Wednesday, June 1, 2011
लीबिया ऑपरेशन के खतरे
लीबिया में ऐसे वक्त ऑपरेशन हो रहा है, जब अमेरिका और नाटो अफ-पाक में बुरी तरह फंसे हुए हैं। ओबामा ने अफगानिस्तान पर ध्यान केंद्रित करने के लिए इराक से सेना वापस बुलाने का फैसला लिया था। अमेरिकी सेना के इराक से हटते ही ओबामा ने अफगानिस्तान में तीस हजार सैनिक और भेजे थे। इस समय अफगानिस्तान में डेढ़ लाख विदेशी सैनिक मौजूद हैं। अब सवाल उठता है कि क्या इराक की तरह लीबिया मुहिम से अफगानिस्तान में अमेरिकी और नाटो योजनाओं पर फर्क पड़ेगा? खतरा यह पैदा हो रहा है कि गृहयुद्ध से जूझ रहे उत्तरी अफ्रीकी और अरब देशों में अलकायदा अपनी पैठ बना सकता है। 1990 के दशक के मध्य में ओसामा बिन लादेन ने सूडान में अपना ठिकाना बना लिया था। इसके अलावा अलकायदा सोमालिया और यमन से भी अपनी कार्रवाई चलाता रहा है। कुछ विश्लेषक मानते हैं कि अलकायदा अफगानिस्तान छोड़ने का मन बना चुका है। सिद्धांत रूप से देखें तो अलकायदा इस्लाम जगत में किसी भी ऐसे देश जाने को तैयार होगा, जहां सरकार उसके खिलाफ निर्णायक कार्रवाई न करे। अलकायदा की घुसपैठ के लिए यमन आदर्श स्थान हो सकता है। वहां तानाशाही के खिलाफ लोग विद्रोह पर उतर आए हैं। अगर, यमन की पश्चिमोन्मुखी सरकार गिर जाती है, तो वह देश अलकायदा के लिए अधिक अनुकूल हो सकता है। पिछले साल अमेरिका ने ड्रोन विमानों से यमन के ऊपर गश्त लगाई थी। पिछले 18 महीनों में उसने अलकायदा के अड्डों का पता लगाने के लिए दर्जनों सीआइए एजेंटों और आतंकवाद की रोकथाम के विशेषज्ञों को वहां तैनात किया था। यमन की ये घटनाएं उस समय हो रही हैं जब अरब जगत में कई सरकारें ध्वस्त हो रही हैं। सवाल यह उठता है कि क्या सरकारों के पतन से अलकायदा के लिए मिश्च या लीबिया में अवसर पैदा हो सकते है? फिलहाल, मिश्च की सरकार चल रही है और अमेरिका के साथ सहयोग भी कर रही है। लेकिन पश्चिमी देशों को मानना है कि अगर अलकायदा काहिरा में अपने ऑपरेशनों की शुरुआत करना चाहता है तो मिश्च सरकार अपना मुंह दूसरी ओर फेर लेगी। दमिश्क में सीरियाइयों ने भी हमास ऑपरेशनों के दौरान निर्णायक कार्रवाई नहीं की थी। लीबिया में भी ऐसी ही संभावनाएं नजर आती हैं। लीबिया ऐसा देश नहीं है जिस पर मिश्च की तरह कब्जा किया जा सकता हो। यह विभिन्न कबीलों का एक संगठन है, जिन्हें सौ साल पहले इतालवियों ने एक उपनिवेश के रूप में संगठित किया था। मुअम्मर गद्दाफी चाहे कितना भी अच्छा या बुरा शासक रहा हो उसके हटते ही लीबिया बिखर सकता है। अगर लीबिया टूटता है तो अलकायदा वहां अपना ठिकाना बना सकता है। जब इराक में गृहयुद्ध शुरू हुआ था तो स्थानीय सुन्नी उग्रवादियों ने खुद को इराक के अलकायदा के रूप में संगठित किया था। उनके साथ मिलकर अमेरिकियों के खिलाफ लड़ने के लिए कई लीबियाई भी इराक गए थे। लीबिया में क्षमता है और वह अलकायदा के लोगों का बदला चुका सकता है और वह लीबिया का रुख कर सकता है। वापस अफगानिस्तान की ओर लौटें। ओबामा ने उस एक देश में ही नहीं, बल्कि सामरिक महत्व की दृष्टि से किसी भी देश में अलकायदा को अपना आधार नहीं बनाने दिया है। सिक्के का दूसरा पहलू यह भी है कि लीबिया में कामयाबी से अफगानिस्तान में युद्ध को तेजी से खत्म करने में आसानी हो सकती है। सद्दाम और गद्दाफी को हटा दिए जाने के बाद गरीब और दूरदराज के अफगानिस्तान में एक स्थिर सरकार बनाने में अमेरिका की नाकामी से कोई खास फर्क नहीं पड़ेगा। लेकिन अगर गद्दाफी के डटे रहने की वजह से लीबिया ऑपरेशन लंबा खिंचता है तो इसके गंभीर नतीजे हो सकते हैं। तब अलकायदा को अपने ठिकाने बनाने और कार्रवाई करने के लिए और अधिक इलाका मिल जाएगा। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)
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