Tuesday, June 14, 2011

संविधान सभा के चक्रव्यूह में उलझा नेपाल

नेपाल की राजनीति में तारीख पर तारीख का सिलसिला लगता है संविधान सभा की मजबूरी बन चुका है? इसी का नतीजा है कि एक बार फिर नेपाल में संविधान सभा की अवधि तीन महीने के लिए बढ़ा दी गई है। ये तीन महीने भी यों निकल जाएंगे और फिर तारीख पर तारीख का सिलसिला शुरू होगा। हालांकि संविधान सभा की अवधि बढ़ाने के लिए इसकी वैधानिकता पर सर्वोच्च न्यायालय की मुहर भी लग चुकी थी। सात महीने की सरकारविहीनता के बाद देश को जो सरकार मिली, वह तो और भी निरीह और लाचार है। झलनाथ खनाल के प्रधानमंत्री बनने से लगा था कि महीनों से कायम राजनीतिक गतिरोध और रिक्तता खत्म हो जाएगी, लेकिन ऐसा हो नहीं सका है। सरकार चले या नहीं, संविधान बने या नहीं, इससे नेपाल सरकार को मतलब भी नहीं है। तीन महीने के अवधि विस्तार ने आश्वस्त कर दिया है कि संविधान-निर्माण हो या नहीं, सरकार बनाने-बिगाड़ने का खेल होता रहेगा। नेपाल में पुन: संविधान सभा की अवधि बढ़ा दी जाएगी। नेपाल की जनता यह सोचकर आश्वस्त रहेगी कि देश सरकारविहीन नहीं है। बहरहाल, माओवादियों के कंधे पर चढ़कर अपनी ही पार्टी के वरिष्ठ नेता माधव कुमार नेपाल को सत्ताच्युत करते हुए प्रधानमंत्री बनने में सफल हुए नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी (एमाले) अध्यक्ष झलनाथ खनाल अब तक के सबसे असफल प्रधानमंत्री साबित हुए हैं। खनाल ने अपने कार्यकाल के दौरान विरोधियों को अपना बनाना तो दूर, अपनों को भी विरोधी बना लिया है। एमाले के जिन नेताओं ने खनाल को प्रधानमंत्री बनाने के लिए दिन-रात लॉबिंग की थी, बालुवाटार में आज उनकी उपस्थिति भी नहीं होती। जिस समझौते के बल पर माओवादियों ने खनाल को प्रधानमंत्री बनाने के लिए समर्थन दिया था, उसी समझौते को न मानने की वजह से आज माओवादी खेमे में भूचाल-सा आ गया है। आलम यह है कि जिस पार्टी के नेता खनाल को सत्ता में नेतृत्व दिलाने का दावा कर रहे थे, वही पार्टी अब खनाल का विकल्प तलाशने लगी है। माओवादियों की बात कुछ देर के लिए छोड़ भी दी जाए तो अब खनाल की पार्टी से ही उनके इस्तीफे की मांग होने लगी है। मंत्रिमंडल के तीसरे विस्तार में जिस तरह खनाल ने पार्टी के निर्णय और सहमति के विपरीत अपने पक्षधर नेताओं को ही मंत्री बनाया है, उससे पार्टी के दो प्रभावशाली नेता अब उन्हें प्रधानमंत्री पद से हटाने की मुहिम में जुट गए हैं। पूर्व प्रधानमंत्री माधव कुमार नेपाल और केपी शर्मा ओली प्रधानमंत्री खनाल द्वारा मनमाने ढंग से मंत्रिमंडल का विस्तार करने व माओवादियों को गृह मंत्रालय देने पर उनके (प्रधानमंत्री) इस्तीफे की मांग पर अड़ गए हैं। नेपाली राजनीति में पिछले तीन दशकों से सक्रिय प्रधानमंत्री खनाल दिन-प्रतिदिन अवसान की तरफ बढ़ रहे हैं। सरकार के संचालन की बात हो या फिर पार्टी चलाने की, दोनों में ही खनाल असफल साबित हो रहे हैं। उन पर पार्टी के निर्णयों और उसकी नीति के विपरीत चलने का आरोप लगातार लग रहा है। पार्टी के भीतर और बाहर भी उनकी कड़ी आलोचना हो रही है। शांति प्रक्रिया व संविधान निर्माण कार्य में भी इस दौरान कोई उल्लेखनीय कार्य नहीं हो पाया है। संवैधानिक समिति में विवाद कायम है। संसद लगातार अवरुद्ध रही, संविधान से जुड़े विवाद को सुलझाने के लिए गठित उप-समिति की समय-सीमा दूसरी बार बढ़ाई गई, लेकिन एक दिन भी बैठक नहीं हो पाई। तीसरी बार के लिए भी समय-सीमा बढ़ाए जाने पर सहमति हुई, लेकिन मसला हल हुआ भी तो केवल तीन महीने के लिए। उधर, सेना समायोजन से संबंधी प्रक्रिया जस की तस पड़ी है। इन्हीं सब कारणों से खनाल सरकार की उलटी गिनती शुरू हो गई है। वैसे भी झलनाथ खनाल और प्रचंड अपनी ही पार्टी के लोगों से बगावत कर एक षड्यंत्र के तहत प्रधानमंत्री बने। इससे नेपाल में राजनीति संकट के और गहराने की आशंका है। कुछ लोग यह भी कहते हैं कि झलनाथ खनाल एक गोपनीय समझौते के तहत प्रधानमंत्री बने हैं। भविष्य में उनकी स्थिति एक कठपुतली प्रधानमंत्री से अधिक नहीं होगी। माओवादियों तथा एमाले अध्यक्ष के बीच हुए सात सूत्रीय समझौते को खनाल के बतौर प्रधानमंत्री