिकारिक रूप से आर्थिक मदद रोकने का कारण कुछ और ही बताया गया है, लेकिन परोक्ष रूप से उसकी पाक के प्रति नाराजगी ही दिख रही है।
इसके अलावा अमेरिका और पाकिस्तान की खुफिया एजेंसियों के बीच का सार्वजनिक मतभेद अब सेना तक जा पहुंचा है। दोनों देशों के तमाम प्रयास के बावजूद आरंभ से ही काबुल में अफगान नॉर्दर्न एलायंस के काबिज होने का पाकिस्तानी सेना विरोध करती रही है। इनके बीच तब और मतभेद उभरे, जब अफगान-तालिबान के शीर्ष कमांडरों को पाकिस्तान ने पनाह दी। बाद में इन तालिबान ने ही वर्ष 2003 के बाद अफगानिस्तान में विद्रोह शुरू किया। नतीजतन अमेरिकी-नाटो सेना को डेढ़ लाख सैनिक तैनात करने पड़े और बाकायदा युद्ध शुरू हुआ। यह युद्ध पाकिस्तान में तालिबान के संगठित होने का कारण बना, जिसे पहले तो पाकिस्तान ने गंभीरता से नहीं लिया, लेकिन अब वह उसके लिए एक बड़ी समस्या बन गया है। अब पाकिस्तानी इस बात से डरने लगे हैं कि अमेरिका ने पाकिस्तान की जो सूचनाएं एकत्रित की हैं, उसका उपयोग करके वह एक दिन उसके परमाणु हथियार प्रणाली को भेद लेगा। दूसरी ओर, अमेरिका को डर है कि कुछ खास चरमपंथी संगठनों पर नकेल कसने से पाकिस्तान का इनकार करना अमेरिका और यूरोप में और चरमपंथी हमलों की वजह बन सकता है। इससे पाकिस्तान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई करने की मांग भी बढ़ सकती है। इस बात के पर्याप्त सबूत हैं कि पश्चिम और भारत में हुए कई आतंकी हमलों में या तो पाकिस्तानी तालिबान का हाथ रहा है या फिर लश्करे-तैयबा का।
यह भी कह सकते हैं कि अमेरिका तमाम प्रयास के बावजूद पाकिस्तान को यह समझाने में विफल रहा है कि कुछ चरमपंथी संगठनों से दोस्ती करना और कुछ से निपटना एक ऐसी नीति है, जो देश के और वैश्विक सुरक्षा के लिए आवश्यक है। खैर, रणनीतिक रूप से अमेरिका और पाकिस्तान में जो दूरियां बढ़ी हैं, उनको पाट पाना अब संभव नहीं दिखता। ड्रोन हमलों को लेकर भी दोनों देशों के बीच विवाद है। इसमें चालक रहित विमान यानी ड्रोन के प्रयोग और सीआईए की तैनाती का मसला भी है और पाकिस्तान की ओर से जलालुद्दीन हक्कानी और लश्करे-तैयबा को दिए जाने वाले समर्थन का मसला भी।
गौरतलब है कि तालिबान का नकाब ओढ़े आतंकियों के खिलाफ अमेरिका को गुस्सा तब आया, जब 11 सितम्बर 2001 यानी 9/11 को अमेरिका में हमले हुए। तमाम जांच पड़ताल के बाद यह स्पष्ट हुआ कि इस मामले में अलकायदा का हाथ है। यह वही अलकायदा है, जिसे उस वक्त पाकिस्तान का भी संरक्षण प्राप्त था। यह वही अलकायदा है, जिसके मुखिया ओसामा बिन लादेन को पाकिस्तान व अफगानिस्तान समेत दुनिया के कई देशों के कुछ खास चरमपंथी अल्लाह के प्रतिनिधि के रूप में देखते हैं। यह वही अलकायदा है, जिससे संबद्ध जेहादी और तमाम बड़े नेता 11 सितम्बर 2001 यानी 9/11 को पाकिस्तान के शहर कराची में मौजूद थे और एक सुरक्षित मकान में बैठकर न्यूयार्क और वाशिंगटन का ताजा हाल टीवी पर देख रहे थे। यूं कहें कि उसी वक्त अमेरिकी शासकों-प्रशासकों के मन-मस्तिष्क में अफगानिस्तान-तालिबान के अलावा पाकिस्तान का भी कुरूप चेहरा उभरा था। नतीजा, अमेरिका ने तालिबान को तबाह करने की ठान ली। एक खास रणनीति के तहत इस कार्य में पाकिस्तानी सेना की मदद ली जाने लगी। इस तरह पाकिस्तानी सैनिकों