Wednesday, June 29, 2011

नेतृत्व और वैचारिक बदलाव के लिए तैयार हो रहा चीन

क्या यह अरब देशों में हो रही जनक्रांतियों का नतीजा है? कभी दुनिया के सबसे शक्तिशाली कम्युनिस्ट देश रहे सोवियत संघ के विघटन से चीन सबक लेना चाहता है। सत्ताधारी चीनी कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीसी) सोवियत संघ जैसे विभाजन से बचने के लिए मुख्य नेतृत्व में बदलाव के साथ नए वैचारिक बदलाव की तैयारी कर रही है। उल्लेखनीय है कि सोवियत कम्युनिस्ट पार्टी के 74 साल के शासन के बाद 1991 में सोवियत संघ कई राष्ट्रों में विभाजित हो गया था। इस साल सीपीसी के 90वें स्थापना दिवस और सत्ता के 62 साल पूरे होने पर पार्टी के अधिकारियों ने कहा है, सीपीसी 60 वर्ष के घबराहट (नर्वस सिक्सटी) के दौर से गुजर रही है। सीपीसी के मुख्य अंग चीन एक्जिक्यूटिव लीडर एकेडमी के उपाध्यक्ष शाओ जिंतांग ने पत्रकारों से कहा, सोवियत कम्युनिस्ट पार्टी का 74 वर्ष के शासन के बाद हारना चीन के लिए बड़ा सबक है। उन्होंने कहा, सीपीसी उच्च और निम्न वर्ग के बीच खाई को पाटने के साथ मुख्य नेतृत्व में बदलाव की तैयारी कर रहा है। ऐसा माना जा रहा है कि इस वर्ष ट्यूनीशिया, मिस्र, लीबिया, जॉर्डन और यमन में जनक्रांति से चीन का नेतृत्व बेहद डरा हुआ है। चीन के शिनजिंयाग प्रांत, तिब्बत, हांगकांग और मकाउ में पहले से विरोध के स्वर उठ रहे हैं। ऐसे में पार्टी नेतृत्व अपनी नीतियों में भारी बदलाव को ही विकल्प मानकर चल रहा है। अगले वर्ष राष्ट्रपति हू जिंताओ और प्रधानमंत्री वेन जियाबाओ का दूसरा कार्यकाल भी पूरा हो जाएगा। इस साल चीन सरकार ने आंतरिक सुरक्षा के लिए 95 सौ करोड़ डॉलर (लगभग चार लाख 27 हजार करोड़ रुपये) का बजट पारित किया है, जो रक्षा विभाग के बजट (91 सौ डॉलर) से कही ज्यादा है। खास बात यह है कि सीपीसी पर विभाजन और सत्ता छूटने का का डर इतना हावी हो चुका है कि वह अपने संस्थापक माओ की नीतियों को भी दरकिनार करने लगी है। ननचांग शहर के उप मेयर और पार्टी के वरिष्ठ सदस्य शाओ गुआन का कहना है, चीन के इतिहास को माओ से ज्यादा किसी ने नहीं दिया, लेकिन वह भगवान नहीं थे। उन्होंने कुछ गलतियां की, जिन्हें हमने सुधारा है।

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