Wednesday, June 1, 2011

चीन और पाकिस्तान का गठजोड़

ओसामा बिन लादेन की मौत के बाद अंतरराष्ट्रीय राजनीति में अलग-थलग पड़ चुके पाकिस्तान को नयी ताकत देने के लिए पाक प्रधानमंत्री यूसुफ रजा गिलानी ने पेइचिंग की यात्रा की। पेइचिंग जाकर गिलानी यह दिखाना चाह रहे थे कि अमेरिका के बाद भी उनके पास एक शक्तिशाली कूटनीतिक विकल्प है। उन्हें ऐसा संकेत चीन की तरफ से ही मिला क्योंकि जब दुनिया पाकिस्तान से आतंकवाद पर जवाब मांग रही थी और पाकिस्तान नि:शब्द था तो चीन ही एकमात्र ऐसा देश था, जिसने पाकिस्तान का खुलकर साथ दिया। चीन ने पूरी दुनिया को यह बताने की कोशिश की कि आतंकवाद के खिलाफ युद्ध में पाकिस्तान की सफलताओं को याद रखना चाहिए। पाकिस्तान को मिल रहा इस तरह का समर्थन एक नापाक गठजोड़ का संकेत है जिस पर दुनिया को विशेष ध्यान देने की जरूरत होगी, खासकर भारत को। ओसामा की मौत के बाद कुछ दिनों तक मौन रहने के पश्चात गिलानी ने संसद में जिस तरह अपनी जुबान खोली थी उसमें अमेरिका और भारत सहित उन तमाम देशों को चेतावनी देने की विषयवस्तु मौजूद थी, जो उसे आतंकवादियों को प्रश्रय देने वाला देश मान रहे थे। चीन ने उनके इस नजरिए का समर्थन भी किया क्योंकि चीन ने साफ शब्दों में चेतावनी दी कि पाकिस्तान पर किये गये किसी भी हमले को चीन पर किये गये हमले की तरह समझा जाएगा। लेकिन एक बात गौर करने वाली है कि जिस समय पाकिस्तानी प्रधानमंत्री यूसुफ रजा गिलानी को चीन ‘ग्रेट हॉल ऑफ द पीपुल’ में इस तरह से तसल्ली दे रहा था, उसी समय पीपुल्स लिबरेशन आर्मी के चीफ ऑफ द जनरल स्टॉफ चेन बिंगदे पेंटागन में अमेरिकी ज्वाइंट चीफ ऑफ स्टॉफ माइक मुलेन के साथ संयुक्त प्रेस कान्फ्रेंस को सम्बोधित करते हुए कह रहे थे कि चीन कभी भी अमेरिका को चुनौती देना नहीं चाहता। अहम सवाल यह है कि चीन यदि यह चेतावनी अमेरिका को नहीं दे रहा था तो और किसे दे रहा था एक सामान्य सा व्यक्ति भी इस बात को समझ सकता है लेकिन भारत का राजनय इसे समझने में समर्थ है या नहीं, इसका उत्तर खोजना होगा। ओसामा के ऐबटाबाद में पाये जाने और मारे जाने के बाद पाकिस्तान के पास कोई जवाब नहीं था और पूरी दुनिया उससे आतंकवादियों को पनाह देने के मामले में सवाल पूछ रही थी। तब पाकिस्तान के प्रधानमंत्री संसद में खड़े होकर गरजने का नाटक करते हुए चीन को अपना सबसे विश्वसनीय मित्र घोषित कर रहे थे। दरअसल, गिलानी ऐसा इसलिए कर रहे थे क्योंकि वे भली भांति जानते हैं कि इस मामले में चीन उनका साथ दे सकता है। इसका कारण यह है कि चीन को दक्षिण एशिया में उसी तरह का साथी चाहिए जैसा कभी अमेरिका को चाहिए था। उस समय अमेरिका का लक्ष्य सोवियत संघ को एशिया से बाहर करने का था लेकिन इस समय चीन का लक्ष्य भारत को कमजोर करने का है। चीन बड़ी कुशलता के साथ डेस्पॉटिक कम्युनिज्म को सोशलिज्म विद चाइनीज कैरेक्टेरिस्टिक्स में बदल चुका है। इसी के