Wednesday, June 1, 2011

नापाक चेहरे की अनदेखी

लेखक हेडली के कबूलनामे के बावजूद पाक के संदर्भ में अमेरिका की आंखें न खुलने पर हैरत जता रहे हैं...
ओसामा बिन लादेन के मारे जाने के बाद पाकिस्तान की साख पर लगा बट्टा और गहराता जा रहा है। इसका एक कारण तो दुनिया को यह यकीन न होना है कि ओसामा के छिपे होने की जानकारी पाकिस्तानी सेना अथवा उसकी खुफिया एजेंसी को नहीं थी और दूसरा कारण नित-नए हो रहे खुलासे हैं। मुंबई हमले की साजिश में शामिल रहे पाकिस्तानी मूल के अमेरिकी आतंकी डेविड कोलमैन हेडली ने शिकागो की एक अदालत में जिस तरह यह कहा कि यह साजिश आइएसआइ और जमातउददावा ने रची थी और उसमें पाक नौसेना के अधिकारी भी शामिल थे तथा उसे खुद आइएसआइ के अफसर ने प्रशिक्षण दिया उसके बाद पाकिस्तान के इस दावे पर भरोसा करना और मुश्किल है कि आइएसआइ आतंकियों की मददगार संस्था नहीं है। बावजूद इसके यह कहना कठिन है कि अमेरिका की आंखें खुलेंगी, क्योंकि अचानक पाकिस्तान पहुंचकर अमेरिकी विदेशमंत्री हिलेरी क्लिंटन ने ओसामा के मामले में जिस तरह पाक के शीर्ष नेतृत्व को क्लीनचिट दी उससे यही लगता है कि अमेरिकी प्रशासन पाकिस्तान के असली चेहरे से परिचित होने के लिए तैयार नहीं। बिना किसी जांच के यह क्लीनचिट यही बताती है कि अमेरिका पाकिस्तान की आतंकवाद को बढ़ावा देने वाली हरकतों की अनदेखी करते रहना चाहता है। यह हास्यास्पद है कि एक तरफ अमेरिका की आंतरिक सुरक्षा मंत्री नई दिल्ली आकर यह कहती हैं कि लश्कर अलकायदा की तरह खतरनाक है और दूसरी ओर अमेरिकी विदेश मंत्री इस्लामाबाद जाकर लश्कर को पालने पोसने वाले पाक नेतृत्व को क्लीनचिट देती हैं। यदि अमेरिका को लश्कर अल कायदा की तरह नजर आने लगा है तो फिर आतंकवाद के खिलाफ पाक को सहयोगी मानने का क्या मतलब? पिछले एक दशक में अमेरिका ने पाकिस्तान को जिस तरह आंख मूंद कर सैनिक और आर्थिक सहायता दी है उसकी विश्व कूटनीति में मिसाल मिलना मुश्किल है। अमेरिका ने ऐसा इसलिए तो किया ही, क्योंकि उसे अफगानिस्तान में उसके सहयोग की आवश्यकता थी। इसके अतिरिक्त उसने पाकिस्तान के जरिये भारतीय उपमहाद्वीप में अपना वर्चस्व कायम करने के लिए भी उसे मदद दी। अमेरिका ने पाकिस्तान को तब भी बेहिसाब मदद दी थी जब अफगानिस्तान में तत्कालीन सोवियत संघ की सेनाओं ने डेरा डाल रखा था। उस दौरान पाकिस्तान के जरिये जिन मुजाहिदों को सोवियत सेनाओं से लड़ने में मदद दी गई उनमें से ही अनेक आज किस्म-किस्म के आतंकी संगठन चला रहे हैं। इनमें तालिबान भी शामिल है। अमेरिकी राष्ट्रपति और साथ ही विदेश मंत्री पाकिस्तान से बार-बार यह कह रहे हैं कि वह भारत को हौवा मानने से बाज आए, लेकिन ऐसा होने के आसार कम ही हैं। पाकिस्तान भारत विरोध की अपनी सोच का शायद ही परित्याग करे, क्योंकि एक तो अमेरिका केवल उपदेश देने तक सीमित है और दूसरे पाकिस्तान अंध भारत विरोध से ग्रस्त है। दरअसल उसका जन्म ही भारत से नफरत के कारण हुआ और इस नफरत में कश्मीर समस्या की जड़ छिपी हुई है। पाकिस्तान कश्मीर समस्या के समाधान के नाम पर उसे हड़पने की मंशा पाले हुए है। इसका ताजा प्रमाण पाकिस्तानी प्रधानमंत्री यूसुफ रजा गिलानी ने मुजफ्फराबाद में एक सभा को संबोधित करते हुए यह कहकर दिया कि जब तक कश्मीर समस्या का समाधान नहीं होता तब तक इस क्षेत्र में शांति नहीं कायम हो सकती। इसका एक अर्थ यह है कि गिलानी यह चाहते ही नहीं कि भारतीय उपमहाद्वीप