की गोली से अफगानिस्तान और पाकिस्तान के वही चरमपंथी मारे जाने लगे, जिनसे पाकिस्तानी शासकों को मुहब्बत थी। खैर, अमेरिका ने पाकिस्तान को उसी वक्त स्पष्ट रूप से बता दिया था कि वह चरमपंथियों और आतंकियों को जड़ से खत्म करने में उसकी मदद करे। इसके एवज में अमेरिका द्वारा पाकिस्तान को प्रति वर्ष आठ अरब डॉलर की सहायता भी दी जाने लगी। अब जब नए सिरे से अमेरिका द्वारा दी जानेवाली मदद और पाकिस्तानी कार्रवाइयों की समीक्षा हुई तो स्पष्ट हो गया कि पाकिस्तान के कबायली इलाके मोहमंद में अब भी चरमपंथी जड़ें जमाए बैठे हैं। हालांकि कई बार विभिन्न हमलों में अमेरिकी और पाकिस्तानी सैनिकों के हाथों बड़ी तादाद में चमरपंथी मारे भी गए हैं, लेकिन अमेरिका का मानना है कि अब भी वहां आतंकवाद की फसल लहलहा रही है। यानी जिस उद्देश्य से अमेरिका ने पाकिस्तान की मदद शुरू की थी, वह उद्देश्य पूरा नहीं हुआ। परिणामस्वरूप उसने अब पाकिस्तानी को दी जानेवाली आर्थिक मदद फिलहाल रोक दी है। हालांकि आधिकारिक रूप से आर्थिक मदद रोकने का कारण कुछ और ही बताया गया है, लेकिन परोक्ष रूप से उसकी पाक के प्रति नाराजगी ही दिख रही है।
इसके अलावा अमेरिका और पाकिस्तान की खुफिया एजेंसियों के बीच का सार्वजनिक मतभेद अब सेना तक जा पहुंचा है। दोनों देशों के तमाम प्रयास के बावजूद आरंभ से ही काबुल में अफगान नॉर्दर्न एलायंस के काबिज होने का पाकिस्तानी सेना विरोध करती रही है। इनके बीच तब और मतभेद उभरे, जब अफगान-तालिबान के शीर्ष कमांडरों को पाकिस्तान ने पनाह दी। बाद में इन तालिबान ने ही वर्ष 2003 के बाद अफगानिस्तान में विद्रोह शुरू किया। नतीजतन अमेरिकी-नाटो सेना को डेढ़ लाख सैनिक तैनात करने पड़े और बाकायदा युद्ध शुरू हुआ। यह युद्ध पाकिस्तान में तालिबान के संगठित होने का कारण बना, जिसे पहले तो पाकिस्तान ने गंभीरता से नहीं लिया, लेकिन अब वह उसके लिए एक बड़ी समस्या बन गया है। अब पाकिस्तानी इस बात से डरने लगे हैं कि अमेरिका ने पाकिस्तान की जो सूचनाएं एकत्रित की हैं, उसका उपयोग करके वह एक दिन उसके परमाणु हथियार प्रणाली को भेद लेगा। दूसरी ओर, अमेरिका को डर है कि कुछ खास चरमपंथी संगठनों पर नकेल कसने से पाकिस्तान का इनकार करना अमेरिका और यूरोप में और चरमपंथी हमलों की वजह बन सकता है। इससे पाकिस्तान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई करने की मांग भी बढ़ सकती है। इस बात के पर्याप्त सबूत हैं कि पश्चिम और भारत में हुए कई आतंकी हमलों में या तो पाकिस्तानी तालिबान का हाथ रहा है या फिर लश्करे-तैयबा का।
यह भी कह सकते हैं कि अमेरिका तमाम प्रयास के बावजूद पाकिस्तान को यह समझाने में विफल रहा है कि कुछ चरमपंथी संगठनों से दोस्ती करना और कुछ से निपटना एक ऐसी नीति है, जो देश के और वैश्विक सुरक्षा के लिए आवश्यक है। खैर, रणनीतिक रूप से अमेरिका और पाकिस्तान में जो दूरियां बढ़ी हैं, उनको पाट पाना अब संभव नहीं दिखता। ड्रोन हमलों को लेकर भी दोनों देशों के बीच विवाद है। इसमें चालक रहित विमान यानी ड्रोन के प्रयोग और सीआईए की तैनाती का मसला भी है और पाकिस्तान की ओर से जलालुद्दीन हक्कानी और लश्करे-तैयबा को दिए जाने वाले समर्थन का मसला भी।
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