Wednesday, June 15, 2011

शिकागो फैसले के तीन सबक

लेखक तहव्वुर राणा के संदर्भ में अदालत के फैसले में पाक और अमेरिका के समीकरणों की भूमिका देख रहे हैं…

तहव्वुर राणा को मुंबई हमले में लिप्त होने के आरोप से बरी करने के शिकागो अदालत के फैसले से भारत को तीन महत्वपूर्ण सबक मिले हैं। पहला तो यह कि नई दिल्ली को यह अपेक्षा ही नहीं रखनी चाहिए थी कि मुंबई हमलों के दोषियों को सजा दिलाने के लिए अमेरिका आइएसआइ की भूमिका को कठघरे में खड़ा करेगा। अमेरिका की विदेश नीति के अपने हित और मजबूरियां हैं। ओसामा बिन लादेन को मारने के बाद से अमेरिका पाकिस्तान में चार प्रतिनिधिमंडल भेज चुका है, जिसमें विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन के नेतृत्व में भेजा गया प्रतिनिधिमंडल भी शामिल है। इन ताबड़तोड़ दौरों का मंतव्य पाकिस्तान से अपने रिश्तों को सुधारना है। वास्तव में सीआइए के निदेशक लियोन पेनेटा, जो पहली जुलाई को रॉबर्ट गेट्स के स्थान पर रक्षा मंत्री बनने जा रहे हैं, ने इस्लामाबाद को एक सकारात्मक संदेश दिया था कि अमेरिका भरोसेमंद और रचनात्मक संबंधों की पुनस्र्थापना चाहता है। वाशिंगटन पाकिस्तान के आतंकवाद से लड़ने के प्रयासों से खुश नहीं है, किंतु फिर भी तीसरे देश भारत में आइएसआइ की आतंक में भूमिका को रेखांकित करने का काम वह सबसे अंत में ही करना चाहेगा। फिलहाल तो सीआइए को आइएसआइ की पहले से कहीं अधिक आवश्यकता है, क्योंकि अमेरिका अफगान तालिबान के साथ हाथ मिलाना चाहता है, जिसका शीर्ष नेतृत्व पाकिस्तान में छिपा हुआ है। दूसरा सबक खुद शिकागो मुकदमे के बारे में है। अभियोजन पक्ष फेडरल ब्यूरो ऑफ इनवेस्टीगेशन (एफबीआइ) के गूढ़ राजनीतिक लक्ष्य हैं। वह तहव्वुर राणा को मुंबई हमले के आरोप के बजाय इससे कम गंभीर डेनमार्क संबंधी आरोपों में दोषी ठहराना चाहता था। यही नहीं, अभियोजन अपने स्टार गवाह डेविड हेडली के माध्यम से आइएसआइ के आला अधिकारियों को मुंबई हमले से संबद्ध नहीं दर्शाना चाहता था। हेडली को निर्देश देने वाले एक कनिष्ठ आइएसआइ अधिकारी मेजर इकबाल को दोषी ठहराया गया। अभियोजन पक्ष ने जरा भी प्रयास नहीं किया कि इस मामले की तह तक जाकर मुंबई हमले में आइएसआइ के बड़े अधिकारियों की संलिप्तता सिद्ध करे। असलियत में हेडली ने यह दावा करके अपने बयान का ही खंडन कर दिया कि आइएसआइ के बड़े अधिकारियों को मुंबई हमले के बारे में कोई जानकारी नहीं थी। फिर भी इसने स्वीकार किया कि इकबाल का कमांडिंग अधिकारी और आइएसआइ का संबंधित विभाग मुंबई हमले की योजना के बारे में जानता था। यद्यपि इस मुकदमे से यह बात तो सिद्ध हो ही जाती है कि पाकिस्तानी सेना के वर्तमान व पूर्व अधिकारी लश्करे-तैयबा की सहायता कर रहे थे। एफबीआइ इकबाल से आगे अन्य अधिकारियों की भूमिका की तह तक नहीं जाना चाहती थी। अभियोजन ने एक लश्कर नेता साजिद मीर के पूर्व के सैन्य संबंधों की पड़ताल से भी मना कर दिया। साजिद मीर ही मंुबई हमले के दौरान आतंकियों को लोगों को मारने का निर्देश दे रहा था। मूल सवाल की पड़ताल ही नहीं की गई कि अगर एफबीआइ हेडली को आतंकी गतिविधियों में लिप्त रहने से समय पर रोक पाती तो क्या मुंबई हमले को रोका जा