सहारे वह आज दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी आर्थिक शक्ति का मुकाम हासिल कर चुका है। इसका एक अनिवार्य परिणाम यह हुआ कि चीन सामरिक दृष्टि से भी इतना ताकतवर हो गया कि वह स्वयं को अमेरिका को चुनौती देने में सक्षम समझने लगा। अमेरिका की तरफ से बहुत सारे संकेत ऐसे मिल रहे हैं कि चीन उसे भावी चुनौती देने के लिए तैयार हो रहा है, विशेषकर चीनी सैन्य तैयारी से अमेरिका के माथे पर बल अवश्य पड़ रहे हैं। हालांकि चीन की तरफ से इस बात से इंकार किया गया है। चीनी जनरल चेन बिंगदे ने अमेरिकी रक्षा विभाग पेंटागन में अमेरिकी ज्वाइंट चीफ ऑफ स्टॉफ माइक मुलेन के साथ संयुक्त प्रेस कान्फ्रेंस में कहा कि मैं अमेरिकी सेना के हथियार, उपकरण और आधुनिकीकरण देख आश्र्चयचकित रह गया। मैं कह सकता हूं कि चीन के पास ऐसी क्षमता नहीं है जो अमेरिका को चुनौती दे। उन्होंने कहा कि चीनी सेना का लक्ष्य ली तेंग हुयी और चेन शुई बियान के नेतृत्व वाली अलगाववादी ताकतों को काबू करना है जिन्होंने ताइवान को चीन से अलग करने की कोशिश की। चीनी अधिकारियों ने कहा कि चीन का ध्यान अपनी अर्थव्यवस्था को मजबूत करना है न कि सेना पर फालतू खर्च करना। हमारा मुकाबला अमेरिका के सकल घरेलू उत्पाद से है जो चीन से 12 गुना अधिक है। चीन कितना सच कह रहा है, यह कहना मुश्किल है लेकिन इतना तय है कि हाल-फिलहाल वह अमेरिका को सामरिक चुनौती देने वाला नहीं है और अगर देगा भी तो इसकी शुरुआत अफ्रीकी क्षेत्र से होगी जहां इस समय भू-राजनीतिक हितों की रणनीति पर पश्चिम तेजी से कार्य कर रहा है। चीन- पाक गठजोड़ पर अमेरिका से ज्यादा भारत को ध्यान देना चाहिए क्योंकि भारत के साथ बेहतर सम्बंधों की बात करने के बाद भी चीन ने कभी भारतीय हितों की परवाह नहीं की। वह अच्छी तरह जान गया है कि अमेरिका पाकिस्तान के साथ अब शीतयुद्ध काल की तरह रिश्ता नहीं रखना चाहता क्योंकि अमेरिकी जनता इसे स्वीकार करने के मूड में नहीं है। ऐसे में पाकिस्तान को चीन के साथ लाकर अमेरिका को पाकिस्तान द्वारा ब्लैकमेल कराया जा सकता है। दूसरी तरफ चीन पाकिस्तान के जरिये भारत को चिढ़ाने या नुकसान पहुंचाने की युक्ति तलाश रहा है। कम्युनिस्ट शासित चीन पाकिस्तान को एक सहनिर्माण करार के तहत 50 नए जेएफ-17 थंडर बहुद्देशीय विमान देने के लिए तैयार हो गया है। इस नयी आपूर्ति के बाद पाकिस्तानी वायुसेना के बेड़े में चीनी विमानों की संख्या 260 हो जाएगी। दोनों देश रडार की निगाह से बचने की तकनीक से लैस जे-20 स्टील्थ विमान और जियालोंग एफसी-1 बहुउद्देश्यीय विमान पर भी बात कर रहे हैं। इसके अतिरिक्त पीएलए ‘यूयी’ यानी फ्रेंडशिप मिलिट्री एक्सरसाइज के जरिए पाकिस्तान की सेना को भारत के खिलाफ शक्तिशाली दीवार के तौर पर तैयार कर ही रही है जो भारत के सामरिक हितों के लिए चिंताजनक बात है।

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