निर्वाचित होने तक छुपाकर रखा गया, जिसकी नेपाल में चौतरफा आलोचना हो रही है। विपक्षी दल ही नहीं, बल्कि उनकी अपनी पार्टी के नेतागण भी इसके खिलाफ हैं। बता दें कि 30 मई 2009 को आयोजित इस संविधान सभा की पहली बैठक बेहद उत्साहजनक रही, लेकिन उसके बाद संविधान सभा के सदस्यों में बैठक के प्रति उत्साह घटता गया। बडे़ दलों के शीर्ष नेताओं की अनुपस्थिति से उनके दल के संविधान सभा सदस्यों को भी बढ़ावा मिला और वे संविधान सभा की बैठक में भाग लेने के बजाए संविधानेतर कार्यो तथा विदेशी दौरों में ज्यादा दिलचस्पी लेने लगे। उन्होंने इस संवैधानिक व्यवस्था की कि संविधान सभा की बैठक में लगातार दस बार अनुपस्थित रहने पर सदस्यता समाप्त हो सकती है, इसकी भी कोई परवाह नहीं की। गौरतलब है कि संविधान सभा का कार्यकाल बढ़ाने के लिए दूसरी राजनीतिक पार्टियां लगातार विरोध कर रही हैं। इसी संदर्भ में 19 मई को नेपाली कांग्रेस द्वारा यह कदम उठाया गया। नेपाली कांग्रेस संविधान सभा को बढ़ाए जाने का तब तक समर्थन नहीं करना चाहती थी, जब तक कि माओवादी लड़ाकों के नेपाली सेना में शामिल करने के मुद्दे को लेकर कोई ठोस निर्णय नहीं ले लिया जाता है। क्योंकि नेपाली कांग्रेस केवल 4,000 लड़ाके नेपाली सेना में शामिल करने के लिए कह रही है, जबकि माओवादी नेता सभी लड़ाको को सेना में शामिल करना चाहते हैं। नेपाली कांग्रेस लगभग 20 छावनियों की जांच कराना चाहती है, जहां माओवादी लड़ाकों को रखा गया है। साथ ही नेपाली कांग्रेस अपनी इस मांग पर भी अड़ी हुई कि माओवादियों द्वारा विद्रोह के वक्त लूटी गई संपत्तियों को वापस कर दिया जाए। दूसरी ओर राष्ट्रीय प्रजातंत्र पार्टी ने भी 19 मई को नेपाल में राजशाही बहाली की मांग करते हुए काठमांडू में एक जुलूस तक निकाला, जिसका नेतृत्व पूर्व गृहमंत्री एवं संविधान सभा के सदस्य कमल थापा कर रहे थे। बहरहाल, यह तो तय है कि इस साल भी संविधान लेखन की प्रक्रिया पूर्ण करना संभव नहीं है। नेपाली सांसद वर्तमान संविधान सभा के माध्यम से एक जनकल्याणकारी संविधान बनाने के बजाए सत्ता के कुटिल शह और मात के खेल में मशगूल हैं। स्पष्ट रूप से घड़ी की सूइयां संविधान सभा की असफलता का संकेत कर रही हैं। संविधान सभा के जरिए एक नए संविधान की जरूरत इसलिए नहीं महसूस की गई है कि देश में संवैधानिक रिक्तता थी, बल्कि इसलिए कि विगत के संविधान निर्माण प्रक्रिया में नागरिक सहभागिता के अभाव में आम जनता की इच्छाओं और जरूरतों का उचित संबोधन नहीं हुआ था। नए बनने वाले संविधान में पिछली गलतियों को सुधारते हुए संविधान प्रक्रिया में आम नागरिकों की पूर्ण सहभागिता हो, ताकि नई राज्य व्यवस्था के सभी स्तरों पर स्वामित्व, अपनत्व तथा पहुंच का समान अवसर सभी समुदाय को मिल सके। जन आंदोलन द्वारा प्राप्त नेपाली संविधान सभा के गठन की पृष्ठभूमि पर गौर करें तो स्पष्ट होता है कि इसके गठन के समय राजनीतिक दलों और सरोकार वालों के बीच बिना गहन विचार-विमर्श के इसे कार्यरूप देने की जल्दबाजी की गई। लापरवाही, बेईमानी तथा छल-कपट की नींव पर आधारित तथा संचालित यह संविधान सभा शांति स्थापना के बजाय आज नेपाली जनता के लिए अभिशाप बनती जा रही है। संविधान सभा सभासदों के आक्रोश और धमकी देने वालों की सभा में बदलती जा रही है। दो साल क्या, तीन साल बीत चुके हैं संविधान सभा के गठन को, लेकिन अभी तक संवैधानिक समिति एकीकृत प्रारूप भी नहीं बना सकी है। संविधान सभा का लेखा-जोखा देखा जाए तो पिछले तीन साल में कुल 108 बैठकें हुई हैं। काम सिर्फ 104 दिन ही हुए हैं। इस दौरान 430 सभासदों ने विदेश की यात्राएं की हैं। इन सब प्रक्रिया में अब तक सभासदों के वेतन के तौर पर 1 अरब 36 करोड़ रुपये, सभामुख तथा उपसभामुख के वेतन-भत्ते पर 1 करोड़ 36 लाख रुपये खर्च हो चुके हैं। मौजूदा समय में नेपाल में संविधान सभा द्वारा संविधान बनाना केवल एक मजाक बन कर रह गया है। आशंका तो यह है कि आगे चलकर नेपाल एक फिर जन आंदोलन की आग में न झुलस जाए। (लेखिका स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)

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