Wednesday, June 29, 2011

ब्रिक्स की परीक्षा

डॉमिनिक स्टॉस कॉन के पदत्याग के बाद अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) को अपना नया मुखिया चुनना है। गौरतलब है कि फ्रांस मूल के स्टॉस कान को न्यूयॉर्क में एक महिला होटलकर्मी से बलात्कार और यौन उत्पीड़न के आरोपों के कारण अपना पद छोड़ना पड़ा था। नई उम्मीदवार क्रिस्टीन लगार्द भी फ्रांस से हैं, जो वहां की वित्त मंत्री हैं। अपनी उम्मीदवारी के लिए समर्थन जुटाने के लिए लगार्द दुनिया के कई देशों के चक्कर काट रही हैं। इस हफ्ते उन्होंने भारत की यात्रा की। उनका अगला पड़ाव चीन था। दरअसल, ब्रिक्स देशों यानी ब्राजील, भारत, रूस, चीन और दक्षिण अफ्रीका ने आइएमएफ का नया प्रमुख विकासशील देशों से चुनने की मांग की थी, लेकिन आइएमएफ में यूरोपीय देशों एवं अमेरिका की हैसियत 50 प्रतिशत से ज्यादा होने के कारण ऐसा संभव प्रतीत नहीं होता। ब्रिक्स देशों द्वारा विरोध का स्वर उभरने की वजह से लगार्द के लिए जरूरी हो गया था कि अपने नाम पर समर्थन जुटाने के लिए वह विकासशील देशों की उपेक्षा न करें। पिछले दिनों ब्राजील जाकर लगार्द ने आइएमएफ में सुधार की जरूरत को रेखांकित करते हुए उभरती अर्थव्यवस्थाओं को अधिक प्रतिनिधित्व देने की वकालत की है। भारत में भी लगार्द ने वही दलीलें दीं जो ब्राजील में दी हैं। अब तक यह परंपरा रही है कि विश्व बैंक के अध्यक्ष पद पर अमेरिकी चुना जाता है और आइएमएफ के प्रमुख का पद यूरोप को दिया जाता है। विकासशील देशों की दलील है कि आइएमएफ प्रमुख का चुनाव किसी परंपरा नहीं बल्कि योग्यता के आधार पर होना चाहिए। लोकतंत्र और पारदर्शिता का ढोल पीटने वाले पश्चिमी देश यह क्यों भूल जाते हैं कि अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष किसी देश की निजी जागीर न होकर एक वैश्विक संगठन है। परंपरा की खोखली दुहाई देकर इसके शीर्ष पदों की आपसी बंदरबांट को किसी भी कीमत पर जायज नहीं ठहराया जा सकता। विकसित देश आज जो आर्थिक संकट झेल रहे हैं, उसके मद्देनजर एक बार फिर वैश्विक आर्थिक एवं वित्तीय संगठनों में व्यापक सुधार की जरूरत महसूस हुई है। वैश्विक अर्थव्यवस्था में विकासशील देशों के बढ़ते कद को समुचित प्रतिनिधित्व मिलना ही चाहिए। सर्वविदित है कि आइएमएफ के कोष में आने वाले धन में विकसित देशों का हिस्सा पचास प्रतिशत से कम हो चुका है। परंतु मतदान का ढांचा इतना अलोकतांत्रिक और पक्षपाती है कि अगर पश्चिमी खेमे में आपसी मतभेद न हों तो विकासशील देशों के किसी प्रत्याशी का जीतना नामुमकिन सा हो जाता है। लेकिन कई बार हार की अहमियत जीत से ज्यादा हो जाती है। इसलिए ब्रिक्स द्वारा हार के डर से क्रिस्टीन लगार्द के सामने प्रत्याशी खड़ा नहीं करना कमजोरी माना जाएगी। एक संगठन के तौर पर ब्रिक्स को कड़े इम्तिहान से गुजरना है। हालांकि पांचों ब्रिक्स देश अब तक एक उम्मीदवार के नाम पर सहमत नहीं हो पाए हैं लेकिन इसका यह अर्थ नहीं निकाला जा सकता कि इस मुद्दे पर आपसी मतभेद भुलाकर कोई सर्वसम्मति कायम ही नहीं की जा सकती। भारत के मोंटेक सिंह अहलूवालिया इस पद के मजबूत दावेदार हो सकते थे किंतु उनकी उम्र आइएमएफ प्रमुख की सेवानिवृत्ति उम्र से ज्यादा होने के कारण वह अपात्र हो चुके हैं। ऐसे में भारत की रणनीति क्या होनी चाहिए? इस मसले पर भारत को चीन के रवैये पर पैनी नजर रखनी होगी। जहां लगार्द को भारत ने कोई आश्वासन नहीं दिया, वहीं चीनी नेताओं से बातचीत के बाद वह अत्यंत प्रसन्न नजर आ रही हैं। चीन विकासशील देशों के प्रत्याशी का समर्थन करने के बजाय लगार्द का समर्थन करना ज्यादा फायदे का सौदा समझ रहा है। सौदेबाजी के तहत चीन आइएमएफ के उप प्रमुख का पद हथिया सकता है। अगर ऐसा हुआ तो न केवल ब्रिक्स के अस्तित्व पर गंभीर प्रश्न उठेंगे बल्कि उभरती हुई विकासशील अर्थव्यवस्थाओं की एकजुटता के प्रयासों को भी करारा झटका लगेगा। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)

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