में शांति स्थापित हो, क्योंकि फिर पाकिस्तान को अमेरिका से न तो हथियार मिलेंगे और न ही अरबों डालर। अब यह किसी से छिपा नहीं कि पाकिस्तानी सेना और शासन के लोग अमेरिकी मदद का मनमाना इस्तेमाल करते हैं। इन स्थितियों में अमेरिका के लिए यह आवश्यक है कि वह पाकिस्तान संबंधी अपनी नीति पर फिर से विचार करे। भारत को भी समझ लेना चाहिए कि सांस्कृतिक अथवा व्यापारिक रिश्ते बढ़ाकर पाकिस्तान से कुछ हासिल होने वाला नहीं है। उसे पाकिस्तान में फल-फूल रहे आतंकी संगठनों के खिलाफ कार्रवाई के लिए नए सिरे से घेरेबंदी करनी चाहिए। पाकिस्तान ने भारत की ओर से भेजी गई भगोड़ों की सूची खारिज कर दी है। इसमें भारत की भी चूक है, क्योंकि इस सूची में कुछ ऐसे अपराधियों के नाम थे जो भारत में भी रह रहे थे। इस गफलत से भारत की कूटनीति लड़खड़ा गई, लेकिन इसकी भरपाई की जा सकती है, क्योंकि दुनिया का सबसे खतरनाक आतंकी दाऊद इब्राहिम अभी भी पाकिस्तान में है। उसके रिश्ते आइएसआइ से हैं और वह उनके जरिये हथियारों और मादक पदार्थो की तस्करी के काले धंधे में लिप्त है। इसके भी प्रमाण आ चुके हैं कि उसकी साठगांठ लश्कर और अन्य आतंकी संगठनों से भी है। मुंबई हमले में भी उसकी कोई न कोई भूमिका हो सकती है। वैसे भी यह तथ्य है कि एक समय मुंबई में ही रहने वाले इस माफिया सरगना ने 1993 में यहां बम धमाके कराए थे। जब अमेरिका भी दाऊद को खतरनाक आतंकी मान रहा है तब भारत के लिए यह आवश्यक हो जाता है कि वह अपने इस सबसे बड़े दुश्मन की घेरेबंदी कर पाकिस्तान को बेनकाब करे। भारत को पाकिस्तान को नियंत्रित करने के लिए विश्व समुदाय की भी मदद लेनी होगी। विश्व समुदाय इससे परिचित है कि पाकिस्तान ने चीन की गुपचुप मदद से परमाणु हथियार बनाए हैं और उसकी तकनीक उत्तर कोरिया को पहुंचाई है। अब तो दुनिया को पाकिस्तान के परमाणु हथियारों के आतंकियों के हाथ लगने की आशंका सता रही है। आतंकियों ने कराची के जिस नौसैनिक अड्डे पर सबसे बड़ा हमला बोला उससे कुछ किलोमीटर की दूरी पर पाकिस्तान ने परमाणु हथियार जमा कर रखे हैं। माना जा रहा है कि नौसैनिक अड्डे पर हमला करने वाले आतंकियों की सेना के कुछ लोगों से साठगांठ थी। अब यह संदेह और गहरा हो गया है कि आतंकियों की ऐसी ही साठगांठ परमाणु हथियारों की निगरानी करने वाले लोगों से भी हो सकती है। वैसे तो अमेरिका ने यह चेतावनी दी है कि अपनी सुरक्षा के लिए खतरा होने की स्थिति में वह पाकिस्तान के खिलाफ एबटाबाद जैसी कार्रवाई करेगा, लेकिन यह आसान नहीं। यदि अमेरिका ऐसा करता है तो पाकिस्तान घायल जानवर की तरह पलटवार कर सकता है। वह भारत को भी निशाने पर ले सकता है और उसके यहां पल रहे आतंकी संगठन यूरोप और अमेरिका में हमला कर सकते हैं। पाकिस्तान की गिरती साख और बदहाल स्थिति भारत के लिए खतरा है। इस खतरे का संकेत दिल्ली में हाईकोर्ट के बाहर बम विस्फोट से मिला। यह विस्फोट भले ही घातक न रहा हो, लेकिन उससे यह तो पता चलता ही है कि आतंकियों का दुस्साहस पहले की तरह कायम है। इन आतंकियों को पाकिस्तान से हर तरह का समर्थन मिलने का सिलसिला भी कायम है। इसका एक प्रमाण कश्मीर घाटी में आतंकियों ऐसे में भारत को और अधिक सतर्क होकर पाकिस्तान संबंधी अपनी नीति पर विचार करना चाहिए, साथ ही उसे पाकिस्तान संबंधी अमेरिका की दोषपूर्ण नीति के लिए ओबामा प्रशासन से भी दो टूक बात करनी चाहिए।

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