Tuesday, June 14, 2011
भारत के लिए भी अच्छा संकेत नहीं
नेपाली संविधान सभा की अवधि तीन माह के लिए बढ़ा दी गई है, जिसका यूरोपीय संघ, स्विट्जरलैंड, नार्वे सहित कई देशों ने समर्थन किया है। नेपाल में संवैधानिक संकट भले ही वर्तमान में टल गया है, लेकिन अंतरिम सरकार के सामने भविष्य में तय समय-सीमा का पालन करने की नई जवाबदेही कानूनी चुनौती के रूप में प्रकट हुई है। इस प्रकार की स्थितियां भारत के लिए अच्छा संकेत नहीं हैं। नेपाल के राजनैतिक इतिहास पर गौर करें तो 1990 का जन आंदोलन लोकतंत्र बहाली का पहला कदम राजतंत्र के साथ-साथ बहुदलीय लोकतंत्र व्यवस्था के रूप में एक बड़ा परिवर्तन लाया। वर्ष 2006 में इसी प्रकार के एक आंदोलन से लोकतंत्र के मार्ग में सफलता का एक और अध्याय जुड़ा। वर्ष 2008 में हुए संविधान सभा के चुनाव से सभी ने यह उम्मीद व्यक्त की कि अब नेपाल में बीते दिनों में हुई गलतियों में सुधार होगा, लेकिन अब तक के बने गतिरोधों और अस्थिरता ने कई समस्याओं को पैदा किया है। इसका गहरा प्रभाव भारत पर पड़ रहा है। एक तरफ भारत को अपनी विदेश नीति में परिवर्तन करने की जटिलता से सामना करना पड़ रहा है तो दूसरी ओर नेपाली राजनीति में कई नई सोच और शक्तियों का उभार हो रहा है, जिसे भारतीय हितों के रूप में नहीं देखा जा सकता है। संविधान सभा के चुनाव के बाद उनके सामने कई तरह की चुनौतियां आई और दबाव पड़े, जिसमें सभा की असफलता सामने आई। इस वजह से 28 मई 2010 तक संविधान नहीं लिखा जा सका। तब इस संविधान सभा को एक साल के लिए बढ़ा दिया गया। अब एक बार फिर संविधान सभा की अवधि तीन माह के लिए बढ़ा दी गई। अब देखना होगा कि इस तय समय-सीमा का पालन नेपाली संविधान सभा कितनी हद तक कर पाती है। संविधान सभा के गठन के बाद से ही भारत विरोधी आंदोलन नेपाली धरती पर चलते रहे, जिसका स्पष्ट असर वहां की जनता पर भी पड़ा। नेपाल में अंतरराष्ट्रीय समुदायों की बढ़ोतरी भी निरंतर देखी जा रही है और उनके लिए नेपाल का महत्व भी पहले से ही बरकरार है। चूंकि नेपाली अर्थव्यवस्था विदेशी सहायता पर ही निर्भर है, ऐसे में अंतरराष्ट्रीय समुदाय की पहुंच स्वाभाविक ही है। इसके अलावा चीन का नेपाल में अपनी पैठ बढ़ाना और नेपाल के भी कुछ दलों का भारत की अपेक्षा चीन के प्रति ज्यादा लगाव भारत के लिए चिंता का विषय है। नेपाल में मौजूदा गतिरोध की स्थिति में चीन का जवाब तलाशना भारत के लिए मुश्किलों भरी चुनौती है। भारत के सीमावर्ती लोगों का नेपाल के लोगों के साथ वैवाहिक संबंधों के अलावा दोनों देशों के बीच सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक संबंध सदियों से रहा है। दोनों देश अपनी खुली सीमा का लाभ भी उठाते हैं। अभी के चीनी मंसूबों ने इन संबंधों में गतिरोधक की भूमिका निभाई है। जबसे नेपाल में अस्थिरता आई है, भारत भी कई मामलों में अस्थिर हुआ है। पिछले दिनों नेपाली मओवादियों और पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आइएसआइ के आपसी संबंधों का खुलासा हुआ था। इन दोनों के गठबंधन ने भारत में घुसपैठ का अच्छा माध्यम बना लिया था। भारत का लगभग 60 प्रतिशत व्यापार नेपाल के साथ है, जिसमें पर्यटन, पेट्रोलियम, बिजली आदि क्षेत्रों में भारत का काफी योगदान है। भारत नेपाल का बड़ा निवेशक भी है। चीन का योगदान भी इसी अनुरूप बढ़ता जा रहा है। इसे भारत अनदेखा नहीं कर सकता। इसे नियंत्रित करने के प्रयासों के तहत भारत को अपनी विदेश नीति का पुनरावलोकन करना होगा। भारत के लिए नेपाल का न केवल आर्थिक महत्व है, बल्कि सामरिक-कूटनीतिक महत्व भी है। भारत अपनी जनता के साथ नेपाली जनता के बीच के अभिन्न संबंधों का भी लाभ उठा सकता है। बहरहाल, नेपाल की राजनितिक अस्थिरता और गतिरोध का प्रमुख कारण माओवादियों को मुख्य धारा में शामिल करने को लेकर है। कुछ राजनीतिक दल उन्हें सैन्यबलों में शामिल करने पर जोर दे रहे हैं, जबकि सच यह है कि उन्हें समाज की मुख्यधारा में जोड़ने के लिए असैन्य कार्यो में लगाकर ही उनका और देश का भला हो सकता है। यह सच है कि माओवादियों की बदौलत ही नेपाल में लोकतंत्र का मार्ग प्रशस्त हुआ है, लेकिन अपने लक्ष्य की पूर्ति में उनका हिंसात्मक मार्ग किसी भी लोकतंत्र के लिए खतरा पैदा कर सकता है। अगर नेपाल में माओवादी लड़ाकों को सैन्यबलों में शामिल कर लिया जाता है तो यह आशंका भी है कि नेपाली सेना में दो गुट पैदा हो जाएं और लोकतंत्र का मकसद पूरा होने से पहले ही देश एक बार फिर अशांत हो जाए। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)
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