सकता था? हेडली के लश्कर के साथ संबंधों को लेकर सात साल में छह चेतावनी मिलने के बाद भी एफबीआइ ने हेडली को गिरफ्तार नहीं किया, क्योंकि वह अमेरिकी एजेंट के रूप में काम कर रहा था। पूर्व ड्रग तस्कर हेडली आठवें और नवें दशक में गिरफ्तार भी हो चुका था। मुंबई हमले के बाद भी एफबीआइ ने उसे तब तक अपने साथ रखा जब तक पैगंबर मुहम्मद का कार्टून छापने वाले डेनमार्क के एक अखबार पर 2009 में उसने हमले का षडयंत्र नहीं रचा। एफबीआइ ने हेडली के अमेरिकी खुफिया एजेंसी से रिश्तों के संबंध में साक्ष्यों को किसी दुर्घटनावश नहीं दबाया था। इस तरह यह महत्वपूर्ण सवाल यक्ष प्रश्न ही बनकर रह गया कि क्या मुंबई हमलों को रोका जा सकता था? शिकागो फैसला हेडली को लेकर भारत और अमेरिका के बीच पुराने घावों को फिर से हरा कर सकता है। इनमें हेडली की समय से गिरफ्तारी न करना और उससे हासिल महत्वपूर्ण खुफिया जानकारी को भारत के साथ साझा न करना शामिल है। यही नहीं, 2009 में शिकागो में उसकी गिरफ्तारी के भी काफी समय बाद ही अमेरिकी अधिकारियों ने भारत को उससे सीमित पूछताछ की इजाजत दी। हेडली को दी गई रियायत के कारण ही वह मृत्युदंड और भारत में प्रत्यर्पण से बच पाया। मुंबई हमलों के दोषियों की रिहाई का न्यूयॉर्क में आइएसआइ के खिलाफ चल रहे एक मामले पर भी असर पड़ेगा। इस मामले में आइएसआइ प्रमुख को प्रतिवादी बनाया गया है। इससे इस्लामाबाद को वाशिंगटन के साथ सौदेबाजी का मौका मिल गया। तीसरा सबक है मुंबई में दुस्साहसिक हमले के दोषियों को सजा दिलाने के प्रति भारत की धीमी प्रतिक्रिया। मुंबई हमले के बाद भारत ने छोटे से छोटा कदम भी नहीं उठाया। इसके बजाय इसने एक नए तरह के साक्ष्य बमों पर भरोसा किया। नई दिल्ली ने पाकिस्तान स्थित आतंकियों की सूची भी जारी की। क्या इस तरह के नौकरशाही अभ्यास के बल पर पाकिस्तान अपने सामरिक लाभ को छोड़ देगा और उस विदेश नीति को त्याग देगा जो जिहादी एडवेंचर पर निर्भर है? इसका जवाब हाल ही में पाकिस्तानी विदेश सचिव ने दिया है कि ये पुलिंदे साक्ष्य के बजाय दिलचस्प साहित्य हैं। वास्तव में, लादेन की मौत के बाद उन्होंने भारत की इस मांग की खिल्ली उड़ाई कि इस्लामाबाद को मुंबई हमले के तमाम दोषियों को गिरफ्तार कर उनके खिलाफ मामला चलाना चाहिए। कुल मिलाकर बाजी पाकिस्तान के हाथ ही रही है। पाकिस्तान में रह रहे मुंबई हमले के किसी भी दोषी को छुआ तक नहीं गया है और भारत सीमा के करीब आतंकी शिविर भी पहले की तरह जारी हैं। इसके बाद भी राजनीतिक वार्ता शुरू करके भारत जहां से चला था, वहीं पहुंच गया है। अमेरिकी असिस्टेंट सेक्रेटरी रॉबर्ट ब्लैक ने दोनों प्रमुख मांगें छोड़ने के कारण भारत को धन्यवाद दिया था। ये मांगें थीं-मुंबई हमले के दोषियों को गिरफ्तार कर उन्हें सजा दिलाई जाए तथा सीमापार से आतंकी गतिविधियों पर अंकुश लगाया जाए। मुंबई हमले में आइएसआइ और नौसेना सहित पाकिस्तानी सरकारी एजेंसियों की भूमिका स्पष्ट है। मुंबई हमले पर पाकिस्तान को खुला छोड़ देने वाले भारतीय नीति निर्माताओं को जनता के सामने दोषी ठहराने का यह सही समय है। (लेखक सामरिक मामलों के विशेषज्ञ हैं)

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