Wednesday, June 29, 2011

महंगी पड़ेगी भारत की ख़ामोशी

चीन पिछले पांच दशकों के सबसे भीषण सूखे से दो-चार हो रहा है। उसके दक्षिण और मध्य चीन के तकरीबन दस प्रांतों की स्थिति बेहद नाजुक हो चली है। खेती-गृहस्थी तो चौपट हो ही चली है। बिजली का उत्पादन भी अपने निम्नतम स्तर पर जा पहुंचा है। इस स्थिति से निपटने के लिए चीन ब्रह्मपुत्र नदी पर बांध बनाकर पानी की समस्या से मुक्ति पाना चाहता है। हालांकि चीन ऐसी किसी भी कोशिश से इनकार कर रहा है, लेकिन भारत के खिलाफ उसकी साजिश को देखते हुए उसकी बातों पर विश्वास नहीं किया जा सकता है। अभी गत वर्ष ही उसने स्वीकार किया कि वह ब्रह्मपुत्र नदी पर तकरीबन 1-2 बिलियन डॉलर की लागत से हाइड्रो इलेक्टि्रक पॉवर बना रहा है। चीन की पंचवर्षीय योजना से भी इस तथ्य की पुष्टि होती है। चाइनीज एकेडमी ऑफ साइंसेज ने भी पश्चिमी कैनाल प्लान से अलग योजना सुझाते हुए कहा है कि पानी को उत्तर-पश्चिमी दिशा में मोड़ दिए जाने से पानी की समस्या से निजात पाई जा सकती है। चीन इन सुझावों पर अमल भी कर रहा है। दूसरी ओर भारत की बेबसी साफ दिख रही है। उसकी आपत्तियों के बावजूद चीन ध्यान नहीं दे रहा है। उसका रटा-रटाया जवाब है कि ब्रह्मपुत्र पर प्रस्तावित उसकी सभी परियोजनाएं छोटी हैं। रक्षा विषेशज्ञों की मानें तो चीन का यह कदम उसके दुस्साहसपूर्ण रवैये को इंगित करता है। अरुणाचल प्रदेश और असम जैसे भारतीय राज्य ब्रह्मपुत्र नदी के जल का उपयोग करते हैं। ऐसे में विदेश मंत्री एसएम कृष्णा का यह कथन आश्चर्य पैदा करता है कि नदी पर बनने वाली पन बिजली परियोजना के लिए जलसंग्रह नहीं किया जाएगा और इससे भारत में आने वाली नदी की धारा प्रभावित नहीं होगी। विभिन्न पहलुओं पर सूक्ष्म ढ़ग से विचार किया जाए तो स्पष्ट हो जाता है कि चीन भारत के खिलाफ योजनाबद्ध रणनीति के तहत काम कर रहा है और भारत चेतनाशून्य पड़ा हुआ है। एक ओर चीन अरुणाचल के विस्तृत भू-भाग पर कब्जा कर उसका विस्तार में जुटा हुआ है। वहीं, पाक अधिकृत कश्मीर में भी उसकी दखलंदाजी बढ़ती जा रही है। हाल में अरुणाचल प्रदेश के वित्त एवं योजना मंत्री कालीखो पुल ने योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलूवालिया को बताया कि राज्य में कारगिल जैसे हालात बनते जा रहे हैं, लेकिन सरकार मानने के लिए तैयार नहीं है। अभी पिछले दिनों ही सीमा पर तैनात सेना के उत्तरी कमान के वरिष्ठ लेफ्टिनेंट जनरल केटी परनाइक ने भी संकेत दिया था कि चीन एक बार फिर भारत पर हमले की तैयारी में जुटा है। चीन की सरकारी पत्रिका में भी भारत को खुलेआम युद्ध की धमकी देते हुए कहा गया कि अगर भारत अमेरिका के साथ मिलकर उसे घेरने की कोशिश करेगा तो चीन लड़ाई छेड़ने से नहीं हिचकेगा। चीन में बढ़ती बेरोजगारी, आंतरिक असंतोष और विदेशी मुद्रा भंडार की कमी भारत पर हमला करने का एक महत्वपूर्ण कारण बन सकता है। भारत की लाख कोशिशों के बावजूद वह सीमा विवाद को हल करना नहीं चाह रहा है। एक बार नहीं, सैकड़ों बार चीनी सैनिक भारत की सीमा में घुसकर अपने देश का नाम भारतीय भू-भाग पर लिख चुके हैं और वहां काम कर रहे भारतीय मजदूरों को काम बंद करने की धमकी भी देते हैं। लेकिन भारत सरकार चीन के इस दुस्साहस पर अपना कड़ा प्रतिवाद जताने के बजाए नरमी ही बरतती देखी जाती है। भारत की यह उदार नीति चीन जैसे साम्राज्यवादी देश के मनोबल को बढ़ाने वाली है। सुनने में तो यहां तक आ रहा है कि भारत-पाकिस्तान के बीच लगभग 800 किमी नियंत्रण रेखा पर चीन अपने सैनिकों की तैनाती भी कर चुका है। पीओके के बंकरों में पाकिस्तानी सेना के साथ चीन की लाल सेना के जवानों की मौजूदगी का खुलासा भी हो चुका है, लेकिन देश के रक्षामंत्री को सीमा पर चीनी सैनिकों की हलचल बिल्कुल ही नहीं सुनाई नहीं दे रही है। सरकार की यह शुतुर्गमुर्गी स्थिति भारतीय संप्रभुता के लिए खतरनाक है। अरुणाचल प्रदेश से चुने गए किसी भी भारतीय सांसद को वह वीजा नहीं देता है। भारत की गंभीर आपत्तियों के बावजूद वह कश्मीर के लोगों को स्टेपल वीजा ही जारी कर रहा है। सवाल यह उठता है कि चीन की कातिल मंशा को भारत समझने में भूल क्यों कर रहा है? क्या संप्रग सरकार चीनी सेना के आक्रमण का उसी तरह इंतजार कर रही है, जैसे कभी कायर शासक आम्भी ने सिकंदर सेना के आगमन के लिए देश की संप्रभुता को दांव पर लगा दिया था। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)

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